आज के युग में जितनी तेजी से सुख-सुविधाएं उपलब्ध हो रही हैं, उतनी ही तेजी से बीमारियां भी शरीर के अंदर घर बना रही हैं। ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस द्वारा बीते दिनों कराया गया एक राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण इस चिंताजनक तथ्य को प्रमाणित करता है कि देश की 70 फीसद आबादी आज तनाव, अवसाद व निराशा जैसे मेंटल डिसआर्डर के साथ हृदय रोग व मधुमेह से पीड़ित हैं। पर्यावरण ही नहीं, लोगों के आहार-विहार और आचार-विचार की संस्कृति भी प्रदूषित हो रही है। अध्ययन बताते हैं कि पिज़ा, बर्गर व कोल्डड्रिंक जैसे फास्टफूड की अति, तरह तरह के नशों की लत तथा दिन-रात इंटरनेट से चिपके रहने के चस्के के कारण देश की युवा पीढ़ी समय से पूर्व गंभीर व खतरनाक रोगों के चंगुल में फंसती जा रही है।
महत्त्वाकांक्षाओं की मृगतृष्णा ने आज की वर्तमान पीढ़ी को कामनापूर्ति का यंत्र मात्र बनाकर रख दिया है। हर क्षेत्र में सफलता पाने की अंधी दौड़ में आज मनुष्य की जीवनशैली बुरी तरह विकृत हो गयी है।
वेदों में जीवन के प्रत्येक क्षेत्र का गहन ज्ञान संकलित है। वैदिक काल में ऋषि-मुनियों ने प्रकृति के नियमों के अनुरूप स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए अनेक सूत्र दिए थे; जो आज भी वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित और प्रासंगिक हैं। आइये जानते हैं इन सूत्रों के बारे में जिनके पालन से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य प्राप्त किया जा सकता है।
आहार: “हितभुक, मितभुक, ऋतभुक”
वेदों में कहा गया है कि भोजन शुद्ध, संतुलित और प्राकृतिक होना चाहिए। ‘हितभुक’ का अर्थ है ऐसा भोजन जो शरीर के लिए हितकारी हो। ‘मितभुक’ का आशय है संयमित मात्रा में भोजन करना, ताकि शरीर स्वस्थ बना रहे और अनावश्यक वसा न बढ़े। ‘ऋतभुक’ का अर्थ है ऋतु के अनुसार भोजन का चयन करना, जिससे शरीर का तापमान और ऊर्जा स्तर संतुलित रहे। जैसे ग्रीष्मकाल में शीतल एवं जलयुक्त पदार्थों का सेवन करना तथा शीतकाल में उष्ण एवं पौष्टिक पदार्थों का सेवन करना।
दिनचर्या: “ब्रह्ममुहूर्ते उत्तिष्ठेत्”
वेदों में कहा गया है कि व्यक्ति को ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से पूर्व) उठना चाहिए, क्योंकि यह समय शरीर, मन और आत्मा को ऊर्जावान और शुद्ध करने का सर्वश्रेष्ठ समय होता है। इस समय वातावरण में ऑक्सीजन का स्तर अधिक होता है, जो फेफड़ों को शुद्ध करने और मानसिक स्पष्टता बढ़ाने में सहायक होता है।
जल सेवन: “आपः स्वराष्ट्राः”
जल को वेदों में जीवनदायी तत्व माना गया है। आयुर्वेद के अनुसार सुबह उठकर तांबे के पात्र में रखा हुआ जल पीना शरीर को डिटॉक्स करता है और पाचन शक्ति को बढ़ाता है। उचित मात्रा में जल ग्रहण करने से रक्त संचार सुचारू रहता है, विषैले पदार्थ बाहर निकलते हैं और त्वचा स्वस्थ बनी रहती है।
मानसिक स्वास्थ्य: “मनः स्वस्थस्य जीवनं सुखम्”
वेदों में मानसिक स्वास्थ्य को अत्यधिक महत्व दिया गया है। वैदिक मनीषी और भारत योग केन्द्र के प्रमुख पद्मश्री आचार्य भारत भूषण जी कहते हैं कि आज की तेजी से भागती आपाधापी भरी स्वस्थ रहने का सर्वाधिक कारगर सूत्र है ध्यान व योग। तनाव, चिंता और नकारात्मकता को दूर करने के लिए ध्यान, प्राणायाम और जप के नियमित अभ्यास से आशातीत लाभ होता है।
उपवास: “लङ्घनं परम् औषधम्”
वेदों में उपवास को सर्वोत्तम औषधि बताया गया है। समय-समय पर उपवास करने से पाचन तंत्र को विश्राम मिलता है, शरीर के विषाक्त तत्व बाहर निकलते हैं और रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है। उपवास केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि शरीर के लिए एक वैज्ञानिक विधि भी है जो मेटाबॉलिज्म (पाचन तंत्र) को संतुलित रखती है।
सादा और संयमित जीवन: “संतोषः परमं सुखम्”
वेदों में भौतिक सुख-साधनों की अति से बचने और संतोष, सादगी एवं संयमित जीवन को अपनाने का संदेश दिया गया है। अत्यधिक भोग विलास जीवन में तनाव, चिंता और मानसिक अशांति को जन्म देता है, जबकि सादगी अपनाने से शरीर और मन दोनों में संतुलन बना रहता है।
संगीत चिकित्सा: “नादं सर्वभूतानां जीवनं”
वेदों में ध्वनि और संगीत को भी स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण माना गया है। वैदिक मंत्रों और संगीत की ध्वनि तरंगें मस्तिष्क को शांति और ऊर्जा प्रदान करती हैं, जिससे तनाव कम होता है और सकारात्मकता बढ़ती है।

















