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ममता को डराता हुमायूं का ‘बाबर’?

पश्चिम बंगाल में खुल कर मुस्लिम तुष्टीकरण करने वाली ममता बनर्जी फर्जी मतदाता, तृणमूल कांग्रेस में बढ़ते असंतोष और छिटकते वोट बैंक के कारण संकटों में घिरी हुई हैं। इसलिए वे अब न केवल हिंदुओं को रिझाने की कोशिश कर रही हैं, बल्कि मुस्लिम मतदाताओं को ‘खुश’ करने के लिए वक्फ कानून भी लागू कर दिया, जिसका विरोध कर रही थीं

Written byआर्य भारद्वाजआर्य भारद्वाज
Dec 15, 2025, 06:40 pm IST
inपश्चिम बंगाल
ममता को डराता हुमायूं का ‘बाबर’?

ममता को डराता हुमायूं का ‘बाबर’?

पश्चिम बंगाल में 2026 में होने वाले विधानसभा चुनाव की उलटी गिनती शुरू गई है। लेकिन राज्य का राजनीतिक परिदृश्य पहले से कहीं अधिक जटिल, अनिश्चित और विस्फोटक हो गया है। 2011 से राज्य की सत्ता पर काबिज ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस आज कई ओर से दबाव में है। सबसे बड़ी चुनौती पार्टी के भीतर बढ़ रहे बागी नेताओं का संगठित स्वरूप है, जो पार्टी को कमजोर कर रहे हैं। साथ ही, एसआईआर प्रक्रिया के दौरान लाखों फर्जी मतदाताओं का पकड़ा जाना भी ममता बनर्जी की साख पर प्रश्चचिह्न लगा रहा है। इसके अलावा, राज्य की लगभग 90 मुस्लिम बहुल सीटों पर ध्रुवीकरण के प्रयास भी चरम पर हैं।

दिखावा या नई चाल!

मुर्शिदाबाद जिले के बेलडांगा में तृणमूल विधायक हुमायूं कबीर द्वारा 6 दिसंबर को ‘बाबरी मस्जिद’ की नींव रखना भी उसी दिशा में एक कदम है। 1992 में इसी दिन अयोध्या में विवादित ढांचा ध्वस्त हुआ था, इसलिए इसी दिन नई ‘मस्जिद’ की नींव रखना और उसे ‘बाबरी मस्जिद’ नाम देना एक स्पष्ट राजनीतिक और साम्प्रदायिक रणनीति है। सर्वोच्च न्यायालय में इस विवाद का निपटारा हो चुका है और सभी पक्षों द्वारा स्वीकार भी किया जा चुका है, लेकिन उसे दोबारा उकसा कर साम्प्रदायिक भावना भड़काने का प्रयास किया जा रहा है। हालांकि, 4 दिसंबर को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने यह कहते हुए मुर्शिदाबाद जिले की भरतपुर सीट से विधायक हुमायूं कबीर को पार्टी से निकाल दिया था कि वे साम्प्रदायिक राजनीति कर रहे हैं।

सवाल यह है कि सब कुछ जानते हुए भी तृणमूल और राज्य की मुखिया ने अपने विधायक को क्यों नहीं रोका? हुमायूं कबीर का पार्टी से निष्कासन दिखावा है या इसकी आड़ में साम्प्रदायिक राजनीति की जा रही है? दूसरी बात, ममता बनर्जी ने पहले वक्फ संशोधन विधेयक का प्रबल विरोध किया। इसके विरोध के नाम पर राज्य में दंगे हुए। इसमें हिंदुओं, उनके घरों और दुकानों को निशाना बनाया गया। पहले उन्होंने नए वक्फ कानून को राज्य में लागू नहीं करने की बात कही, लेकिन अब उसे लागू कर दिया। उन्होंने ऐसा क्यों किया? क्या यह साम्प्रदायिक राजनीति नहीं है? दरअसल, मुट्ठीभर कट्टरपंथी ही नए वक्फ कानून का विरोध कर रहे थे, शेष मुस्लिम समाज ने इसका समर्थन किया है। इसलिए ममता बनर्जी को यह डर सता रहा था कि कहीं उनका ‘वोट बैंक’ नाराज न हो जाए, इसलिए राज्य में जारी विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के शोर के बीच उन्होंने चुपचाप इस कानून को लागू करने का फैसला किया।

दीदी के डर की वजह

वास्तव में ममता बनर्जी अपनी पार्टी की अंदरूनी उथल-पुथल, बड़ी संख्या में फर्जी मतदाताओं के पकड़े जाने, पलायन करते ‘वोट बैंक’ और भाजपा की आक्रामक चुनावी रणनीति से डरी हुई हैं। इसीलिए पार्टी की संगठनात्मक मजबूती, बूथ प्रबंधन और हिंदू मतदाताओं को लुभाने जैसे पुराने मुद्दों पर दोबारा फोकस कर रही हैं। लेकिन आईएसएफ, एआईएमआईएम जैसे विपक्षी दल और तृणमूल से निलंबित हुमायूं कबीर की नई चालों ने मुस्लिम वोट बैंक के अंदर सीधी टक्कर की स्थिति बना दी है। हुमायूं कबीर ने 22 दिसंबर को अपनी नई पार्टी बनाने और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी के साथ गठजोड़ कर 90 सीटों पर चुनाव लड़ने की बात कही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि ऐसा हुआ तो तृणमूल का वोट बैंक दरक सकता है, जिससे भाजपा को लाभ होगा। इसलिए भाजपा बेहद सावधानी से कदम बढ़ा रही है। तृणमूल के असंतुष्ट, बागी और निलंबित नेता भाजपा का दामन थाम सकते हैं। दूसरी तरफ, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा सहित केंद्रीय नेतृत्व के राज्य के लगातार दौरों और कार्यक्रमों से पार्टी कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा का संचार हुआ है।

कार्यक्रम में उमड़ा जनसैलाब

भगवा ध्वजों से पटा ब्रिगेड मैदान

सनातन संस्कृति संसद द्वारा कोलकाता के ब्रिगेड मैदान में गीता पाठ के आयोजन का उद्देश्य लोगों तक सनातन धर्म की मूल भावना और श्रीमद्भगवद्गीता के सार्वभौमिक संदेशों को पहुंचाना था। कार्यक्रम की अध्यक्षता महामंडलेश्वर स्वामी ज्ञानानंद ने की। उन्होंने बताया कि साधु-संतों की उपस्थिति में 5 लाख से अधिक लोगों ने सामूहिक गीता पाठ में हिस्सा लिया। इसमें गीता के 1, 9 और 18वें अध्याय का पाठ किया गया। इस दौरान पूरा ब्रिगेड मैदान भगवा ध्वजों से पटा हुआ था। इस कार्यक्रम में पश्चिम बंगाल के राज्यपाल डॉ. सीवी आनंद बोस, केंद्रीय मंत्री सुकांत मजुमदार, बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष सुवेंदु अधिकारी सहित भाजपा के कई सांसद, विधायक, नेता और साधु-संत शामिल हुए। इस अवसर पर बागेश्वर धाम के धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने कहा, ‘‘यह देश बाबर का नहीं, रघुवर का है। हिंदुओं को एकजुट होकर गांव-गांव में भगवा लहराना होगा। यदि हिंदू समाज एकजुट हो गया तो, कोई भी ताकत भारत को हिंदू राष्ट्र बनने से नहीं रोक पाएगी।’’

राज्यपाल ने श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद का उल्लेख करते हुए बताया कि कैसे उन्होंने भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज उठाई और धर्मयुद्ध में अर्जुन का मार्गदर्शन किया। उन्होंने कहा कि श्रीकृष्ण ने बार-बार अर्जुन से कहा कि अर्जुन अपना काम करो। आज बंगाल काम करने के लिए तैयार है। आज जब युवा पीढ़ी के लोग गीता का पाठ करना चाहते हैं, तो यह राष्ट्रीय गौरव की बात बन जाती है। वहीं, केंद्रीय राज्य मंत्री सुकांत मजूमदार ने कहा कि गीता पाठ का चुनावों से कोई संबंध नहीं है। एक दिन पहले (6 दिसंबर) हमने जो देखा, उससे साफ पता चलता है कि हिंदू मतदाताओं को बांटने और मुस्लिम वोट को एकजुट करने की साजिश चल रही है।

पश्चिम बंगाल में मुस्लिम आबादी 30 प्रतिशत से अधिक है। लगभग 100-125 विधानसभा सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं का प्रत्यक्ष और परोक्ष प्रभाव है। खासतौर से 90 सीटों पर वे निर्णायक भूमिका निभाते हैं। हुमायूं कबीर की नजर इन्हीं सीटों पर है। भारी सुरक्षा के बीच नई ‘मस्जिद’ के शिलान्यास के मौके पर बड़ी संख्या में मौजूद मुसलमानों को संबोधित करते हुए तृणमूल के निलंबित विधायक ने इन्हीं 90 मुस्लिम बहुल सीटों पर एआईएमआईएम के साथ चुनाव लड़ने और ‘ममता को सत्ता से बाहर करने’ की हुंकार भरी है। हुमायूं ने कहा, ‘‘ममता बनर्जी मुस्लिम मतदाताओं की बदौलत ही 2011 में मुख्यमंत्री बनीं। आज उनका रवैया है कि वे जो कर रही हैं, वही सही है, बाकी सब गलत। उनके इस अहंकार को मैं चूर-चूर कर दूंगा।’’ मस्जिद शिलान्यास के अगले दिन, यानी 7 दिसंबर को कोलकाता के ब्रिगेड मैदान में सामूहिक गीता पाठ का आयोजन किया गया। जिस समय गीता पाठ हो रहा था, उसी समय हुमायूं कबीर ने एक लाख लोगों के साथ ‘कुरान ख्वानी’ (कुरान का पाठ) कराने की घोषणा की। साथ ही, कहा कि कुरान पाठ करने वालों को मांस और चावल का भोज देने के बाद ‘बाबरी मस्जिद’ का निर्माण कार्य शुरू होगा।

दरअसल, जिन 90 सीटों पर हुमायूं कबीर की नजर है, वहां फिलहाल तृणमूल का दबदबा है। यहां एक-एक सीट पर 2-5 प्रतिशत का वोट स्विंग भी चुनाव परिणाम बदल देता है। इसलिए राजनीतिक दलों के लिए ये सीटें ‘टर्निंग प्वाइंट’ मानी जाती हैं। 2021 में तृणमूल कांग्रेस की लगातार तीसरी जीत के पीछे सबसे बड़ा कारण यही था कि इन मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में पार्टी का औसत वोट हिस्सा 60–70 प्रतिशत तक गया, जबकि विपक्षी दलों कांग्रेस, वाम दलों, आईएएफ आदि का प्रदर्शन बहुत खराब रहा। भाजपा तो यहां प्रवेश भी नहीं कर पाई। अब बदली हुई परिस्थितियों में कहीं ऐसा तो नहीं कि तृणमूल के असंतुष्ट और निष्कासित नेता ममता बनर्जी का खेल बिगाड़ सकते हैं दें?

Topics: कबीर को साम्प्रदायिक राजनीतिनई पार्टी और गठबंधनसनातन संस्कृतिवक्फ कानून और मुस्लिम तुष्टीकरणबाबरी मस्जिदभाजपा केंद्रीय नेतृत्वतृणमूलसामूहिक गीता पाठपाञ्चजन्य विशेषबंगाल में मुस्लिम आबादीफर्जी मतदाता पार्टी में असंतोषनई रणनीतिसाम्प्रदायिक और राजनीतिक रणनीतिदिखावा या चालममता बनर्जी ने हुमायूं
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