ईसाई मिशनरियां जबरन कन्वर्जन ही नहीं कर रहीं, बल्कि हिंदू समाज की एकजुटता को तहस-नहस करने के साथ-साथ भाई-भाई को आपस में लड़ाने का षड्यंत्र भी रच रही हैं। इसका ताजा उदाहरण है छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले के आमाबेड़ा गांव की घटना। यह घटना यह बताने के लिए काफी है कि मिशनरियां परिवारों के बीच फांक ही नहीं पैदा कर रही हैं, बल्कि पूरे जनजातीय समाज को एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा कर रही हैं। इसे लेकर समाज में आक्रोश बढ़ रहा है, जिसकी परिणति 24 दिसंबर को बड़े विरोध प्रदर्शन के रूप में दिखी।
दरअसल, आमाबेड़ा गांव के जनजातीय परिवार के एक सदस्य चमरा राम सलाम, जो इसाई बन चुका था, की कांकेर के जिला अस्पताल में 15 दिसंबर की शाम मृत्यु हो गई। उसका बेटा राजमन सलाम भी कन्वर्टेड ईसाई है और भीम आर्मी का जिला अध्यक्ष होने के साथ सरपंच भी है। राजमन पिता का शव लेकर गांव पहुंचा। भीम आर्मी के कार्यकर्ताओं और स्थानीय ईसाई मिशनरियों की मौजूदगी में शव को श्मशान में दफनाने की तैयारी शुरू हो गई। जब गांव वालों को अवैध तरीके से शव दफनाने की जानकारी मिली तो उन्होंने आपत्ति जताई। ग्रामीणों का कहना था कि गांव के श्मशान जनजातीय परंपराओं के अनुसार संचालित होते हैं। ऐसे में जनजातीय समाज की जमीन पर दूसरे ‘रिलीजन’ के लोगों का शव दफनाना उनकी अस्मिता, पूजा पद्धति, परंपराओं, मूल्यों तथा संवैधानिक अधिकार के विरुद्ध है।
जब विवाद बढ़ा तो 16 दिसंबर को ग्राम सभा ने मानवीय आधार पर जनजातीय समाज की रीति-नीति के अनुसार शव के अंतिम संस्कार की अनुमति दे दी। ग्राम सभा का कहना था कि चूंकि मृतक पूर्व में जनजातीय समाज का हिस्सा था, इसलिए उसका अंतिम संस्कार यदि जनजातीय रीति-रिवाज से होता है, तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं होगी। लेकिन दूसरे पक्ष को यह मंजूर नहीं था। पास्टर और भीम आर्मी से जुड़े लोगों ने मृतक के परिवार को उकसा कर जबरन शव को निजी भूमि में ईसाई रीति-रिवाज से दफना दिया।

रातों रात बना दिया चबूतरा
इसका स्थानीय लोगों ने विरोध किया। इस बीच, आश्चर्यजनक रूप से आसपास के जिलों से बाहरी तत्वों की भारी भीड़ जुटाई गई, जो इस ‘अंतिम संस्कार’ को एक राजनीतिक मंच में बदलने का प्रयास कर रही थी। यह भीड़ न केवल संदिग्ध थी, बल्कि हिंदू जनजातीय परंपराओं के विरुद्ध ईसाई रिवाज थोपने का प्रयास कर रही थी। विवाद बढ़ा तो 16 दिसंबर की रात स्थानीय प्रशासन के लोग पहुंचे। एसडीएम ने ग्रामीणों को आश्वासन दिया कि सुबह शव हटाने की कार्रवाई की जाएगी। रात भर पुलिस बल भी तैनात रहा, लेकिन रातों-रात श्मशान में पक्का चबूतरा बना दिया गया। अगले दिन सुबह आमाबेड़ा, बड़ेतेवड़ा के लोग श्मशान पहुंचे और चबूतरा बना देखा तो विरोध किया। इसके बाद 500 से अधिक लोगों की भीड़ ने उन पर हमला कर दिया। ग्रामीणों का आरोप है कि बाहर से आए लोगों और भीम आर्मी के कार्यकर्ताओं ने गांव वालों पर जानलेवा हमला किया। इसमें 50 लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। 18 दिसंबर को बड़ी संख्या में आमाबेड़ा और बड़ेतेवड़ा में सर्व समाज के लोग पहुंचे और प्रशासन से अवैध तरीके से दफनाए गए शव को निकालने की मांग की। प्रशासन की उपस्थिति में शव निकालने की प्रक्रिया शुरू हुई तो भीम आर्मी से जुड़े लोगों ने पथराव शुरू कर दिया। गांव वालों का कहना है कि इस दौरान पुलिस की भूमिका संदिग्ध रही।
क्या कहता है कानून
इस संदर्भ में संविधान की पांचवीं अनुसूची के प्रावधान अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। यह अनुसूची अनुसूचित क्षेत्रों (जैसे छत्तीसगढ़ के जनजातीय इलाके) में ग्राम सभा को सर्वोच्च अधिकार प्रदान करती है। इसके अनुसार, निजी या गैर-पंजीकृत भूमि का उपयोग कफन-दफन के लिए निषिद्ध है, जब तक कि स्थानीय ग्राम सभा द्वारा स्पष्ट अनुमति न दी जाए। बिना ग्राम सभा की सहमति के कोई भी अंतिम संस्कार वैध नहीं माना जाता है।
सर्वोच्च न्यायालय और मद्रास उच्च न्यायालय ने भी अपने फैसलों में स्पष्ट किया है कि ईसाई व्यक्ति का शव उनके लिए निर्धारित स्थान (ईसाई कब्रिस्तान) में ही दफनाया जा सकता है। गांव की सामान्य भूमि या श्मशान पर दावा करना कानूनी रूप से अमान्य है। इसी तरह, बिलासपुर उच्च न्यायालय ने ऐसे ही एक मामले में ईसाई व्यक्ति की याचिका खारिज कर दी थी, जिसमें उसने अपने मृत पिता का अंतिम संस्कार गांव के आम कब्रिस्तान में करने की अनुमति मांगी थी। अदालत ने ग्राम सभा की सहमति और पांचवीं अनुसूची के उल्लंघन को आधार बनाते हुए इसे अस्वीकार कर दिया था। ये प्रावधान हिंदू जनजातीय परंपराओं की रक्षा करते हुए सुनिश्चित करते हैं कि बाहरी तत्व या कन्वर्टेड व्यक्ति ग्राम सभा की इच्छा के विरुद्ध स्थानीय भूमि का दुरुपयोग न कर सकें। आमाबेड़ा मामले में भी यही कानूनी सत्यापन आवश्यक है, ताकि मिशनरी साजिशें परंपराओं को कुचल न सकें।
लगातार बढ़ रहे मामले
आमाबेड़ा की घटना कोई अपवाद या पहली घटना नहीं है। इससे पूर्व भी छत्तीसगढ़ के विभिन्न क्षेत्रों में इस तरह की घटनाएं घट चुकी हैं। ईसाई मिशनरियों द्वारा कन्वर्जन और स्थानीय परंपराओं के उल्लंघन की प्रवृत्ति लगातार सामने आ रही है, जिसका दुष्परिणाम पूरे सर्व समाज को भुगतना पड़ रहा है। इससे प्रदेश में सामाजिक संतुलन एवं सौहार्द गंभीर रूप से प्रभावित हो रहा है। एक आंकड़े के अनुसार, छत्तीसगढ़ में ईसाई जनसंख्या 2001 में 4.01 लाख थी, जो 2011 में बढ़कर 4.90 हो गई। प्रदेश में चर्चों की संख्या का कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं है, लेकिन 5 लाख ईसाई आबादी वाले राज्य में 150 से अधिक चर्च बन चुके हैं और सौ से अधिक प्रार्थना केंद्र हैं। खास बात यह है कि कन्वर्जन की सर्वाधिक गतिविधियां जनजातीय समाज के बीच हुई हैं। सरगुजा और बस्तर संभाग में जनजातीय समाज को निशाना बनाकर कन्वर्जन किया गया। जशपुर जिले की तो कुल जनसंख्या का 22 प्रतिशत ईसाई आबादी है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, नारायणपुर के भूमियाबेड़ा, तेरदुल, घुमियाबेड़ा, चिपरेल, कोहड़ा, ओरछा, गुदाड़ी जैसे अनेक गांव ईसाई बहुल हो चुके हैं। अब स्थिति यह है कि प्रदेश के सतनामी, साहू, देवांगन, चंद्राकर समेत अनेक शांतिप्रिय समाज के लोगों को भी कन्वर्जन का शिकार बनाया जा रहा है।
आरक्षण की मलाई
कन्वर्जन के इस खेल में जुटी ताकतें जनजातीय परिवारों को उनकी आस्था और पूजा पद्धति से अलग करती हैं। खास बात यह है कि कन्वर्जन के बाद ‘क्रिप्टो क्रिश्चियन’ का चलन भी तेजी से बढ़ रहा है। इसमें कन्वर्टेड व्यक्ति उपासना पद्धति तो ईसाइयत वाली अपनाता है, लेकिन नाम हिंदू ही रखता है। आरक्षण का लाभ लेने के लिए वह खुद को जनजातीय बताता है। ऐसे लोगों को आरक्षण का लाभ न मिले, इसके लिए ‘डीलिस्टिंग’ की मांग भी लंबे समय से जनजातीय बहुल राज्यों में हो रही है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने हाल ही में इस मुद्दे पर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अपने फैसले में न्यायालय ने कहा कि हिंदू धर्म छोड़कर ईसाई या किसी अन्य मत-मजहब को अपनाने वाले व्यक्ति को अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा। यह लाभ सिर्फ हिंदू धर्म के लोगों को ही मिलेगा। धर्म बदलने के बाद भी अनुसूचित जाति का लाभ लेना, संविधान के साथ धोखा है। न्यायालय ने इसे गंभीर मुद्दा बताते हुए इस पर कानूनी कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।
हिंदू समाज के लिए खतरे की घंटी
यह घटना ‘पाञ्चजन्य’ द्वारा लंबे समय से उठाए जा रहे मुद्दे को प्रमाणित करती है कि कन्वर्जन गतिविधियां अब केवल पांथिक नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक विभाजन का हथियार बन चुकी हैं। एक भाई को दूसरे भाई के विरुद्ध खड़ा करने वाली यह प्रक्रिया जनजातीय परिवारों को उनके मूल हिंदू संस्कृति से काट रही है। राजमन सलाम जैसे कन्वर्टेड लोग सरपंच और भीम आर्मी जैसे संगठनों के माध्यम से स्थानीय सत्ता हथियाने के बाद अब मिशनरियों के इशारों पर नाच रहे हैं। बाहरी तत्वों की यह संगठित भीड़ साबित करती है कि पीछे मिशनरी फंडिंग और राजनीतिक संरक्षण का हाथ है, जो हिंदू समाज को कमजोर करने का लक्ष्य रखे हुए है। ऐसी घटनाएं छत्तीसगढ़ जैसे जनजातीय बहुल क्षेत्रों में तेजी से फैल रही हैं, जहां मिशनरी लॉलीपॉप के नाम पर गरीब जनजातीय लोगों को लुभाकर कन्वर्ट कर रही हैं। परिणामस्वरूप परिवार टूट रहे हैं, भाई-भाई लड़ रहे हैं और गांवों में वैमनस्यता पनप रही है।
‘पाञ्चजन्य’ हमेशा से चेतावनी देता आया है कि यह ‘लव जिहाद’ का ईसाई संस्करण है, जिसमें अंतिम संस्कार तक परंपराओं को तोड़ने की साजिश रची जाती है। सरकार को कन्वर्जन विरोधी कठोर कानूनों को सख्ती से लागू करना होगा, ताकि मिशनरी षड्यंत्रों पर लगाम लगे।

















