एक दृश्य की कल्पना करें कि किसी व्यक्ति को दिल का दौरा पड़ा है और वह बेचैन होकर अस्पताल में है। एक पाँच सितारा जैसा अस्पताल है, विकसित देश है और अत्याधुनिक सुविधाएं होने का दावा है। परंतु उस व्यक्ति को पूरे आठ घंटे तक प्रतीक्षा करवाई जाती है। उसे एक विकसित एवं अत्याधुनिक देश में चिकित्सा सेवा भी समय से प्रदान नहीं की जाती है। उसका परिवार और उसके बच्चे बेचैन रहते हैं, एक भय से भरे हुए हैं कि कहीं कुछ हो न जाए!
कथित विकसित देश की घटिया चिकित्सा व्यवस्था
उसकी पत्नी बेचैन है और वह पुरुष लगातार यह कहता जा रहा है कि उसके सीने में भयानक दर्द है। वह दर्द से मरा जा रहा है। मगर अस्पताल में नर्स यह कहती हैं कि सीने में दर्द कोई इमरजेंसी नहीं है। उसका ब्लड प्रेशर लगातार बढ़ता रहता है, मगर एक कथित विकसित देश के अत्याधुनिक अस्पताल में, जहां पर बड़ी-बड़ी मशीनें लगी हुई हैं, जहां पर लगातार ही बेहतरीन स्वास्थ्य सेवाओं का दावा किया जाता है, वहाँ पर दोपहर के बारह बजे से प्रतीक्षा करते-करते अंतत: रात को नौ बजे के लगभग भयानक दर्द उठता है और अपने पिता को देखते हुए अपना हाथ सीने पर रखता है और अंतत: हमेशा के लिए शांत हो जाता है।
श्रीकुमार तीन बच्चों के पिता थे। जब वे ऐसे गिरते हैं, तो नर्स आती हैं और सहायता के लिए आवाजें लगती हैं, उन्हें जीवन में लाने का प्रयास करती हैं, परंतु सब व्यर्थ! श्रीकुमार का जीवन उनसे हाथ छुड़ाकर चला जाता है और वह भी मात्र इसलिए क्योंकि उन्हें समय पर अस्पताल में ही चिकित्सीय सहायता नहीं मिली। बार-बार उनके द्वारा सीने में दर्द को सामान्य बताया जाता है। यह कहा जाता है कि सीने में दर्द को इमरजेंसी में नहीं माना जाता है और कोई उनका ब्लड प्रेशर भी मापने के लिए नहीं आता है। और यह सब कुछ मिनट तक नहीं रहता है, बल्कि यह सब रहता है पूरे आठ घंटे तक और श्रीकुमार अपने जीवन की लड़ाई हार जाते हैं।
वेंटिलेटर पर कनाडा की चिकित्सा
यह कहानी किसी विकासशील देश की नहीं अपितु कनाडा की है। यदि आप यह सोच रहे हैं कि यह कहानी किसी विकासशील देश की है, जहां पर कथित अत्याधुनिक अस्पताल न हों या फिर कथित सुविधाएं न हों, तो आप पूरी तरह से गलत हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण घटना हुई है नस्लीय श्रेष्ठता से भरे हुए कनाडा में। 22 दिसंबर का दिन श्रीकुमार के परिवार के लिए दुर्भाग्य लेकर आया। वह ऐसा अनुभव लेकर अया, जिसकी टीस उनके दिल में हमेशा रहेगी। उनके दिल में यह प्रश्न रहेगा कि आखिर विकसित और अत्याधुनिक कहे जाने वाले देश कनाडा में श्रीकुमार को आठ घंटे तक प्रतीक्षा करनी पड़ी, मात्र इमरजेंसी सेवाओं के लिए?
8 घंटे तक तड़पता रहा भारतीय
क्या बीती होती उस पिता पर, जिन्होंने अपने बेटे को केवल इस आधार पर अपने सामने दम तोड़ते हुए देखा कि उनके बेटे को कनाडा जैसे कथित आधुनिक देश में आठ घंटे तक आपात चिकित्सा नहीं मिली? उनके पिता ने कहा कि उनके बेटे के अंतिम शब्द थे कि “वह अब दर्द नहीं बर्दाश्त कर पा रहा है!”
पिता के बार-बार अनुरोध करने पर स्टाफ ने श्रीकुमार की ईसीजी को लिया और उन्हें सूचित किया कि किसी भी तरह की आपात स्थिति नहीं है और उन्हें कुछ दवाइयाँ दी गईं और उन्हें आठ घंटे तक प्रतीक्षा करवाई गई। और इसी बीच उनका रक्तचाप बहुत तेजी से बढ़ा और अंत में उन्हें जब उपचार के लिए ले जाया गया, तब तक उनकी देह निर्जीव हो चुकी थी।
यह घटना इसलिए महत्वपूर्ण है कि यह मृत्यु टाली जा सकती थी। यह मृत्यु केवल और केवल इसलिए हुई, क्योंकि उन्हें आपात चिकित्सा नहीं मिली। यह घटना उस असंवेदनहीनता को भी दिखाती है, जो कनाडा में आम नागरिकों के प्रति दिखती रहती है।
भारत सरकार ने कहा-“कनाडा ले जिम्मेदारी”
इस घटना को लेकर भारत सरकार सख्त है। भारत सरकार के विदेश मंत्रालय ने इस घटना का संज्ञान लेते हुए कि कनाडा सरकार को इस मामले में जिम्मेदारी लेनी चाहिए। मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि वह भारतीय मूल के कनाडाई नागरिक थे और तो यह जाहिर है कि कनाडा सरकार को इस मामले में अपनी जिम्मेदारी लेनी चाहिए।
कनाडा में इलाज के इंतजार में मारे जाते हैं हजारों
ऐसा नहीं है कि कनाडा में एक श्रीकुमार ही इस प्रकार की चिकित्सीय लापरवाही के शिकार हुए हैं। इसी वर्ष के आरंभ में ही एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी, जिसमें यह स्पष्ट लिखा गया था कि इलाज के इंतजार में ही 15,000 से अधिक रोगी मारे गए थे।
SecondStreet.org नामक संस्था ने Died on a Waiting List नामक एक रिपोर्ट का प्रकाशन किया था और इसमें लिखा गया था कि कैसे हजारों लोग केवल इसलिए असमय कनाडा में मारे गए क्योंकि उनकी जांच आदि में काफी लम्बा समय लगना था। इस संस्था ने 1 अप्रैल 2023 से 31 मार्च 2024 के बीच प्रांतीय सरकारों और स्वास्थ्य अधिकारियों से आंकड़े इकट्ठे किये थे। 18 वर्षीय लॉरा हिलर की कहानी ने इस संस्था को इस कार्य के लिए प्रेरित किया था। लॉरा हिलर एक 18 वर्ष की ओंटारियो की मरीज थी। जिसका निधन कैंसर के इलाज के लिए वेटिंग लिस्ट के दौरान हो गया था। बड़ी बात ये है कि कनाडा की घटिया स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर पाञ्चजन्य ने इससे पहले भी रिपोर्ट प्रकाशित किया था। उसमें बताया गया था कि किस प्रकार से कथित विकसित कहे जाने वाले कनाडा में लोग इलाज के अभाव में अपनी जान गंवा रहे हैं।
इस रिपोर्ट ने उस कलई को खोल दिया था, जो कथित आधुनिक कहे जाने वाले कनाडा ने अपने ऊपर लगा रखी थी। और अब श्रीकुमार की ऐसी मृत्यु से भी उस झूठ का नकाब हट गया है, जो श्रेष्ठतावादी होने का दंभ पाले कथित आधुनिक देश लगाए रहते हैं। दुर्भाग्य से नस्लवादी मीडिया भी ऐसी रिपोर्ट्स और घटनाओं को दबाने का कार्य करता है, जो उसके आकाओं की पोल खोलती रहती हैं।












