अटल जी : स्मृतियों में बसे एक युगपुरुष
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अटल जी : स्मृतियों में बसे एक युगपुरुष

राजनीति के आकाश में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जो केवल सत्ता या पद से नहीं, बल्कि अपने विचार, आचरण और संवेदना से भरे कद से पहचाने जाते हैं। भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी ऐसे ही एक युगपुरुष थे। वे केवल भारत के प्रधानमंत्री नहीं थे, बल्कि राजनीति को मानवीय गरिमा, वैचारिक शालीनता और राष्ट्रीय चेतना से जोड़ने वाले दुर्लभ नेता थे।

Written byकैलाश विजयवर्गीयकैलाश विजयवर्गीय
Dec 25, 2025, 09:48 pm IST
in भारत, विश्लेषण

राजनीति के आकाश में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जो केवल सत्ता या पद से नहीं, बल्कि अपने विचार, आचरण और संवेदना से भरे कद से पहचाने जाते हैं। भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी ऐसे ही एक युगपुरुष थे। वे केवल भारत के प्रधानमंत्री नहीं थे, बल्कि राजनीति को मानवीय गरिमा, वैचारिक शालीनता और राष्ट्रीय चेतना से जोड़ने वाले दुर्लभ नेता थे। अटल जी पर संस्मरण लिखना वस्तुतः उस कालखंड को याद करना है, जब मतभेद भी मर्यादा में बंधे होते थे और विरोध में भी संवाद की संभावना जीवित रखी जाती थी।

अटल जी का व्यक्तित्व बहुआयामी था। एक ओर वे ओजस्वी वक्ता थे, जिनके भाषण संसद से लेकर जनसभाओं तक श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देते थे; दूसरी ओर वे एक संवेदनशील कवि भी थे, जिनकी कविताओं में मनुष्य, राष्ट्र और समय की पीड़ा बोलती थी। उनकी कविता “हार नहीं मानूंगा” आज भी सोशल मीडिया पर लाखों लोगों द्वारा देखी और सुनी जाती है। यह कविता कई लोगों के जीवन का मंत्र बन चुकी है। राजनीति उनके लिए सत्ता का साधन नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माण का माध्यम थी। यही कारण है कि उनके विरोधी भी उनके व्यक्तित्व के प्रशंसक रहे।

इंदौर नगर निगम का संघर्ष

बात उस समय की है जब मैं 1984-85 के दौरान नगर निगम इंदौर की स्थायी समिति का अध्यक्ष था। आज की राऊ विधानसभा में पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी की मूर्ति के अनावरण के लिए हमने अटल जी को आमंत्रित किया था। मैंने अपने भाषण में अटल जी से तत्कालीन राज्य सरकार की शिकायत करते हुए कहा कि राज्य सरकार निगम को चुंगी से मिलने वाला पैसा 90% काटकर सिर्फ 10% देती है, जिसके कारण नगर निगम इंदौर का विकास बाधित हो रहा है। अतः मैं भोपाल में मुख्यमंत्री निवास के सामने अनशन करूंगा, आप आशीर्वाद दीजिए। उस समय मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री स्वर्गीय श्री मोतीलाल जी वोरा थे।

जब अटल जी बोलने खड़े हुए तो उन्होंने सलाह दी कि कैलाश तुम भोपाल में नहीं, इंदौर में अनशन करो और इंदौरवासियों से आह्वान किया कि वे इस आंदोलन में मेरा साथ दें। उनके आदेश का पालन करते हुए हमने इंदौर में राजबाड़ा पर अनशन किया और आज मुझे यह बात याद करते हुए प्रसन्नता हो रही है कि अनशन को मिले विशाल जनसमर्थन के चलते सिर्फ 8 दिन में ही राज्य सरकार को झुकना पड़ा और नतीजा यह हुआ कि चुंगी क्षतिपूर्ति के मद में निगम को 10% की जगह 60% राशि मिलने लगी, जिससे इंदौर के विकास ने गति पकड़ी। अटल जी की राजनीति की इतनी गहरी समझ से मैं पहली बार वाकिफ हुआ था।

सिद्धांतों का पाठ

1999 में अटल जी से मेरी एक और मुलाकात मुझे हमेशा याद रहेगी। उस दौरान इंदौर निगम के इतिहास में महापौर के लिए पहली बार प्रत्यक्ष रूप से हुए चुनाव में जनता द्वारा मुझे मेयर चुना गया। विधायक मैं पहले से ही था। मेयर बनने के बाद जब मैं अटल जी से आशीर्वाद लेने उनके नई दिल्ली निवास पर गया, वे अपने प्रधानमंत्री निवास के केंद्रीय कक्ष में टहल रहे थे। मुझे देखते ही मुस्कुराते हुए कहने लगे – “कैलाश… एक व्यक्ति दो पद नहीं चलेंगे, नहीं चलेंगे।” मैंने भी प्रत्युत्तर में कहा कि मान्यवर, हमारे राज्य मध्य प्रदेश में कानून इसकी इजाजत देता है। इस पर वे जोर से हंस पड़े और बोले कि “तुम्हारे मध्य प्रदेश के विधान में ऐसी व्यवस्था होगी लेकिन बीजेपी के संविधान में नहीं है।” इतना बोलकर उन्होंने अपने हाथों से मेरा मुंह लड्डू से भर दिया और मुस्कुराने लगे। तब मैने जाना कि अपने सिद्धांतों को बिना किसी पर थोपे, अपनी बात सहजता से कह देना उनका विशेष गुण था।

सादगी और आत्मीयता

अटल जी की सादगी और सरल व्यक्तित्व सबका दिल जीत लेती थी। 2003 में, प्रदेश के कुछ कार्यकर्ता उनसे मिलना चाहते थे। मैंने उनके निज सहायक श्री शक्ति सिन्हा जी, जो कि ओड़िशा कैडर के आईएएस थे, से अपॉइंटमेंट लिया। उन्होंने सुबह 9 बजे का समय दिया। हम तय समय से थोड़ा पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री निवास, 7 रेसकोर्स रोड पहुंच गए। सिन्हा जी ने हमें प्रतीक्षा कक्ष में बिठाया और बताया कि माननीय प्रधानमंत्री जी अभी नाश्ता कर रहे हैं तो कुछ समय इंतजार करना पड़ेगा। लेकिन इतने में ही भीतर से बुलावा आ गया।

हम अंदर गए तो अटल जी नाश्ता कर रहे थे और उनके साथ में ग्वालियर क्षेत्र से विधायक और अटल जी के भांजे अनूप मिश्रा जी, प्रधानमंत्री के प्रिंसिपल सेक्रेटरी ब्रजेश मिश्रा भी थे। अटल जी ने हमें अपने साथ नाश्ता करने के लिए आग्रह किया। आग्रह में इतनी आत्मीयता और प्रेम था कि मुझे तनिक भी यह महसूस नहीं हो पाया कि मुझ जैसा छोटा सा कार्यकर्ता देश के प्रधानमंत्री के साथ बैठकर नाश्ता कर रहा है। उस दिन का उनके साथ बीता एक-एक पल मुझे आज भी याद है। उस दौरान वे हमसे ऐसे बातें कर रहे थे जैसे एक पिता अपने बच्चों के साथ भोजन करते समय परिवार की बातें करता है।

मध्य प्रदेश से विशेष लगाव

मध्य प्रदेश से उन्हें विशेष लगाव था। उनका बचपन ग्वालियर क्षेत्र में बीता था। उनके बचपन के दौरान जब गर्भवती महिलाओं को बेहतर चिकित्सा की जरूरत पड़ती थी तो गांव से शहर तक सड़क ना होने से सफर मुश्किल भरा और समय लगने वाला होता था। इस कारण कई बार गर्भवती और बच्चे दोनों की जान चली जाती थी। इसलिए जब उन्होंने देश की कमान संभाली तो प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के माध्यम से बड़े पैमाने पर सड़क निर्माण का कार्य किया।

उस समय मध्य प्रदेश की सड़कों को लेकर भी वे बहुत दुखी रहते थे। इसी दौरान मध्य प्रदेश में 2003 विधानसभा चुनाव में बीजेपी की सरकार आई और मैं पीडब्ल्यूडी मंत्री बना। मैंने दिल्ली पहुंचकर उनसे मुलाकात की। सड़कों पर चर्चा के दौरान उन्होंने वादा किया कि वे इस साल मध्य प्रदेश को 1000 करोड़ रुपये देंगे साथ ही आगे भीबहर साल इतना ही पैसा देते रहेंगे, और कहा कि कैलाश तुम पैसों की चिंता किये बगैर प्रदेश की सड़कें सुधारो। दुर्भाग्यवश कुछ समय बाद हुए लोकसभा चुनाव में सरकार नहीं लौटी और उनका वह वादा पूरा नहीं हो पाया। फिर हमने राज्य के वित्तीय साधनों से ही प्रदेश की सड़कों का विकास किया।

चालीस वर्षों का रिश्ता

1980 के दशक में एक बार स्वर्गीय प्रमोद महाजन जी ने एक मुलाकात के दौरान मुझसे कहा था कि युवा मोर्चा के कार्यकर्ताओं को अटल जी से मिलते रहना चाहिए। तब से उनके जन्मदिवस पर उनसे मिलकर शुभकामनाएं देने और आशीर्वाद लेने का सिलसिला ऐसा चल पड़ा कि पिछले 40 वर्षों के बाद भी यह टूटा नहीं। जब वे जीवित थे तो उनसे मिलकर शुभकामनाएं देता था और उनका आशीर्वाद लेता था, अब उनके दिल्ली स्थित समाधि स्थल (सदैव अटल) पर आशीर्वाद लेने के इस सिलसिले को बनाए रखा है। एक शिष्य और पुत्र को अपने गुरु और पिता की जरूरत हमेशा बनी रहती है।

अटल जी के साथ और भी बहुत से किस्से हैं जिन्हें शब्दों के सीमित दायरे में बता पाना मुश्किल है।अगर उनके व्यक्तित्व को समझना हे तो उनकी 13 दिन की सरकार के अंतिम दिन संसद में उनके भाषण को देख ले। अटल जी की स्मृति हमें यह सिखाती है कि राजनीति केवल सत्ता का खेल नहीं, बल्कि विचारों और मूल्यों की साधना है। सशरीर वो आज हमारे बीच नहीं है, पर उनकी वाणी, उनके विचार और उनके प्रसंग आज भी हमारा मार्गदर्शन करते हैं। सच ही कहा गया है, कुछ व्यक्तित्व समय से बड़े होते हैं; अटल बिहारी वाजपेयी उन्हीं में से एक थे।

Topics: वैचारिक शालीनतासंसदीय मर्यादाबहुआयामी व्यक्तित्वओजस्वी वक्ताभारत रत्नसंवेदनशील कविप्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजनाकैलाश विजयवर्गीयपाञ्चजन्य विशेषराष्ट्रीय चेतनासदैव अटलयुगपुरुष
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