मुगल सत्ता का स्याह सच, इस्लामिक कन्वर्जन और साहिबजादों का बलिदान
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मुगल सत्ता का स्याह सच, इस्लामिक कन्वर्जन और साहिबजादों का बलिदान

26 दिसंबर 1705 की वह सुबह भारतीय इतिहास की सबसे क्रूर सुबहों में से एक है। ईंट गारे से उठती दीवार के साथ साहस भी ऊंचा होता गया। न आंसू, न भय सिर्फ अपने विश्वास पर विश्‍वास। माता गुजरी जी ने भी गहरे शोक में प्राण त्याग दिए। बाबा जोरावर सिंह और बाबा फतेह सिंह को जिंदा ही दीवार में चुनवा दिया गया।

Written byडाॅ. मयंक चतुर्वेदीडाॅ. मयंक चतुर्वेदी
Dec 26, 2025, 09:22 am IST
inभारत
साहिबजादा जोरावर सिंह और साहिबजादा फतेह सिंह

साहिबजादा जोरावर सिंह और साहिबजादा फतेह सिंह

इतिहास जितनी बार दोहराया जाए हर बार कोई न कोई सबक सिखाता है, कुछ तिथियां इतिहास की ऐसी होती हैं जिन्‍हें आप चाहकर भी भुला नहीं सकते । ऐसा ही दिन आज का है जब सत्ता ने अपने मजहब को हथियार बनाया और क्रूरता की सारी हदें पार की। मध्यकालीन भारत में इस्‍लामिक मुगल शासन के दौर में गैर मुसलमानों पर अनेक जुल्म ढाए गए। करों दंडों और भय के सहारे जबरन मजहबीकरण (धर्मांतरण) की कोशिशें की गईं। इसी अंधकार में साहिबजादा जोरावर सिंह और साहिबजादा फतेह सिंह के बलिदान से दीवारें भी कांप उठीं। उनका हुतात्‍मा हो जाना आज सिर्फ सिख इतिहास भर नहीं है, यह घटना भारतीय आत्मसम्मान की अमिट गाथा है।

मुगलों ने किया इस्लामिक कन्वर्जन

मुगल साम्राज्य में जजिया जैसे कर, मंदिरों पर आक्रमण, तीर्थों पर प्रतिबंध और विद्रोह कुचलने के लिए प्रलोभन के सहारे मजहबीकरण की नीति अपनाई गई। इसी पृष्ठभूमि में सिख पंथ अन्याय के प्रतिरोध का स्वर बना। गुरु नानक देव जी की करुणा से लेकर गुरु तेग बहादुर जी के बलिदान तक सिख परंपरा ने धर्म की स्वतंत्रता को सर्वोपरि माना। सिख पंथ भी हिन्‍दू धर्म की एक संत परंपरा आधारित दर्शन धारा थी, उस समय इस संत परंपरा के जितने अनुयायी थे वे सभी हिन्‍दू समाज के अभिन्‍न अंग थे।

गुरु तेग बहादुर का बलिदान

इस्‍लामिक अत्‍याचार से त्रस्‍त होकर अनेक हिन्‍दू समाज के लोग गुरु तेग बहादुर जी के पास गए थे और मुगल हिंसा के समाधान के लिए मार्ग प्रशस्‍त करने के लिए निवेदन किया। तब गुरु जी ने स्‍वयं से आगे होकर मुगल सत्‍ता से बात करने का आश्‍वासन दिया, इसके परिणाम में तत्‍कालीन इस्‍लामिक मुगल शासक औरंगजेब ने क्‍या किया! दिल्‍ली में सिख पंथ के नौवें गुरु तेग बहादुर जी का चांदनी चौक दिल्ली में 24 नवंबर 1675 को शीश काटकर बलिदान हुआ। गुरु तेग बहादुर जी ने स्पष्ट कहा था कि वे न तो इस्लाम स्वीकार करेंगे और न ही किसी को जबरन धर्म बदलने देंगे।

गुरु जी के अनुयायियों पर हिंसा

गुरु जी से पहले शहीद किए गए उनके तीन प्रमुख अनुयायियों पर भयंकर हिंसा की गई। भाई मती दास जी जोकि गुरु जी के प्रमुख सेवक थे, उन्‍हें मुगलों ने जिंदा आरी से चीर दिया, किंतु भाई मती दास जी ने अंतिम क्षणों में भी जाप और ध्यान नहीं छोड़ा। उनका बलिदान इतिहास के सबसे क्रूर अत्याचारों में गिना जाता है। इसी तरह से भाई सती दास जोकि भाई मती दास के छोटे भाई थे, इस्‍लाम के अनुयायी मुगलों ने उन्‍हें रुई में लपेटकर जिंदा जला दिया, क्‍योंकि उन्होंने भी धर्म परिवर्तन से इंकार कर दिया था। उन्‍होंने भी अपने बड़े भाई की तरह ही अत्याचार के बीच भी गुरु और ईश्वर में अडिग आस्था रखी। इन दोनों की तरह ही भाई दयाला जोकि गुरु जी के परम भक्त थे उन्‍हें उबलते पानी में डालकर मार दिया गया, उन्होंने भी अंतिम सांस तक इस्लाम स्वीकार नहीं किया। आगे गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपने धर्म पर अडिग रहने की इस परंपरा को और सुदृढ़ किया और न्याय आत्मसम्मान तथा साहस की शिक्षा अपने शिष्‍यों को दी।

गुरु गोबिंद सिंह पर दबाव बनाया गया

सन् 1704–1705 की सर्दियों में आनंदपुर साहिब की घेराबंदी इसी संघर्ष का निर्णायक अध्याय बनी। मुगलों ने गुरु गोबिंद सिंह जी पर इस्‍लाम कबूल कर लेने का दबाव बढ़ाया। ऐसे में संघर्ष स्‍वभाविक था, तब सरसा नदी पार करते समय परिवार बिछुड़ गया। माता गुजरी जी अपने दो पोतों साहिबजादा जोरावर सिंह (नौ वर्ष) और साहिबजादा फतेह सिंह (सात वर्ष) के साथ अलग हो गईं। वे सरहिंद के सूबेदार नवाब वजीर खान की कैद में पहुंच जाती हैं। यहीं इस्‍लामिक सत्ता का क्रूर हिंसक चेहरा एक बार फिर उजागर होता है।

धर्म से समझौता नहीं

बाबा जोरावर सिंह और बाबा फतेहसिंह को ठंडे बुर्ज की यातनाएं दी गईं, ताकि मनोवैज्ञानिक दबाव बनाया जा सके और वे इस्‍लाम अपना लें। भय अकेलापन और प्रलोभन के सहारे आस्था को तोड़ने की तमाम कोशिशें हुईं। दरबार में उन्हें इस्लाम स्वीकार करने पर धन, महल और सुरक्षा का लालच दिया गया। किंतु इन दो महावीरों ने दृढ़ता दिखाई जो किसी भी साम्राज्य से बड़ी थी। उनका उत्तर स्पष्ट था कि धर्म बिकाऊ नहीं और सत्य पर समझौता अस्वीकार्य है।

बाबा जोरावर सिंह और फतेह सिंह को दीवार में जिंदा चुनवाया

वजीर खान का क्रोध उसी क्षण फूट पड़ा । सबसे क्रूर दंड का आदेश दिया गया। 26 दिसंबर 1705 की वह सुबह भारतीय इतिहास की सबसे क्रूर सुबहों में से एक है। ईंट गारे से उठती दीवार के साथ साहस भी ऊंचा होता गया। न आंसू, न भय सिर्फ अपने विश्वास पर विश्‍वास। माता गुजरी जी ने भी गहरे शोक में प्राण त्याग दिए। बाबा जोरावर सिंह और बाबा फतेह सिंह को जिंदा ही दीवार में चुनवा दिया गया।

वीर बाल दिवस स्मृति को सम्मान

साहिबजादों के बलिदान ने यह संदेश दिया कि आस्था किसी भी बल प्रयोग से कहीं ऊपर है। यही कारण है कि यह घटना सिख समुदाय की स्मृतियों के साथ संपूर्ण हिन्‍दू समाज के लिए मुखर चेतना बनी। आज वीर बाल दिवस इसी स्मृति को राष्ट्रीय सम्मान देता है। वर्ष 2022 में 26 दिसंबर को वीर बाल दिवस घोषित कर बाबा जोरावर सिंह और बाबा फतेह सिंह की वीरता को नमन किया गया। यह दिवस हमें याद दिलाता है कि आज का भारत जैसा भी, जितना भी शेष है वह इन बलिदानियों की कसौटी के परिणाम का सुफल है।

बलिदान हमेशा रहेगा याद

कहना होगा कि साहिबजादा जोरावर सिंह और साहिबजादा फतेह सिंह हर भारतीय की स्‍मृतियों में जो अपने देश से अपार प्रेम करते हैं उनके बीच अमर हैं क्योंकि उन्होंने सिद्ध किया कि वीरता उम्र की मोहताज नहीं होती है। उनका बलिदान हर पीढ़ी को यह प्रश्न पूछने पर विवश करता है कि क्या हम अन्याय के सामने खड़े होने का साहस रखते हैं? जब तक यह प्रश्न जीवित है तब तक भारत अपने संपूर्ण स्‍वर और चेतना के साथ मुखरता से खड़ा हुआ है। दोनों साहिबजादों के श्रीचरणों में शत् शत् नमन…..

Topics: वीर बाल दिवससाहिबजादों का बलिदानपाञ्चजन्य विशेषबाबा जोरावर सिंहबाबा फतेह सिंह
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और हिंदुस्थान समाचार से संबद्ध हैं। [Read more]
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