प्रगति के सोपान : खनिज खोज चुंबकीय चमक
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होम भारत

प्रगति के सोपान : खनिज खोज चुंबकीय चमक

केंद्र सरकार द्वारा स्वीकृत 7,280 करोड़ रुपये के रेयर अर्थ मिशन कार्यक्रम को आत्मनिर्भरता अभियान का महत्वपूर्ण आयाम माना जा रहा है। यह योजना चीन पर निर्भरता कम कर, भारत को तकनीकी और रक्षा क्षेत्र में भविष्य का शक्ति केंद्र बनाने में मदद करेगी। दुर्लभ पृथ्वी तत्वों से बनने वाले शक्तिशाली चुंबक से अनुसंधान और प्रौधोगिकी को बढ़ावा मिलेगा

Written byडॉ. निमिष कपूरडॉ. निमिष कपूर
Dec 17, 2025, 07:10 pm IST
inभारत, विश्लेषण

भारत पहली बार खनन से लेकर उच्च गुणवत्ता वाले सिंटर्ड रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट (आरईपीएम) निर्माण तक पूरी घरेलू उत्पादन शृंखला विकसित कर रहा है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 26 नवंबर, 2025 को 7,280 करोड़ रुपये के रेयर अर्थ मिशन को मंजूरी दी है, जिसमें पांच वर्ष में 6,450 करोड़ रुपये का बिक्री-आधारित प्रोत्साहन और 750 करोड़ रुपये की पूंजीगत सहायता शामिल है। इसका लक्ष्य सालाना 6,000 मीट्रिक टन आरईपीएम का उत्पादन बढ़ाना है। यह योजना आरईपीएम अनुसंधान, आत्मनिर्भरता और वैश्विक बाजार में भारत की मौजूदगी को मजबूत करेगी, साथ ही ऑटोमोटिव, रक्षा और एयरोस्पेस क्षेत्रों की आपूर्ति शृंखला को विकसित कर 2070 तक भारत के नेट जीरो लक्ष्य को भी समर्थन देगी।

आरईपीएम सबसे ताकतवर स्थायी चुंबक होते हैं, जो दुर्लभ पृथ्वी तत्वों जैसे नियोडिमियम, आयरन, बोरॉन, सामेरियम और कोबाल्ट के मिश्रण से बनते हैं। सिंटर्ड मैग्नेट बनाने की प्रक्रिया में पाउडर को गर्म व दबाकर एक ठोस आकार दिया जाता है। ये चुंबक पारंपरिक चुंबकों की तुलना में शक्तिशाली होते हैं, जिससे छोटे आकार में भी अधिक शक्ति मिलती है। यही वजह है कि ये इलेक्ट्रिक मोटर, इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरियों, पर्मानेंट मैग्नेट्स, स्मार्टफोन जनरेटर, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा, एयरोस्पेस, सेंसर्स और नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्रों में जरूरी हैं। भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों की मांग बढ़ रही है, जिससे 2030 तक आरईपीएम की जरूरत भी दोगुनी होगी।

फिलहाल भारत ज्यादातर आरईपीएम आयात करता है, पर इस पहल से भारत अपनी पहली एकीकृत आरईपीएम विनिर्माण इकाइयां स्थापित करेगा। इससे रोजगार बढ़ेगा, देश आत्मनिर्भर बनेगा और 2070 तक पर्यावरण की रक्षा करते हुए नेट जीरो उत्सर्जन के लक्ष्य को हासिल करने में मदद मिलेगी। दुर्लभ पृथ्वी धातुएं 17 खास तत्वों का समूह हैं, जिनमें स्कैंडियम और इट्रियम भी होते हैं। ये जमीन में बहुत कम मात्रा में पाए जाते हैं। आधुनिक तकनीक के लिए जरूरी इन तत्वों को निकालना और साफ करना मुश्किल व महंगा होता है। भारत की रक्षा, अंतरिक्ष तकनीक और इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए इनका देश में ही सुरक्षित और भरोसेमंद स्रोत होना बहुत आवश्यक है ताकि हम आत्मनिर्भर बन सकें।

रक्षा क्षेत्र में आएगी आत्मनिर्भरता

भारत के पास दुनिया का 5वां सबसे बड़ा दुर्लभ पृथ्वी तत्वों का भंडार है, जिसकी कुल मात्रा 8.52 मिलियन टन है। इनमें 7.23 मिलियन टन आंध्र प्रदेश, ओडिशा व गुजरात सहित तटीय इलाकों में है, जिनकी कीमत लगभग 360 अरब डॉलर है। राजस्थान के बाड़मेर जिले के सिवाना क्षेत्र में 15 प्रकार के दुर्लभ पृथ्वी तत्व मिले हैं। सरकार ने राष्ट्रीय आवश्यक खनिज मिशन 2025 के तहत इनकी खोज, खनन, प्रसंस्करण और उपयोग को प्राथमिकता दी है। भारत में हल्के तत्व अच्छी मात्रा में हैं, पर भारी तत्वों की कमी के कारण आयात पर निर्भरता बनी है। यह मिशन भारत को चीन पर निर्भरता कम कर आत्मनिर्भर व तकनीकी रूप से मजबूत बनाएगा। इलेक्ट्रिक वाहनों, रक्षा और अंतरिक्ष क्षेत्र में घरेलू आपूर्ति शृंखला स्थापित होगी। साथ ही आर्थिक विकास और रोजगार सृजन के साथ कच्चे माल की स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित कर रणनीतिक सुरक्षा बढ़ाएगा।

कई देशों के साथ समझौते

रेयर अर्थ मिशन के तहत भारत ने चीन पर निर्भरता घटाने के लिए कई देशों से समझौते किए हैं। ब्राजील, चिली, डोमिनिक रिपब्लिक, ऑस्ट्रेलिया, घाना, नामीबिया, अर्जेंटीना, त्रिनिदाद और टोबैगो सहित कई देशों के साथ खनन व चुंबक निर्माण के लिए सहयोग बढ़ाया है। अमेरिका के साथ भी शोध व विकास साझेदारी पर जोर है ताकि रक्षा-अंतरिक्ष तकनीक के लिए जरूरी तत्वों की आपूर्ति सुनिश्चित हो सके।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जुलाई 2025 में पांच देशों (घाना, अर्जेंटीना, ब्राजील, नामीबिया, त्रिनिदाद और टोबैगो) की यात्रा की थी, जिसका उद्देश्य रक्षा, दुर्लभ पृथ्वी तथ्वों एवं अन्य महत्वपूर्ण सामरिक संसाधनों पर सहयोग बढ़ाना और आपूर्ति शृंखला मजबूत करना था ताकि चीन के निर्यात नियंत्रण को कम किया जा सके। साथ ही, भारत ने सऊदी अरब और यूएई के साथ भी हरित ऊर्जा के लिए जरूरी कच्चे माल की आपूर्ति के लिए समझौते किए हैं। ये प्रयास भारत की घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाकर सालाना 6,000 मीट्रिक टन परमानेंट मैग्नेट बनाने के लक्ष्य को हासिल कर, ईवी, रक्षा और अंतरिक्ष में भारत को एक मजबूत शक्ति केंद्र बनाएंगे।

रेयर अर्थ मिशन को लेकर कई देशों के साथ भारत के समझौते शोध, विकास, नवाचार और खनन सहयोग पर केंद्रित है। ये समझौते दुर्लभ पृथ्वी तत्वों और महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति शृंखला के जोखिम कम करने, चीन पर निर्भरता घटाने तथा रक्षा, अंतरिक्ष व हरित प्रौद्योगिकी के लिए जरूरी खनिजों की आपूर्ति सुरक्षित करेंगे।

ब्राजील और डोमिनिकन रिपब्लिक के साथ समझौता दुर्लभ पृथ्वी तत्वों और महत्वपूर्ण खनिजों में सहयोग के लिए एक ढांचा प्रदान करेगा, जबकि चिली और पेरू के साथ मुक्त व्यापार समझौते में तांबा और लिथियम की आपूर्ति सुनिश्चित करेंगे। ऑस्ट्रेलिया के साथ लिथियम और कोबाल्ट पर संयुक्त अनुसंधान और प्रौद्योगिकी विकास हो रहा है। अफ्रीका के घाना, नामीबिया, अर्जेंटीना, त्रिनिदाद और टोबैगो जैसे अफ्रीकी देशों के साथ नवीनीकरणीय ऊर्जा, कृषि और दुर्लभ पृथ्वी खनिज सहयोग पर काम चल रहा है। अर्जेंटीना में भारत की कंपनियां लिथियम खनन परियोजनाओं में सक्रिय हैं। ये सभी पहलें भारत की घरेलू खनिज उत्पादन शृंखला को मजबूत करने और वैश्विक आपूर्ति कड़ी में भारत की भूमिका बढ़ाने के लिए हैं। हालांकि कई परियोजनाएं अभी शुरूआती दौर में हैं।

योजना के पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभाव

यह योजना भारत में स्वदेशी आरईपीएम निर्माण पारिस्थितिकी तंत्र स्थापित कर चीन पर निर्भरता कम करने के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में अवसर, रोजगार और आर्थिक विकास बढ़ाएगी। पर्यावरण सुरक्षा के लिए रेडियोधर्मी थोरियम और भारी धातुओं वाले अपशिष्ट जल के प्रबंधन पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। साथ ही ऊर्जा कुशल और प्रदूषण नियंत्रित तकनीकें अपनाई जाएंगी, जो 2070 के नेट-जीरो लक्ष्य के अनुरूप हैं।

इस सात वर्षीय योजना में दो वर्ष निर्माण और पांच वर्ष प्रोत्साहन तथा निगरानी शामिल हैं। योजना के तहत पांच सफल आवेदकों को प्रति वर्ष 1,200 मीट्रिक टन विनिर्माण क्षमता मिलेगी। यह पहल घरेलू विनिर्माण को मजबूत कर भारत को वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी बनाएगी और नवीकरणीय ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहन तथा उच्च तकनीकी उद्योगों को आगे बढ़ाएगी। दीर्घकालीन सफलता के लिए तकनीकी कौशल, पर्यावरण नियम, कच्चे माल की स्थिरता, वैश्विक मानकीकरण और सर्कुलर इकोनॉमी पर ध्यान देना जरूरी है। इससे भारत क्रिटिकल मिनरल्स क्षेत्र में एक प्रमुख वैश्विक शक्ति बन सकता है।

Topics: तकनीकी और औद्योगिक कीवर्ड्ससिंटर्ड मैग्नेट‘आत्मनिर्भर भारत’घरेलू उत्पादनरोजगार सृजनप्रोत्साहन योजनापाञ्चजन्य विशेषरणनीतिक और आर्थिक कीवर्ड्सडॉ. निमिष कपूररणनीतिक सुरक्षारेयर अर्थ मिशनचीन पर निर्भरताखनिज खोजअंतरराष्ट्रीय समझौतेदुर्लभ पृथ्वी तत्वपर्यावरणीय प्रभावस्थायी चुंबकसप्लाई चेन
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