नई दिल्ली। दक्षिण चीन सागर (South China Sea) को लेकर भारत की साफ, अडिग और सशक्त विदेश नीति अब ड्रैगन (चीन) को बुरी तरह चुभने लगी है। अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानूनों के सम्मान और नौवहन की स्वतंत्रता पर भारत के बेबाक रुख ने बीजिंग को हिलाकर रख दिया है।
भारत ने समुद्री कानून पर संयुक्त राष्ट्र की संधि (UNCLOS) के तहत 2016 में आए ऐतिहासिक मध्यस्थता फैसले की वर्षगांठ पर अपने आधिकारिक रुख को एक बार फिर पुरजोर तरीके से दोहराया है। भारत के इस सशक्त बयान के बाद चीनी गलियारों में भारी बौखलाहट देखी जा रही है।
यही वजह है कि भारत में चीन के राजदूत शू फीहोंग और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने अपनी झुंझलाहट सोशल मीडिया और संपादकीय के जरिए प्रकट की है। यह पहला मौका है जब इस रणनीतिक मुद्दे पर दोनों देशों के बीच इतनी सीधी और तीखी प्रतिक्रियाएं आमने-सामने आई हैं।
साउथ चाइना सी पर भारत का दो-टूक जवाब- ‘अंतरराष्ट्रीय नियमों का हो पालन’
बता दें कि हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता ट्रिब्यूनल ने वर्ष 2016 में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए दक्षिण चीन सागर में चीन के तथाकथित ‘ऐतिहासिक संप्रभुता के दावों’ को पूरी तरह से खारिज कर दिया था।
इसी फैसले की वर्षगांठ पर अमेरिका, ब्रिटेन और फिलीपींस समेत 14 प्रमुख देशों ने एक संयुक्त पत्र जारी कर अंतरराष्ट्रीय समुद्री नियमों को लागू करने की वकालत की।
वहीं भारत ने भी वैश्विक मंच पर वैश्विक व्यवस्था का समर्थन करते हुए अपनी स्थिति स्पष्ट की।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रंधीर जायसवाल ने भारत का पक्ष पुरजोर तरीके से रखते हुए कहा-
“साउथ चाइना सी मुद्दे पर भारत का रुख पूरी तरह से स्पष्ट और जगजाहिर है। हम UNCLOS में वर्णित अंतरराष्ट्रीय कानूनों के अनुसार अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में नौवहन (Navigation) और उड़ानों की स्वतंत्रता, समुद्र के अन्य वैधानिक उपयोगों तथा बिना किसी रुकावट के अंतरराष्ट्रीय व्यापार को बनाए रखने पर जोर देते हैं। समुद्री विवादों को हमेशा शांतिपूर्ण तरीके से और यूएन संधि के अनुसार ही सुलझाया जाना चाहिए। 2016 का मध्यस्थता ट्रिब्यूनल का फैसला विवादों को शांतिपूर्ण ढंग से सुलझाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है।”
ग्लोबल टाइम्स और चीनी राजदूत की बौखलाहट आई सामने
भारत द्वारा अंतरराष्ट्रीय कानून के समर्थन में आवाज बुलंद करने से चीनी खेमे को करारा झटका लगा है।
भारत में नियुक्त चीनी राजदूत शू फीहोंग ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (X) पर अपनी खीझ निकालते हुए इस ऐतिहासिक अदालती फैसले को महज ‘एक राजनीतिक तमाशा और कानूनी प्रक्रिया का ढोंग’ करार दे दिया।
उन्होंने दावा किया कि यह फैसला चीन की संकल्प शक्ति को नहीं हिला सकता।
इसी बौखलाहट को आगे बढ़ाते हुए चीनी सरकार के मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स (Global Times) ने भारत पर तीखी टिप्पणी करते हुए उसे ‘अवसरवादी’ तक कह डाला।
ग्लोबल टाइम्स ने अपनी ताजा टिप्पणी में लिखा कि भारत दक्षिण चीन सागर का सीधा दावेदार नहीं है, इसलिए इस क्षेत्र में उसका कोई सीधा दांव नहीं है।
वहीं चीनी मीडिया ने आरोप लगाया कि भारत इस वैश्विक मंच पर केवल अपना भू-राजनीतिक महत्व (Geopolitical Importance) प्रदर्शित करने की कोशिश कर रहा है और 2016 के फैसले का समर्थन करना उसकी ‘पुरानी आदत’ का हिस्सा है।
चीन को क्यों लगी मिर्ची? भारत की हिंद-प्रशांत रणनीति है वजह
दरअसल, चीन की इस तीखी प्रतिक्रिया और छटपटाहट के पीछे भारत की बदलती और आक्रामक वैश्विक रणनीति है। चीन को यह बात कभी रास नहीं आई कि 2016 के फैसले के बाद से भारत ने हिंद-प्रशांत क्षेत्र (Indo-Pacific Region) को लेकर अपनी नीति को रक्षात्मक से बदलकर अत्यधिक मुखर कर लिया है।
भारत की मजबूत होती रणनीतिक घेराबंदी:
- क्वाड (QUAD) की सक्रियता: भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ मिलकर ‘क्वाड’ संगठन के माध्यम से क्षेत्र में कानून-आधारित व्यवस्था की वकालत कर रहा है।
- फ्री एंड ओपन इंडो-पैसिफिक: भारत अब इस मुद्दे को केवल फिलीपींस और चीन का द्विपक्षीय विवाद नहीं मानता, बल्कि इसे पूरे हिंद-प्रशांत क्षेत्र की व्यापक सुरक्षा और फ्री समुद्री व्यापार से जोड़कर देखता है।
- एक्ट ईस्ट पॉलिसी का विस्तार: भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा हाल ही में किए गए इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे देशों के रणनीतिक दौरे ने दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत की स्थिति को बेहद मजबूत किया है, जिससे चीन की एकतरफा दादागिरी पर अंकुश लगा है।
साउथ चाइना सी पर भारत का यह हालिया रुख यह साफ संदेश देता है कि भारत वैश्विक समुद्री कानूनों के उल्लंघन को चुपचाप स्वीकार नहीं करेगा।
वहीं चीन की यह ताजा बौखलाहट इसी बात का प्रमाण है कि भारत की अंतरराष्ट्रीय कूटनीति अब बीजिंग के विस्तारवादी मंसूबों पर भारी पड़ती जा रही है।











