'वैभवशाली राष्ट्र निर्माण के लिए हिंदू एकजुटता ही लक्ष्य' : डॉ. मोहन भागवत जी
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‘वैभवशाली राष्ट्र निर्माण के लिए हिंदू एकजुटता ही लक्ष्य’ : डॉ. मोहन भागवत जी

कोलकाता में RSS व्याख्यानमाला के दौरान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने संघ की स्थापना, हिंदू स्वभाव, शाखा प्रणाली और राष्ट्र निर्माण के लक्ष्य पर खुलकर बात की।

Written byएजेंसीएजेंसी — edited by Shivam Dixit
Dec 21, 2025, 07:44 pm IST
in भारत, संघ को जानें, संघ @100, पश्चिम बंगाल

कोलकाता, (हि.स.) । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कोलकाता में आयोजित व्याख्यानमाला के दौरान संघ की स्थापना, विचारधारा, कार्यपद्धति और भविष्य की दिशा पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि संघ किसी के विरोध के लिए नहीं, बल्कि हिंदू समाज को संगठित करने और राष्ट्र को वैभवशाली बनाने के उद्देश्य से बना है। संघ को लेकर समाज में जो धारणाएं बनती हैं, वे अक्सर अधूरी जानकारी और गलत नैरेटिव पर आधारित होती हैं।

संघ को लेकर फैली गलत धारणाओं पर सरसंघचालक की दो टूक

रविवार को साइंस सिटी में एक के बाद एक दो व्याख्यानमाला को संबोधित करते हुए सरसंघचालक जी ने कहा कि लोग संघ का नाम तो जानते हैं, लेकिन उसके कार्य और उद्देश्य को ठीक से नहीं समझते। कई बार संघ के हितैषियों में भी सही जानकारी का अभाव रहता है। संघ का प्रयास है कि लोग उसके बारे में राय अफवाहों के आधार पर नहीं, बल्कि वस्तुस्थिति को समझकर बनाएं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि संघ न तो किसी राजनीतिक प्रतिक्रिया में शुरू हुआ और न ही किसी राजनीतिक उद्देश्य से चलता है।

हिंदू समाज के संगठन का उद्देश्य, किसी के विरोध का नहीं

सरसंघचालक जी ने कहा कि संघ की स्थापना इसलिए हुई ताकि भारत का समाज इतना सक्षम और संगठित बने कि विश्व में भारत की जय जयकार हो और वह विश्वगुरु के रूप में स्थापित हो सके। संघ विशुद्ध रूप से हिंदू समाज के संगठन के लिए प्रारंभ हुआ, लेकिन इसका अर्थ किसी अन्य समुदाय का विरोध करना नहीं है। उन्होंने द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी के कथन का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि दुनिया में एक भी ईसाई या मुसलमान न होता, तब भी हिंदू समाज के संगठन की आवश्यकता रहती, क्योंकि समाज भीतर से बंटा हुआ है।

1857 की क्रांति के बाद समाज सुधार की आवश्यकता समझी गई

उन्होंने 1857 की क्रांति का उल्लेख करते हुए कहा कि उसकी असफलता के बाद यह प्रश्न खड़ा हुआ कि इतने साहसी और बुद्धिमान होने के बावजूद भारत पर मुट्ठी भर अंग्रेज कैसे शासन कर सके। उस समय यह स्पष्ट हुआ कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता ही नहीं, बल्कि समाज सुधार अधिक आवश्यक है। रूढ़ियां, कुरीतियां और आत्मविस्मृति हमारी बड़ी कमजोरी थीं। स्वामी विवेकानंद और महर्षि दयानंद ने भारतीय समाज को उसकी पहचान याद दिलाने का कार्य किया और इसी कालखंड में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का उदय हुआ।

डॉ. हेडगेवार का जीवन और संघ स्थापना की पृष्ठभूमि

सरसंघचालक जी ने डॉ. हेडगेवार के जीवन का उल्लेख करते हुए बताया कि उनके माता पिता का निधन उनके 11 वर्ष की आयु में प्लेग रोगियों की सेवा करते हुए हो गया था। अत्यंत निर्धनता में जीवन बिताने के बावजूद वे मेधावी रहे और आजीवन भारत माता की सेवा में लगे रहे। दस वर्षों के गहन चिंतन के बाद 1925 में विजयादशमी के दिन संघ की स्थापना हुई, जिसका उद्देश्य संपूर्ण हिंदू समाज का संगठन करना था।

व्यक्ति निर्माण के माध्यम से समाज परिवर्तन की संघ की कार्यपद्धति

सरसंघचालक जी ने कहा कि संघ की कार्यपद्धति व्यक्ति निर्माण के माध्यम से समाज परिवर्तन की है। शाखा का अर्थ है दिन का एक घंटा सब कुछ भूलकर देश और समाज के लिए चिंतन करना। उन्होंने स्पष्ट किया कि हिंदू किसी एक पूजा पद्धति, खान पान या वेशभूषा का नाम नहीं है। हिंदू कोई धर्म या मजहब नहीं, बल्कि एक स्वभाव है। जो भारत की संस्कृति और मातृभूमि को मानता है, वह हिंदू है। विविधता में एकता खोजने का विचार ही सनातन और हिंदू स्वभाव की पहचान है।

विचार भिन्न हो सकते हैं, लेकिन राष्ट्र निर्माण के लिए मन एक हो

संघ के शताब्दी वर्ष के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम के दूसरे सत्र में सरसंघचालक जी ने कहा कि विचारों की स्पर्धा स्वाभाविक है, लेकिन राष्ट्र निर्माण के लिए मन एक रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि संघ का मूल स्वभाव मित्रता, सामूहिकता और निस्वार्थ सेवा है। संघ स्वयंसेवकों को नियंत्रित नहीं करता, बल्कि समाज के साथ मिलकर कार्य करता है। उन्होंने बताया कि आज देश के सवा एक लाख से अधिक स्थानों पर संघ की उपस्थिति है और आने वाले समय में शेष क्षेत्रों तक पहुंचने का लक्ष्य है।

पंच प्रण के माध्यम से समाज और राष्ट्र निर्माण का आह्वान

सरसंघचालक जी ने पंच प्रण पर जोर देते हुए सामाजिक समरसता, कुटुम्ब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्वदेशी और संविधान को आचरण में उतारने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि भारत, हिंदुस्थान और हिंदू समानार्थी हैं और सबको साथ लेकर चलने वाला संगठन यदि कोई है, तो वह संघ है। अंत में उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ श्रेय लेने के लिए नहीं, बल्कि समाज के साथ मिलकर राष्ट्र निर्माण के लिए निरंतर कार्य करता है।

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