केंद्र सरकार ने 21 नवंबर 2025 को चार नई श्रम संहिताओं को अधिसूचित किया है, जिनके माध्यम से भारत के 29 पुराने श्रम कानूनों को एकीकृत कर एक सरल और समेकित नियमावली बनाई गई है। इन संहिताओं के तहत पहली बार ‘गिग’ और ‘प्लेटफॉर्म’ वर्कर्स, जैसे कि ओला‑ उबर ड्राइवर, स्विगी‑ जोमैटो/ब्लिंकिट/जेप्टो जैसे डिलीवरी पार्टनर, घरेलू और सर्विस वर्कर्स, फ्रीलांसर/ डिजिटल‑ मीडिया वर्कर्स आदि कानूनी परिभाषा में आए हैं। इसका उद्देश्य है कि ऐसे कामगारों, जिन्हें पहले श्रम कानूनों के दायरे में शामिल नहीं माना जाता था, को सामाजिक सुरक्षा और कानूनी मान्यता दी जा सके।
वेतन संहिता 2019
यह संहिता वेतन से संबंधित चार पुराने कानूनों, वेतन भुगतान अधिनियम 1936, न्यूनतम वेतन अधिनियम 1948, बोनस भुगतान अधिनियम 1965 और समान पारिश्रमिक अधिनियम 1976, को एकीकृत कर एक सरल और आधुनिक विधिक ढांचा प्रस्तुत करती है। इसका उद्देश्य देश के संगठित और असंगठित क्षेत्रों में काम करने वाले अधिकांश कर्मचारियों (फैक्ट्री, कार्यालय, ऐप-आधारित सेवाएं (कैब, डिलीवरी), फ्रीलांसर आदि) को न्यूनतम वेतन की कानूनी सुरक्षा मिलने की संभावना बनाना है। इस संहिता के अंतर्गत ‘वेतन’ की परिभाषा को स्पष्ट रूप से निर्धारित किया गया है, जिसके अनुसार वेतन में मुख्य रूप से बेसिक वेतन, महंगाई भत्ता (डीए) और रिटेनिंग अलाउंस को शामिल किया गया है, जबकि यात्रा भत्ता, किराया भत्ता, ओवरटाइम और बोनस जैसे अन्य भत्तों को वेतन की गणना से अलग रखने की व्यवस्था की गई है। इसके साथ यह प्रावधान किया गया है कि भत्तों का अनुपात कुल वेतन के 50 प्रतिशत से अधिक न हो।
इस प्रावधान के तहत केंद्र सरकार को देश के लिए ‘राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन’ निर्धारित करने का अधिकार दिया गया है, जिसे राज्यों द्वारा संदर्भ के रूप में अपनाया जाना अपेक्षित है।
इस संहिता के तहत कार्य समय को सामान्यतः प्रतिदिन 8 घंटे और सप्ताह में 48 घंटे तक रखने का प्रावधान किया गया है। इससे अधिक कार्य की स्थिति में ओवरटाइम भुगतान को सामान्य प्रति घंटा वेतन की दोगुनी दर से दिए जाने का प्रावधान रखा गया है, और ओवरटाइम कार्य कर्मचारी की सहमति से कराए जाने का प्रावधान है। बोनस संबंधी प्रावधानों के अंतर्गत न्यूनतम 8.33 प्रतिशत और अधिकतम 20 प्रतिशत तक वार्षिक बोनस देने का कानूनी ढांचा तय किया गया है, जो कंपनी के लाभ और लागू नियमों पर निर्भर करता है। सीमित अवधि तक कार्य करने वाले कर्मचारी भी निर्धारित शर्तों के अंतर्गत बोनस के लिए पात्र हो सकते हैं। इसके साथ ही, समान कार्य, समान कौशल और समान जिम्मेदारियों के लिए महिला और पुरुष कर्मचारियों को समान वेतन दिए जाने का सिद्धांत कानून में स्थापित किया गया है।
सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020
यह संहिता नौ पुराने सामाजिक सुरक्षा कानूनों, जैसे कर्मचारी भविष्य निधि अधिनियम 1952, कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम 1948, ग्रेच्युटी भुगतान अधिनियम 1972 और मातृत्व लाभ अधिनियम 1961 को एकीकृत करती है। इसके तहत पहली बार ‘गिग वर्कर’ और ‘प्लेटफॉर्म वर्कर’ को विधिक रूप से परिभाषित किया गया है, जिससे उन्हें सामाजिक सुरक्षा के दायरे में शामिल करने की व्यवस्था की गई है। उन्हें कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ) जैसी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के दायरे में लाने का प्रावधान किया गया है, जिसके तहत योगदान की व्यवस्था नियमों के अनुसार तय की जाएगी। इसका उद्देश्य असंगठित क्षेत्र के कामगारों को औपचारिक सामाजिक सुरक्षा प्रणाली से जोड़ने की दिशा में एक ढांचा तैयार करना है, ताकि उन्हें भविष्य में बीमारी, दुर्घटना, प्रसूति अवकाश और सेवानिवृत्ति जैसी परिस्थितियों में सहायता मिल सके।
औद्योगिक संबंध संहिता 2020
यह संहिता ट्रेड यूनियन अधिनियम 1926, औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 और औद्योगिक रोजगार (स्थायी आदेश) अधिनियम 1946 को एकीकृत कर एक अद्यतन विधिक ढांचा प्रस्तुत करती है। पहले श्रम विवादों के निपटारे में लंबा समय लगना एक सामान्य व्यावहारिक चुनौती रही है। इस संहिता के तहत 20 या अधिक कर्मचारियों वाली संस्थाओं में शिकायत निवारण समिति के गठन का प्रावधान किया गया है, जिसमें महिला सदस्यों की भागीदारी का भी प्रावधान है। इस समिति द्वारा शिकायतों के समयबद्ध निराकरण की व्यवस्था की गई है, जिसका लक्ष्य सामान्यत, 30 दिन की अवधि रखा गया है।
यदि विवाद शिकायत समिति के स्तर पर सुलझ नहीं पाता, तो दो सदस्यीय औद्योगिक ट्रिब्यूनल, जिसमें एक न्यायिक और एक प्रशासनिक सदस्य शामिल होंगे, के माध्यम से मामले के निपटारे का प्रावधान किया गया है। ऐसे मामलों में समयबद्ध निर्णय की व्यवस्था की गई है, जिसमें सामान्यतः अधिकतम एक वर्ष की समयसीमा प्रस्तावित की गई है। इससे विवाद निपटान प्रक्रिया को अधिक संरचित और समयानुकूल बनाने का उद्देश्य रखा गया है। नई व्यवस्था में कंपनियों को परियोजना-आधारित या निश्चित अवधि के लिए फिक्स्ड-टर्म कर्मचारियों को नियुक्त करने की अनुमति दी गई है। इन कर्मचारियों को वेतन, अवकाश, चिकित्सा सुविधा और सामाजिक सुरक्षा जैसे लाभ प्रदान किए जाएंगे, जो स्थायी कर्मचारियों के समान हैं। फिक्स्ड-टर्म अनुबंध की स्वाभाविक समाप्ति को छंटनी के रूप में नहीं माना जाएगा, जिससे संस्थानों को प्रशासनिक लचीलापन और कर्मचारियों की कानूनी सुरक्षा में संतुलन सुनिश्चित होगा। किसी कर्मचारी की छंटनी की स्थिति में उसे तीन महीने का नोटिस या इसके बदले वेतन, सेवा के प्रत्येक वर्ष के लिए 15 दिन के वेतन के बराबर मुआवजा दिया जाएगा। यह निधि संबंधित संस्था द्वारा उपलब्ध कराई जाएगी, ताकि प्रभावित कर्मचारी नई नौकरी के लिए आवश्यक प्रशिक्षण और कौशल उन्नयन प्राप्त कर सके।
व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य परिस्थिति संहिता 2020
यह संहिता 13 पुराने श्रम कानूनों को एकीकृत कर सभी संगठित कार्यस्थलों में सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य परिस्थितियों का व्यापक ढांचा प्रस्तुत करती है। अब फैक्ट्रियों के अलावा कार्यालय, निर्माण स्थल, खदान और अन्य कार्यस्थलों में भी सुरक्षा प्रावधान लागू होंगे। यह नियम 10 या उससे अधिक कर्मचारियों वाली संस्थाओं पर प्रभावी होंगे। नियोक्ताओं पर कानूनी दायित्व होगा कि वे सुरक्षित और स्वास्थ्यकर कार्य वातावरण सुनिश्चित करें, ताकि दुर्घटनाओं और स्वास्थ्य जोखिमों को कम किया जा सके। कानून के तहत 40 वर्ष या उससे अधिक आयु के कर्मचारियों के लिए वर्ष में एक बार स्वास्थ्य जांच कराना अनिवार्य है। 500 या अधिक कर्मचारियों वाले प्रतिष्ठानों में ‘सुरक्षा समिति’ का गठन आवश्यक होगा, जबकि खतरनाक उद्योगों, जैसे रसायन, खनन और निर्माण, में प्रत्येक कार्यस्थल पर ‘विशिष्ट सुरक्षा समितियां’ स्थापित की जाएंगी।

महिलाओं को सभी लागू प्रतिष्ठानों में रात्रि पाली में कार्य करने की अनुमति दी जा सकती है, जिसमें उनकी लिखित सहमति, सुरक्षित परिवहन और कार्यस्थल पर प्रभावी सुरक्षा उपाय एवं सीसीटीवी निगरानी के प्रावधान अनिवार्य रूप से होंगे। जो कर्मचारी अपने राज्य से बाहर कार्य करते हैं और जिनकी मासिक आय 18,000 रुपए से कम है, उन्हें ‘अंतरराज्यीय प्रवासी कामगार’ के रूप में मान्यता दी जाएगी। उनका पंजीकरण राष्ट्रीय पोर्टल पर किया जाएगा और उन्हें वर्ष में कम से कम एक बार यात्रा भत्ता, राष्ट्रीय हेल्पलाइन, राशन कार्ड पोर्टेबिलिटी, आपातकालीन सहायता और उचित आवास जैसी सुविधाएं प्रदान की जाएंगी। उदाहरण के लिए, बिहार का कोई श्रमिक दिल्ली में कार्य करने पर दिल्ली में राशन प्राप्त कर सकेगा, दुर्घटना में सहायता पाएगा और घर जाने के लिए यात्रा भत्ता मिलेगा। इसके अतिरिक्त, कार्यस्थलों पर पीने के लिए स्वच्छ पानी, पुरुष और महिलाओं के लिए पृथक शौचालय एवं धुलाई कक्ष, 100 से अधिक कर्मचारियों पर कैंटीन, 150 से अधिक कर्मचारियों पर प्राथमिक चिकित्सा कक्ष, 500 से अधिक कर्मचारियों पर एंबुलेंस एवं आपात सुविधा तथा 50 से अधिक महिला कर्मचारियों वाली इकाइयों में क्रेच सुविधा अनिवार्य होगी।
पहले श्रम विभाग के निरीक्षक बिना पूर्व सूचना निरीक्षण कर सकते थे और छोटी कमियों पर दंड लगा सकते थे, जिससे विशेषकर छोटे और मध्यम उद्योगों में डर बना रहता था। नई व्यवस्था में ‘इंस्पेक्टर-कम-फैसिलिटेटर’ की अवधारणा लागू की गई है, जिनकी भूमिका सहयोगात्मक होगी। वे संस्थानों को नियमों की जानकारी देंगे, मार्गदर्शन करेंगे और अनुपालन में मदद करेंगे, जबकि केवल गंभीर या बार-बार होने वाले उल्लंघनों पर दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी। निरीक्षण प्रक्रिया अब पूर्व सूचना के साथ पारदर्शी होगी और वेब-आधारित प्रणाली से निगरानी की जाएगी। इसके अलावा, कार्यस्थल सुरक्षा और स्वास्थ्य के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक बोर्ड बनाया जाएगा, जो वैज्ञानिक शोध और अंतरराष्ट्रीय सर्वोत्तम प्रथाओं के आधार पर मानक तय करेगा।
कंपनियों और उद्योग के लिए लाभ
पहले कंपनियों को विभिन्न श्रम कानूनों के तहत अलग-अलग पंजीकरण, लाइसेंस और रिपोर्ट दाखिल करनी पड़ती थीं, जैसे राज्य-स्तरीय रिटर्न, ईपीएफ और ईएसआई रिटर्न आदि। नई व्यवस्था में अब देशभर के लिए एकीकृत पंजीकरण और एकल ऑनलाइन फॉर्म की सुविधा दी गई है। विशेषज्ञों के अनुसार इससे छोटे और मध्यम उद्योगों की अनुपालन लागत कम होगी और व्यावसायिक प्रक्रियाएं सरल होंगी। कंपनियों को फिक्स्ड-टर्म रोजगार के माध्यम से परियोजना-आधारित नियुक्तियों में सुविधा होगी। 300 या उससे कम कर्मचारियों वाली कंपनियों को कर्मचारी प्रबंधन में अधिक लचीलापन मिलेगा, जिससे निर्णय प्रक्रिया तेज और आसान होगी। नई श्रम संहिताएं निवेश वातावरण को बेहतर बनाएंगी और विदेशी निवेश के अवसर बढ़ा सकती हैं।
आर्थिक प्रभाव और रोजगार सृजन
नई श्रम संहिताओं से बड़ी संख्या में गिग वर्कर्स सामाजिक सुरक्षा के दायरे में आएंगे। सरलीकृत अनुपालन और लचीले नियम रोजगार सृजन को बढ़ावा दे सकते हैं। रात्रि शिफ्ट, समान वेतन और मातृत्व लाभ जैसे प्रावधान महिलाओं की श्रम भागीदारी बढ़ाने में मदद करेंगे। समयबद्ध विवाद समाधान से श्रम विवादों में कमी और उत्पादकता में सुधार की संभावना है। सरकारी आंकड़े सामाजिक सुरक्षा कवरेज में महत्वपूर्ण वृद्धि को दर्शाते हैं। चारों नई श्रम संहिताएं 21 नवंबर 2025 को अधिसूचित की गई हैं। पूर्ण क्रियान्वयन चरणबद्ध रूप से किया जाएगा। केंद्र सरकार ने कई केंद्रीय नियम लागू कर दिए हैं, जबकि राज्य सरकारें अपने नियम विकसित कर रही हैं। अधिकांश राज्यों द्वारा आगामी समय में नियम लागू किए जाने की संभावना है। संक्रमण काल में, नई संहिताओं से मेल खाने वाले पुराने प्रावधान अस्थायी रूप से लागू रहेंगे।
चुनौतियां और समाधान
नई श्रम संहिताओं के कार्यान्वयन में मुख्य चुनौती असंगठित और गिग सेक्टर के श्रमिकों तक सही जानकारी पहुंचाना है। इसे देखते हुए सरकार व्यापक जागरूकता अभियान चला रही है। प्लेटफॉर्म कंपनियों को अपने वर्कर्स को नियमों की जानकारी देने के निर्देश दिए गए हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से एकीकृत पंजीकरण और पोर्टेबल लाभ सरल बनाए जा रहे हैं। छोटे कारोबारियों के लिए ‘फैसिलिटेटर’ प्रणाली लागू की गई है, जिससे नियमों को समझने और उनका पालन करने में सहयोग मिलेगा।
सुरक्षित कामगार और सशक्त उद्योग
भारत की नई श्रम संहिताएं आधुनिक और समावेशी बदलाव लाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। ये कामगारों के अधिकार और सुरक्षा मजबूत करने के साथ-साथ उद्योगों के लिए नियमों को स्पष्ट और सरल बनाती हैं। डिजिटल व्यवस्थाएं, एकीकृत पंजीकरण और लचीला ढांचा एमएसएमई सहित सभी उद्योगों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए सक्षम बना सकता है। यह श्रम सुधार आत्मनिर्भर भारत की दिशा में सुरक्षित कामगार, सशक्त उद्योग और स्थिर भविष्य की नींव रखने का प्रयास है। इन संहिताओं की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि राज्य स्तर पर नियम कितने प्रभावी और समयबद्ध तरीके से लागू किए जाएंगे और आवश्यक जानकारी कर्मचारियों व नियोक्ताओं तक पहुंचाई जाएगी।

















