भारत के चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत ने साफ कहा है कि वो सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट्स को असल में “लोगों की अदालत” बनाना चाहते हैं। उनका मतलब है कि कोई भी आम आदमी, चाहे वो किसी भी स्थिति में हो, कानूनी इमरजेंसी में रात के किसी भी समय कोर्ट के दरवाजे खटखटा सके।
‘कानूनी इमरजेंसी में किसी भी समय उपलब्ध’
CJI सूर्या कांत ने टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया, “मेरा प्रयास और रहेगा कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट्स लोगों की अदालतें बनें, जिन्हें कानूनी इमरजेंसी में वर्किंग आवर्स से बाहर किसी भी समय अप्रोच किया जा सके।” उन्होंने इसे हॉस्पिटल से कंपेयर किया। जैसे अस्पताल में इमरजेंसी वार्ड 24 घंटे खुला रहता है, वैसे ही संवैधानिक अदालतें भी “इमरजेंसी वार्ड” की तरह काम करेंगी। अगर किसी को जांच एजेंसियों से गिरफ्तारी की धमकी मिल रही हो या कोई गंभीर खतरा हो, तो वो आधी रात में भी सुप्रीम कोर्ट जा सकता है। इसका मकसद है फंडामेंटल राइट्स और व्यक्तिगत आजादी की रक्षा करना।
CJI ने कहा, “कानूनी इमरजेंसी में कोई भी व्यक्ति, चाहे उसकी स्थिति कुछ भी हो, आधी रात को भी सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे पर दस्तक दे सकता है और तुरंत राहत मांग सकता है।”
धार्मिक आजादी और महिलाओं पर बड़ा बेंच
CJI ने एक और अहम प्राथमिकता बताई। उन्होंने कहा कि वो ये देखेंगे कि क्या 9 जजों की बेंच बनाई जा सकती है, जो कई ऐसे केस एक साथ निपटा सके जहां धार्मिक आजादी और महिलाओं के अधिकार टकरा रहे हैं। ऐसे केस तीन कैटेगरी में हैं। पहला – सबरीमाला मंदिर में हर उम्र की महिलाओं को जाने की इजाजत देने वाले पुराने सुप्रीम कोर्ट के फैसले की समीक्षा। वहां रिवाज से मासिक धर्म वाली उम्र की महिलाओं को एंट्री नहीं मिलती थी। दूसरा – दाऊदी बोहरा मुस्लिम कम्युनिटी में फीमेल जेनिटल म्यूटिलेशन (खतना) की प्रथा को चुनौती देने वाली याचिकाएं। तीसरा – मस्जिदों में महिलाओं के एंट्री पर रोक और पारसी महिलाओं को, अगर वो कम्युनिटी के बाहर शादी करें तो अगियारी (जोरोस्ट्रियन मंदिर) में एंट्री न मिलने के खिलाफ केस। CJI चाहते हैं कि इन सब पर एक बड़ी बेंच एक साथ फैसला दे, ताकि ये मुद्दे जल्दी सुलझ सकें।
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बड़े वकील अब दिनों तक नहीं बहस कर पाएंगे
एक और बड़ा बदलाव ये है कि अब हाई-स्टेक केस में मशहूर वकील दिनों तक बहस नहीं कर पाएंगे। CJI सूर्या कांत ने सख्त टाइमलाइन लागू करने का फैसला किया है। उन्होंने अंबानी बंधुओं के सेटलमेंट डिस्प्यूट का उदाहरण दिया, जिसमें वकीलों ने 26 दिन तक बहस की थी। अब ऐसा नहीं होगा। कोर्ट ने सर्कुलर जारी किया है कि सीनियर एडवोकेट, आर्गिंग काउंसल या एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड को हियरिंग से कम से कम एक दिन पहले ओरल आर्ग्यूमेंट्स की टाइमलाइन देनी होगी। साथ ही, हियरिंग से तीन दिन पहले 5 पेज से ज्यादा की लिखित सबमिशन नहीं होगी। CJI का कहना है, “इससे गरीब वादी को न सिर्फ फ्री लीगल मदद मिलेगी, बल्कि कोर्ट का बराबर समय भी मिलेगा।”
कई संवैधानिक बेंच
CJI की एक और प्राथमिकता है कि जितने हो सके उतने कांस्टीट्यूशन बेंच बनाए जाएं, ताकि लंबित संवैधानिक मुद्दों पर फैसला हो सके। इसमें बिहार से शुरू हुए और अब दर्जनभर राज्यों में चल रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) ऑफ इलेक्टोरल रोल्स की वैधता पर चुनौती शामिल है। ये बेंच देशव्यापी अपडेशन के बाद मुद्दे उठाएगी। साथ ही, कई स्पेशल कैटेगरी के केसों को प्रायोरिटी लिस्टिंग मिलेगी, ताकि लंबित केस जल्दी निपटें और ये मैसेज जाए कि सुप्रीम कोर्ट सच में लोगों की अदालत है।















