असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने राज्य की जनसांख्यिकी (Demography change) को लेकर काफी गंभीर बात कही है। शनिवार को गुवाहाटी में भाजपा की राज्य कार्यकारिणी की बैठक में उन्होंने चेतावनी दी कि अगर बांग्लादेशी मूल के लोगों की आबादी 50 प्रतिशत से ज्यादा हो गई, तो असम को बांग्लादेश में मिलाने की कोशिश हो सकती है। उनका कहना है कि यह असम की अस्मिता, संस्कृति और पहचान के लिए बहुत बड़ा खतरा होगा।
जनसंख्या का बदलता चेहरा
सरमा ने कहा कि आज असम में बांग्लादेशी मूल के लोगों की आबादी 40 प्रतिशत से ऊपर पहुंच चुकी है और यह संख्या लगातार बढ़ रही है। उन्होंने पुराने आंकड़ों का हवाला दिया कि 2011 की जनगणना में मुस्लिम आबादी 34 प्रतिशत थी, जिसमें से बांग्लादेशी मूल के मुस्लिम 31 प्रतिशत और स्थानीय मुस्लिम सिर्फ 3 प्रतिशत थे। अब यह संख्या बढ़कर 40 प्रतिशत के पार हो गई है। उनका अनुमान है कि 2027 तक बांग्लादेशी मूल की आबादी 40 प्रतिशत के आसपास रहेगी। स्वदेशी (असमिया) आबादी अभी 60 प्रतिशत के करीब है, लेकिन इसमें और कमी आने की आशंका है। उन्होंने अपने जीवनकाल में देखा कि घुसपैठियों की संख्या 21 प्रतिशत से बढ़कर 40 प्रतिशत हो गई। अगर ऐसा ही चलता रहा तो उनके बच्चों के समय असमिया समुदाय की आबादी सिर्फ 30 प्रतिशत रह सकती है।
बांग्लादेश की घटना से सबक
मुख्यमंत्री ने बांग्लादेश में हाल ही में हुई ‘दीपू दास’ नाम के एक व्यक्ति की मॉब लिंचिंग का जिक्र किया। उनका कहना था कि वहां ऐसी घटनाएं हो रही हैं, तो अगले 20 सालों में असम में क्या हालात होंगे, यह आसानी से समझा जा सकता है। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर भारत और बांग्लादेश के बीच कभी युद्ध हुआ तो ये घुसपैठिए किसका साथ देंगे? उनकी वफादारी किसके प्रति होगी? यह बात उन्होंने भावुक होकर कही।
घुसपैठियों की संख्या हुई 1.5 करोड़
सरमा ने कांग्रेस पर लंबे समय तक तुष्टिकरण की राजनीति करने का आरोप लगाया। उनके अनुसार इसी वजह से राज्य में एक ‘नई सभ्यता’ विकसित हो गई है, जिसमें घुसपैठियों की संख्या अब करीब 1.5 करोड़ तक पहुंच चुकी है। उन्होंने कहा कि असम सिर्फ शंकर-माधव की भूमि है, ‘शंकर-अजान’ की नहीं। कुछ लोग अजान फकीर को महापुरुषों के बराबर बताकर असमिया संस्कृति को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन इसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
आगामी चुनाव सभ्यता की लड़ाई
उन्होंने आगामी विधानसभा चुनाव को ‘सभ्यता की लड़ाई’ बताया। यह लड़ाई अपनी माटी, जाति और भेटी (भूमि, पहचान और संस्कृति) बचाने की है। भाजपा को असम के लिए ‘उम्मीद की आखिरी किरण’ कहा और प्रधानमंत्री मोदी व गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में इस लड़ाई को जारी रखने का संकल्प लिया। उन्होंने अहोम सेनापति लाचित बोरफुकन को याद करते हुए कहा कि असम की पहचान और संस्कृति को बचाने के लिए लगातार संघर्ष करना होगा और जीत हासिल की जाएगी।

















