गत दिनों कान्हा शांति वनम्, भाग्यनगर (हैदराबाद) में रा.स्व. संघ का एक वैश्विक आयोजन हुआ। इसकी गूंज दुनिया के अनेक देशों में सुनाई दी। यह आयोजन था विश्व संघ शिविर 2025। 25-29 दिसंबर तक आयोजित इस शिविर में विश्व के सभी महाद्वीपों के 71 देशों से 1,610 कार्यकर्ता, स्वयंसेवक और प्रतिनिधि शामिल हुए। समापन समारोह में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत का मार्गदर्शन प्राप्त हुआ।

शिविर में हिंदू स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद, सनातन धर्म स्वयंसेवक संघ, सेवा इंटरनेशनल, फ्रेंड्स ऑफ इंडिया सोसाइटी इंटरनेशनल, संस्कृत भारती, नेशनल हिंदू स्टूडेंट्स फोरम, हिंदू युवा सहित विभिन्न संगठनों के कार्यकर्ता अपने परिवारों के साथ शामिल हुए। शिविर का उद्देश्य वैश्विक स्तर पर सेवा, संस्कार और सांस्कृतिक मूल्यों के माध्यम से समाज को जोड़ना था। इस शिविर ने विभिन्न देशों के प्रतिभागियों को एक-दूसरे से मिलने और विचारों का आदान-प्रदान करने का अवसर भी प्रदान किया।
उल्लेखनीय है कि विश्व संघ शिविर का आयोजन हर पांच वर्ष में किया जाता है। ऐसा पहला शिविर 1990 में बेंगलुरु में आयोजित हुआ था। इसके बाद वडोदरा, मुंबई, गांधीनगर, पुणे और इंदौर में इस शिविर का आयोजन हुआ। हर वर्ष इस शिविर के अलग-अलग केंद्रीय विषय होते हैं। इस वर्ष शिविर का केंद्रीय विषय था- ‘धर्मे सर्वं प्रतिष्ठितम्।’ यानी सब कुछ धर्म में ही प्रतिष्ठित है, सब कुछ धर्म पर आधारित है। यहां धर्म का अर्थ है- कर्तव्य, सदाचार, न्याय…।


इसलिए धर्म ही संपूर्ण जगत का आधार है और इसी पर जीवन के सभी पहलू टिके हुए हैं; धर्म ही मनुष्य को सही मार्ग दिखाता है और पाप से बचाता है, इसलिए धर्म को सर्वोपरि माना गया है। कह सकते हैं कि सबमें धर्म की इसी भावना को आत्मसात कराने के लिए, इसे समाज तक पहुंचाने के लिए इस शिविर में इसे केंद्रीय विषय के रूप में रखा गया। शिविर का आयोजन दिल्ली स्थित श्री विश्व निकेतन ट्रस्ट की देखरेख में हुआ।

वीडियो और पुस्तकों का लोकार्पण

कार्यक्रम में शिविर के केंद्रीय विषय- ‘धर्मे सर्वं प्रतिष्ठितम्’ पर आधारित एक विशेष स्मारिका और जाने-माने लेखक डॉ. रतन शारदा की लिखी चार पुस्तकों का लोकार्पण स्वामी गोविंद देव गिरि जी के करकमलों से हुआ। इनमें अलग-अलग देशों में हिंदुत्वनिष्ठ संगठनों के काम के इतिहास को बताया गया है। इसके अलावा श्री दाजी की लिखी दो नई पुस्तकें- ‘द हार्ट ऑफ़ लॉर्ड राम’ और ‘होली तीर्थंकर’ का लोकार्पण श्री दत्तात्रेय होसबोले ने किया। दुनिया भर में हिंदू स्वयंसेवक संघ के कार्यक्रमों में गाई जाने वाली ‘विश्व प्रार्थना’ के लिए प्रसिद्ध संगीतकार राहुल रणदे ने धुनें तैयार कीं तथा शंकर महादेवन द्वारा गाए विशेष संस्करण का विमोचन भी हुआ।
उद्घाटन सत्र
शिविर का उद्घाटन 25 दिसंबर को श्रीराम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र न्यास के कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंद देव गिरि जी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले ने भारत माता के चित्र के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित कर किया। स्वामी गोविंद देव गिरि जी ने ‘धर्मे सर्वं प्रतिष्ठितम्’ की व्याख्या करते हुए कहा कि धर्म जीवन में संतुलन और स्थिरता प्रदान करता है। उन्होंने कहा, “धर्म के बिना न तो शांति संभव है और न ही विकास। धर्म सार्वभौमिक सिद्धांतों के माध्यम से मानवता का मार्गदर्शन करते हुए अभ्युदय (भौतिक कल्याण) और निःश्रेयस (आंतरिक पूर्णता), दोनों को सुनिश्चित करता है।”
श्री दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि हिंदू स्वयंसेवक संघ तथा अन्य हिंदुत्वनिष्ठ संगठनों के कार्यकर्ता जिस भी देश में रहते हों उन्हें वहां धर्म के अनुरूप जीवन जीना चाहिए और उसी के अनुरूप कार्य करना चाहिए। उन्होंने कहा कि धर्म में विश्व को शांति और कल्याण प्रदान करने की क्षमता है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि हिंदुओं ने कभी भी अपने प्रभाव का विस्तार बल प्रयोग द्वारा नहीं किया। हिंदुओं ने ज्ञान, दर्शन, संस्कृति और विज्ञान के माध्यम से तथा प्रकृति और समाज के साथ सामंजस्यपूर्ण सह-अस्तित्व द्वारा ही स्वयं का विस्तार किया है। शिविर की विषयवस्तु पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि धर्म दृष्टि और संघ लक्ष्य अविभाज्य हैं तथा समाज सेवा और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता शाखा से निकलने वाले प्रमुख संदेश हैं।
इससे पहले शिविर में आए प्रतिनिधियों का स्वागत करते हुए सेवा इंटरनेशनल के वैश्विक सचिव श्री श्याम परांडे ने कहा कि यह विश्व संघ शिविर हर पांच वर्ष में एक बार प्रमुख कार्यकर्ताओं को एकत्र कर, आपसी संपर्क को सुदृढ़ करने, अनुभवों के आदान–प्रदान और सामूहिक संकल्प को मजबूत करने का एक विशिष्ट मंच है। उन्होंने कहा कि यह केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि हमारे साझा लक्ष्य और प्रतिबद्धता को पुनः पुष्ट करने वाला एक आनंददायक समागम है।
उद्घाटन सत्र में मंच पर श्रीराम चंद्र मिशन के वैश्विक प्रमुख और आध्यात्मिक मार्गदर्शक श्री कमलेश डी. पटेल (दाजी) विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। इस सत्र की अध्यक्षता भारतीय विद्या भवन के अध्यक्ष तथा असम, पंजाब और तमिलनाडु के पूर्व राज्यपाल श्री बनवारीलाल पुरोहित ने शिविराधिकारी के रूप में की।

विचारों का आदान-प्रदान
26 और 27 दिसंबर को चर्चा सत्र, बौद्धिक सत्र, समानांतर सत्र हुए, जिनमें स्वयंसेवकों और आमंत्रित वक्ताओं ने अपने विचार रखे। एक सत्र राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष पूर्ण होने पर हुआ, जिसका विषय था- ‘संघ के 100 वर्ष की भूमिका, उद्देश्य और भविष्य।’ इसमें वक्ताओं ने स्वयंसेवकों को संघ की स्थापना से लेकर उसके बढ़ते व्याप को बताया। इसके साथ ही यह भी बताया कि आने वाले समय में संघ क्या करने वाला है।
समापन सत्र
28 दिसंबर को सायं कान्हा शांति वनम् में एक सार्वजनिक कार्यक्रम हुआ। इस अवसर पर सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत का उद्बोधन हुआ। श्री दाजी के सान्निध्य में आयोजित इस कार्यक्रम में भारत बायोटेक के संस्थापक डॉ. कृष्णा एल्ला मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।
अपने उद्बोधन में श्री भागवत ने कहा कि धर्म से विचलन के कारण असंतुलन उत्पन्न हुआ, जिससे उग्रवाद बढ़ा। इतिहास की दिशा भटक गई। हमने करुणा को भुला दिया। इसी से सभी समस्याएं उत्पन्न हुईं। अब इन्हें पुनः प्राप्त करने की चर्चा हर जगह हो रही है। हम भी यही कर रहे हैं, लेकिन यह कैसे होगा? उन्होंने कोलंबस का उदाहरण देते हुए कहा कि अमेरिका की खोज के बाद स्वदेश लौटने पर राजा ने उनके सम्मान में सभा आयोजित की।
कुछ विद्वानों में ईर्ष्या उत्पन्न हुई। तब राजा ने सबको एक कार्य दिया-प्राकृतिक नियमों के विरुद्ध अंडे को खड़ा करके दिखाने का। कोई सफल नहीं हुआ। तब कोलंबस ने अंडा तोड़कर खड़ा कर दिया। जब अन्य विद्वानों ने कहा कि यह तो कोई भी कर सकता था, तब राजा ने पूछा, फिर आपने क्यों नहीं किया? इसी प्रकार ‘बिल्ली के गले में घंटी बांधने’ की कथा बताते हुए उन्होंने कहा कि आवश्यक कार्य करने के लिए किसी को तो आगे आना ही पड़ता है।
उन्होंने कहा कि डॉ. हेडगेवार ने निश्चय किया कि जो कार्य होने चाहिए, वे स्वयं से प्रारंभ हों, इसलिए स्वयंसेवक तैयार किए गए। सेवा को परिभाषित करते हुए उन्होंने कहा कि सेवा स्वार्थ, भय, दबाव, अहंकार या प्रतिफल की अपेक्षा से की जाए तो वह सेवा नहीं है। जो निस्वार्थ, प्रामाणिक और बिना किसी अपेक्षा के सेवा करते हैं, वही स्वयंसेवक हैं। संघ बढ़ता है तो स्वयंसेवक भी बढ़ते हैं। कुछ स्वयंसेवक विदेश भी गए, परंतु उन्होंने अपना व्रत नहीं छोड़ा। उन्होंने हिंदू राष्ट्र की समग्र उन्नति और हिंदू धर्म की रक्षा को कभी नहीं भुलाया।
उन्होंने कहा कि अन्य देशों के लोग हमारी इतिहास, संस्कृति, परंपरा और जीवन-पद्धति को देखकर सीखें कि कैसे जिया जाए। उन्होंने कहा कि भारत नेतृत्व करेगा, लेकिन अपने जीवन मूल्यों के माध्यम से, न कि सैन्य शक्ति या आर्थिक दबाव से। विदेश विभाग का पहला द्वितीय वर्ष वर्ग बेंगलुरु में हुआ था। विदेश में जन्मे और पले-बढ़े 34 स्वयंसेवक उसमें सम्मिलित हुए थे। अब तीसरी पीढ़ी के स्वयंसेवकों पर यह जिम्मेदारी है कि स्थानीय समाज भी ऐसे संगठन की आवश्यकता महसूस करे। उन्होंने आह्वान किया कि सभी को बताया जाए कि हिंदू स्वयंसेवक संघ के माध्यम से प्रशिक्षण प्राप्त किया जा सकता है।

मुख्य अतिथि और भारत बायोटेक के संस्थापक डॉ. कृष्णा एल्ला ने भारत में नवाचार की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि नवाचार केवल सरकार का विषय नहीं, इसकी जिम्मेदारी समाज को भी लेनी चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत एक प्रजातंत्र से कहीं अधिक है। यहां आप आजादी से बोल सकते हैं, किसी भी चीज पर बहस कर सकते हैं, फिर भी धर्म में बंधे रह सकते हैं। यह भी कहा कि भारत ने कभी अन्य देशों पर आक्रमण नहीं किया, क्योंकि यह निर्णय हमारी सभ्यता और संस्कृति की गहराई से निकला है। उन्होंने ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ के सिद्धांत को रेखांकित किया।
श्री कमलेश डी. पटेल (दाजी) ने इस बात पर जोर दिया कि टिकाऊ सामाजिक बदलाव के लिए अंदरूनी संतुलन, मन की स्पष्टता और मूल्यों पर आधारित जीवन की आवश्यकता होती है, जिसमें आध्यात्मिक विकास को सामाजिक जिम्मेदारी के साथ जोड़ा जाता है। उन्होंने कहा कि पहले दादी-नानी के माध्यम से संस्कृति का ज्ञान मिलता था, जो अब कम हो गया है। यदि यह ज्ञान अगली पीढ़ी को नहीं दिया गया तो वह लुप्त हो जाएगा। उन्होंने कहा कि हमारी संस्कृति हमारी सबसे बड़ी संपदा है और इसे मिटाने के प्रयास हो रहे हैं। उन्होंने ध्यान, कैवल्य, निर्वाण, गीता, पतंजलि योग और वशिष्ठ संहिता का उल्लेख करते हुए कहा कि ध्यान चेतना को ऊंचा उठाने का माध्यम है। भारत ने यह उच्चतम ज्ञान विश्व को दिया है, जिसे समझाने में विज्ञान भी असमर्थ रहा है।

शिविराधिकारी श्री बनवारीलाल पुरोहित ने कहा कि यह शिविर विचारों, संस्कृतियों और निष्ठा का ऐतिहासिक संगम रहा। यह मेरी जिंदगी के सबसे सुखद आयोजनाें में से एक है। मैंने पहले भी कई कार्यक्रमों में भाग लिया है, लेकिन इस शिविर ने मुझे पूरी तरह से आनंद से भर दिया। यह मेरी उम्मीदों से कहीं अधिक है। उन्होंने कहा कि हर जगह हिंदुओं को अपनी पहचान पर भरोसा रखना चाहिए।
विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने कहा कि भारत सरकार भारतवंशियों को भारत से जोड़ने के साथ ही व्यापार, सुरक्षा आदि पर आने वाली वैश्विक चुनौतियों को कम करने के लिए लगातार कोशिश कर रही है। इसके बाद एक दिलचस्प पवाल-जवाब सत्र हुआ, जिसमें प्रतिनिधियों ने डॉ. जयशंकर से दोहरी नागरिकता, टैरिफ सिस्टम और आत्मनिर्भरता कैसे हासिल करें, कुछ देशों में मंदिर निर्माण, भारत में शोध का माहौल जैसे कई विषयों पर सवाल पूछे। इन प्रश्नों के उत्तर उन्होंने ऐसे त्वरित अंदाज में दिए कि प्रतिनिधि अभिभूत हो गए।
शिविर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल, श्री अरुण कुमार, श्री मुकंद सी.आर., वरिष्ठ प्रचारक श्री भैयाजी जोशी, श्री सुरेश सोनी, कुटुंब प्रबोधन के प्रमुख श्री रविंद्र जोशी सहित अनेक वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।
इस शिविर ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से प्रेरित संगठनों के बीच वैश्विक तालमेल को पक्का किया और दुनिया भर में रह रहे हिंदुओं में सांस्कृतिक आत्मविश्वास, सेवा की भावना और एकता को मजबूत करने की सोच को बढ़ावा दिया।

















