गोवा जनमत संग्रह 1967: कैसे ऐतिहासिक वोट ने गोवा की संस्कृति और कोंकणी भाषा पर लगाई मुहर?
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गोवा जनमत संग्रह 1967: कैसे ऐतिहासिक वोट ने गोवा की संस्कृति और कोंकणी भाषा पर लगाई मुहर?

गोवा में 16 जनवरी 1967 को आयोजित किया गया था और यह आज तक भारत का पहला और एकमात्र ऐसा जनमत संग्रह है, जिसमें जनता से सीधे यह पूछा गया कि वे अपने राज्य के भविष्य के बारे में क्या चाहती हैं।

Written byMahak SinghMahak Singh
Dec 17, 2025, 08:15 am IST
in भारत
Goa Liberation Day 2025

Goa Liberation Day

भारतीय इतिहास में गोवा का जनमत संग्रह एक बेहद खास और अनोखी घटना के रूप में दर्ज है। यह जनमत संग्रह 16 जनवरी 1967 को किया गया था और यह आज तक भारत का पहला और एकमात्र ऐसा जनमत संग्रह है, जिसमें जनता से सीधे यह पूछा गया कि वे अपने राज्य के भविष्य के बारे में क्या चाहती है। इस जनमत संग्रह ने गोवा की सांस्कृतिक और भाषाई पहचान को सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

गोवा पर पुर्तगाली शासन और सांस्कृतिक प्रभाव

गोवा का इतिहास लंबे समय तक विदेशी शासन से जुड़ा रहा। लगभग 450 वर्षों तक गोवा पुर्तगालियों के अधीन रहा। 1510 में पुर्तगालियों ने गोवा पर अधिकार किया और धीरे-धीरे इसे अपना प्रशासनिक और सांस्कृतिक केंद्र बना लिया। गोवा का पुर्तगाली शासन न केवल प्रशासनिक दृष्टि से बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी काफी प्रभावशाली रहा। गोवा के लोगों की भाषा, संस्कृति और परंपराएं पुर्तगाली प्रभाव के कारण समय के साथ कुछ हद तक प्रभावित हुईं, लेकिन स्थानीय परंपराएं और पहचान जीवित रहीं।

ऑपरेशन विजय

1961 में भारतीय सेना द्वारा ‘ऑपरेशन विजय’ के माध्यम से गोवा को पुर्तगालियों से आज़ादी मिली। इसके बाद गोवा, दमन और दीव को मिलाकर एक केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा दिया गया। स्वतंत्रता के बाद यह सवाल उठने लगा कि गोवा को अपने पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र में मिला दिया जाए या इसे अपनी अलग पहचान दी जाए। इस विवाद का कारण मुख्य रूप से भाषाई और सांस्कृतिक था। महाराष्ट्र में कुछ राजनीतिक दलों का मानना था कि गोवा की भाषा कोंकणी, मराठी की ही एक बोली है। उनका तर्क था कि गोवा को महाराष्ट्र में मिला देने से प्रशासनिक और सांस्कृतिक एकता स्थापित हो सकती है। वहीं गोवा के अनेक नागरिक इस विचार से सहमत नहीं थे। उनका डर था कि यदि गोवा महाराष्ट्र में शामिल हो गया, तो उसकी अलग संस्कृति, परंपराएं और भाषा धीरे-धीरे समाप्त हो सकती हैं। गोवा की जनता अपनी विशिष्ट पहचान और सांस्कृतिक विरासत को बचाए रखना चाहती थी।

यह भी पढ़ें- क्या आप जानते हैं, 1961 में भारत ने कैसे वापस लिया गोवा?

जनमत संग्रह

इस विवाद को शांति से सुलझाने के लिए भारत सरकार ने जनमत संग्रह कराने का निर्णय लिया। जनमत संग्रह में गोवा की जनता से पूछा गया कि वे अपने प्रदेश को महाराष्ट्र में मिलाना चाहेंगे या इसे अलग ही रखना चाहेंगे। जनमत संग्रह के दिन, पूरे प्रदेश में मतदान शांतिपूर्ण ढंग से हुआ। लोग बड़ी संख्या में अपने मताधिकार का प्रयोग करने पहुंचे। जनता ने अपने प्रदेश की अलग पहचान और सांस्कृतिक विरासत को बनाए रखने के पक्ष में मतदान किया।

1987 में गोवा को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला

जनमत संग्रह ने न केवल गोवा की भाषाई और सांस्कृतिक पहचान को बचाया, बल्कि यह साबित किया कि लोकतंत्र में जनता की राय सबसे महत्वपूर्ण होती है। इसके बाद गोवा ने अपनी अलग राजनीतिक दिशा तय की और धीरे-धीरे अपनी प्रशासनिक और सामाजिक पहचान मजबूत की। आगे चलकर 1987 में गोवा को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला और कोंकणी को राज्य की आधिकारिक भाषा घोषित किया गया। यह फैसला गोवा की संस्कृति और भाषा के संरक्षण में मील का पत्थर साबित हुआ। आज गोवा केवल अपने सुंदर समुद्र तटों और पर्यटन के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और स्वतंत्र पहचान के लिए भी जाना जाता है।

यह भी पढ़ें- भारत की आजादी के 14 साल बाद गोवा को मिली मुक्ति, यह कहानी हर भारतीय को जाननी चाहिए

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Mahak Singh
Mahak Singh
2022 में ज़ी न्यूज़ से पत्रकारिता की शुरुआत की। उसके बाद न्यूज़ नेशन, दैनिक जागरण और न्यूज़ 24 जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में कार्य करते हुए पत्रकारिता के विभिन्न आयामों का अनुभव प्राप्त किया। वर्तमान में पाञ्चजन्य में सब एडिटर के रूप में कार्यरत हूं। ज़िमा ज़ी इंस्टीट्यूट ऑफ मीडिया आर्ट्स से मैने पत्रकारिता की है। [Read more]
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