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होम भारत

जिनके लिए मातृभूमि मजहब से ऊपर थी, भारत को अशफाक चाहिए,गज़वा-ए-हिंद वाले नहीं

अशफाक उल्ला खां का जन्म 22 अक्टूबर 1900 ई. में उत्तरप्रदेश के शाहजहांपुर स्थित शहीदगढ़ में हुआ था। उनके पिता का नाम मोहम्मद शफीक उल्ला खां और मां का नाम मज़हुरुन्निशां बेगम था।

Written byडॉ. आनंद सिंह राणाडॉ. आनंद सिंह राणा
Dec 19, 2025, 06:26 pm IST
in भारत
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अशफाक उल्ला खां

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अशफाक उल्ला खां

अशफाक उल्ला खान की फांसी का दिन 19 दिसंबर 1927 नहीं भूलता है। इस दिन फांसी-पूर्व उन्होंने मातृभूमि की स्मृति में अपनी निम्न पंक्तियां गुनगुनायी थीं-

“कुछ आरजू नहीं है, है आरजू तो यह
रख दे कोई जरा सी, खाके वतन कफन में,
मौत और जिंदगी है,दुनिया का सब तमाशा,
फरमान कृष्ण का था, अर्जुन का बीच रन में,
अफसोस क्यों नहीं है,वह रुह अब वतन में,
जिसने हिला दिया था, दुनिया को एक पल में।”

धर्म से ऊपर देश: अमर शहीद अशफाक उल्ला खां का प्रेरक जीवन

महान क्रांतिकारी और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अशफाक उल्ला खां की उक्त पंक्तियां यही कहती हैं कि हैं कि राष्ट्र की सेवा से बढ़कर कुछ नहीं है। कथित वामपंथियों तथा सेक्यूलरों को भी सूचित हो कि हमें अशफाक चाहिए न कि गजवा -ए-हिंद, इस्लामिक स्टेट, लव जिहाद के काले सपने पाले देशद्रोही। अशफाक उल्ला खां का जन्म 22 अक्टूबर 1900 ई. में उत्तरप्रदेश के शाहजहांपुर स्थित शहीदगढ़ में हुआ था। उनके पिता का नाम मोहम्मद शफीक उल्ला खां और मां का नाम मज़हुरुन्निशां बेगम था। वे पठान परिवार से संबंध रखते थे और उनके परिवार में लगभग सभी सरकारी नौकरी में थे। बाल्यावस्था में अशफाक का मन पढ़ाई में नहीं लगता था। उनकी रुचि तैराकी, घुड़सवारी, निशानेबाजी में अधिक थी। उन्हें कविताएं लिखने का काफी शौक था, जिसमें वे अपना उपनाम हसरत लिखा करते थे। गांधीजी के असहयोग आंदोलन की असफलता से अशफाक उल्ला खां उद्विग्न थे।

अतः क्रांतिकारी घटनाओं से प्रभावित अशफाक के मन में भी क्रांतिकारी भाव जागे और उसी समय अथक प्रयासों के फलस्वरूप मैनपुरी षड्यंत्र के मामले में सम्मिलित रामप्रसाद बिस्मिल से हुई और वे भी क्रांति की दुनिया में समा गए। इसके बाद वे ऐतिहासिक काकोरी अनुष्ठान में सहभागी बने। काकोरी अनुष्ठान (काकोरी ट्रेन एक्शन) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान् क्रान्तिकारियों द्वारा बरतानिया सरकार के विरुद्ध भयंकर युद्ध छेड़ने की दृष्टि से हथियार खरीदने के लिये ब्रिटिश सरकार द्वारा भारतीयों से लूटे धन को हस्तगत करने के लिए हैरतअंगेज कारनामा था।

काकोरी कांड का विवरण

यह ऐतिहासिक अनुष्ठान  9 अगस्त 1925 को हुआ। इस ट्रेन आक्रमण में जर्मनी के बने चार माउजर पिस्तौल काम में लाये गये थे। इन पिस्तौलों की विशेषता यह थी कि इनमें बट के पीछे लकड़ी का बना एक और कुन्दा लगाकर रायफल की तरह उपयोग किया जा सकता था। हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन के केवल दस सदस्यों ने इस पूरी घटना को अंजाम दिया।

यह थी काकोरी घटना

महान् क्रान्तिकारियों द्वारा चलाए जा रहे स्वतन्त्रता के आन्दोलन को गति देने के लिये धन की शीघ्र प्रतिपूर्ति के लिए शाहजहाँपुर में हुई बैठक के दौरान राम प्रसाद बिस्मिल ने अंग्रेजी सरकार का खजाना हस्तगत करने की योजना बनायी थी। राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी ने 9 अगस्त 1925 को लखनऊ जिले के काकोरी रेलवे स्टेशन से छूटी “आठ डाउन सहारनपुर-लखनऊ पैसेन्जर ट्रेन” को चेन खींच कर रोका और पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में अशफाक उल्ला खां, चन्द्रशेखर आज़ाद व 6 अन्य सहयोगियों की सहायता से समूची ट्रेन पर धावा बोलते हुए सरकारी खजाना हस्तगत कर लिया।

इन क्रांतिकारियों को दी गई फांसी की सजा

ब्रिटिश सरकार दहल उठी और उसने हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के कुल 40 क्रान्तिकारियों पर सम्राट के विरुद्ध सशस्त्र युद्ध छेड़ने, सरकारी खजाना लूटने व यात्रियों की हत्या करने का प्रकरण चलाया जिसमें राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां तथा ठाकुर रोशन सिंह को मृत्यु-दण्ड (फाँसी की सजा) सुनायी गयी। इस प्रकरण में 16 अन्य क्रान्तिकारियों को कम से कम 4 वर्ष की सजा से लेकर अधिकतम काला पानी (आजीवन कारावास) तक का दण्ड दिया गया था। अशफाक उल्ला खां सबसे अंत में पकड़े गए थे।

क्रांतिकारी एकता और आपसी विश्वास

यह भारत का दुर्भाग्य ही रहा कि सभी क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कराने में अपने लोगों ने सहयोग किया। रामप्रसाद बिस्मिल पर अशफाक उल्ला खान की अगाध आस्था थी। पैरवी के समय अदालत में तो अशफाक उल्ला खां को रामप्रसाद बिस्मिल का लेफ्टिनेंट भी कहा गया।

काकोरी यज्ञ के उपरांत सी.आई.डी.के पुलिस कप्तान खानबहादुर तसद्दुक हुसैन जेल में जाकर अशफ़ाक़ से मिले और उन्हें फाँसी की सजा से बचने के लिये सरकारी गवाह बनने की सलाह दी। जब अशफाक ने उनकी सलाह को तवज्जो नहीं दी तो उन्होंने एकान्त में जाकर समझाया-“देखो अशफाक भाई! तुम भी मुस्लिम हो और अल्लाह के फजल से मैं भी एक मुस्लिम हूँ इस वास्ते तुम्हें आगाह कर रहा हूँ। ये राम प्रसाद बिस्मिल वगैरह सारे लोग हिन्दू हैं। ये यहाँ हिन्दू सल्तनत कायम करना चाहते हैं। तुम कहाँ इन काफिरों के चक्कर में आकर अपनी जिन्दगी जाया करने की जिद पर तुले हुए हो। मैं तुम्हें आखिरी बार समझाता हूँ, मियाँ! मान जाओ; फायदे में रहोगे।”

अशफ़ाक़ उल्ला ख़ान का साहस

इतना सुनते ही अशफ़ाक़ की त्योरियाँ चढ़ गयीं और वे गुस्से में डाँटकर बोले-“खबरदार! जुबान संभाल कर बात कीजिये। पण्डित जी (राम प्रसाद बिस्मिल) को आपसे ज्यादा मैं जानता हूँ। उनका मकसद यह बिल्कुल नहीं है,और अगर हो भी तो हिन्दू राज्य तुम्हारे इस अंग्रेजी राज्य से बेहतर ही होगा। आपने उन्हें काफिर कहा इसके लिये,मैं आपसे यही दरख्वास्त करूँगा कि मेहरबानी करके आप अभी इसी वक्त यहाँ से तशरीफ ले जायें वरना मेरे ऊपर दफा 302 (कत्ल) का एक केस और कायम हो जायेगा।” अंततः भारत माता के वीर सपूत अशफाक उल्ला खान क़ो काकोरी अनुष्ठान के आरोप में 19 दिसंबर 1927 को फैजाबाद जेल में फांसी पर चढ़ा दिया गया।

अशफाक उल्ला खान मुसलमान थे,परंतु मातृभूमि उनके लिए मजहब से ऊपर थी, जिसकी पुष्टि उनकी इस कविता से होती है-

“जाऊँगा खाली हाथ मगर, यह दर्द साथ ही जाएगा ;
जाने किस दिन हिंदुस्तान, आजाद वतन कहलाएगा।
बिस्मिल हिंदू हैं कहते हैं,फिर आऊँगा – फिर आऊँगा ;
ले नया जन्म ऐ भारत मां! तुझको आजाद कराऊँगा।।
जी करता है, मैं भी कह दूँ,
पर मजहब से बँध जाता हूँ ;
मैं मुसलमान हूँ पुनर्जन्म की बात नहीं कह पाता हूँ।
हाँ, खुदा अगर मिल गया कहीं, अपनी झोली फैला दूँगा ;
और जन्नत के बदले उससे, एक नया नया जन्म ही माँगूँगा।।

Topics: Kakori incident 1925Indian Freedom StruggleKakori incidentAshfaqulla KhanKakori Train Actionimmortal martyr Ashfaqulla Khan
डॉ. आनंद सिंह राणा
डॉ. आनंद सिंह राणा
'स्व ' के आलोक में भारत के निर्माण और और स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में उपेक्षित महान् जनजातीय नायकों,महारथियों और वीरांगनाओं का इतिहास लेखन। प्रकाशन एवं वृत्तचित्र - महाकौशल में स्वाधीनता आंदोलन तथा क्षेत्र की सामाजिक एवं आर्थिक संरचना,म. प्र. में समाज सुधार के विकास का एक विवेचनात्मक अध्ययन : समाचार पत्रों के योगदान के विशेष संदर्भ में, महाकौशल की जनजातियों का सामाजिक , सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक समरसता सूत्र, महाकौशल में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, चित्रोत्पला त्रैमासिक शोध पत्रिका, भारत का स्वाधीनता संग्राम : महाकौशल, बुंदेलखंड और बघेलखंड प्रांत के संदर्भ में (संदृश्य प्रलेख), म. प्र. शासन जन संपर्क विभाग, स्वदेश समाचार पत्र समूह, विश्व संवाद केंद्र, नई दुनिया, पत्रिका दैनिक भास्कर,पद्मावती एक्सप्रेस आदि समाचार पत्रों में शोध आलेखों का अनवरत प्रकाशन। शोध पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से शोध आलेखों का प्रकाशन एवं प्रसारण। स्वातंत्र्य समर में महाकौशल की जनजातियों का अवदान और जबलपुर समग्र प्रकाशनाधीन हैं।भारतीय ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के विषयों के साथ स्वाधीनता संग्राम के जनजातीय महारथियों पर विविध चैनलों के माध्यम से 20 से भी अधिक दस्तावेजी वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री फिल्म) का निर्माण। शोध उपागम - अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के मार्गदर्शन में 500 से भी अधिक मौलिक शोध आलेख। भारतीय इतिहास, धर्म - दर्शन और संस्कृति के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक तथा मनोसामाजिक पहलुओं के प्रति वामियों, मिशनरियों, पश्चिमी विद्वानों, मुस्लिम लेखकों, और तथाकथित सेक्यूलरों के पूर्वाग्रही मत प्रवाह को प्रामाणिकता के आधार खंडित कर वास्तविक मत प्रवाह को प्रस्तुत करने हेतु विविध आयामों में शोधपरक लेखन। भारतीय स्वाधीनता संग्राम और उसके उपरांत 'स्व' के आलोक शोधपरक लेखन। भारतीय संस्कृति के मूलाधार जनजाति कुटुम्ब के विरुद्ध वामियों,मिशनरियों तथाकथित सेक्यूलरों और मुस्लिम लेखकों के द्वारा फैलाए गए वितंडावाद और मंतातरण के कुत्सित षड्यंत्र के विरुद्ध शोधपरक लेखन। शिक्षा - बी. एस-सी, एम. ए.(इतिहास),पी-एच.डी., एल-एल.बी.। संप्रति - प्रो. एवं विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग(30वर्ष अध्यापन का अनुभव )श्रीजानकीरमण कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय एवं उपाध्यक्ष इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत। जिला संगठक राष्ट्रीय सेवा योजना, जबलपुर (म.प्र.) [Read more]
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