भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने हाल ही में एक इंटरव्यू में जजों की नियुक्ति वाली कॉलेजियम प्रणाली पर खुलकर बात की। उन्होंने इस सिस्टम का बचाव तो किया, लेकिन साथ ही ये भी माना कि इसमें हमेशा सुधार की जगह रहती है। उनका कहना है कि पारदर्शिता बढ़ाना जरूरी है, ताकि लोग भरोसा करें।
जस्टिस सूर्यकांत 24 नवंबर 2025 से सीजेआई बने हैं और उनका कार्यकाल करीब 15 महीने का है। पहले वो पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में 14 साल तक जज रहे, जहां उन्होंने ड्रग्स की समस्या पर कई महत्वपूर्ण आदेश दिए थे।
कॉलेजियम सिस्टम में बदलाव की बात
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने इंडियन एक्सप्रेस को दिए इंटरव्यू में कहा कि कॉलेजियम में उम्मीदवारों से व्यक्तिगत बातचीत करना अच्छा कदम है। इससे सदस्य खुद उम्मीदवार की योग्यता, ईमानदारी और अनुभव का बेहतर अंदाजा लगा सकते हैं। उन्होंने जोर दिया कि इन तीन चीजों – योग्यता, सत्यनिष्ठा और अनुभव – पर और ज्यादा ध्यान देना चाहिए। अब नियुक्तियों में नाम मंजूर करने या ठुकराने के कारण बताने की कोशिश हो रही है, जो पहले से ज्यादा खुलापन ला रहा है। उनका मानना है कि ये बदलाव पारदर्शिता की दिशा में बड़ा कदम है। हालांकि, उन्होंने ये भी कहा कि प्रक्रिया काफी जटिल है, इसलिए कुछ आंतरिक बातें पूरी तरह सार्वजनिक नहीं की जा सकतीं, वरना सिस्टम की मजबूती प्रभावित हो सकती है।
मास्टर ऑफ रोस्टर की भूमिका पर क्या बोले?
सीजेआई को मास्टर ऑफ रोस्टर कहा जाता है, यानी वो तय करते हैं कि कौन सा केस किस बेंच को जाएगा। जस्टिस सूर्यकांत ने इसे सही बताया, लेकिन कहा कि लोग इसे गलत समझते हैं। सीजेआई सबसे सीनियर जज होता है, इसलिए उसके पास अतिरिक्त प्रशासनिक जिम्मेदारियां आती हैं। केस बांटते समय वो अकेले नहीं फैसला लेता, बल्कि दूसरे जजों से बात करके उनकी उपलब्धता और अनुभव को देखता है। ये सब विचार-विमर्श से होता है, न कि एकतरफा।
न्यायिक स्वतंत्रता और सोशल मीडिया पर राय
जस्टिस सूर्यकांत ने न्यायिक स्वतंत्रता को बहुत महत्वपूर्ण बताया। उनका कहना है कि ये हमारे न्याय देने की व्यवस्था की नींव है और संविधान में शक्तियों के बंटवारे से जुड़ी हुई है। हमारी जिम्मेदारी सिर्फ संविधान और लोगों के प्रति है। सोशल मीडिया पर जजों की आलोचना के बारे में उन्होंने कहा कि इसे कंट्रोल करने की जरूरत नहीं, क्योंकि ये आजादी को रोकने वाला कदम होगा। अक्सर अदालत की छोटी-छोटी क्लिप बिना संदर्भ के शेयर हो जाती हैं, जिससे गलतफहमी होती है। ऐसी आलोचना ज्यादातर जानकारी की कमी से आती है, इसलिए इसे नजरअंदाज करना बेहतर है। अगर जज सोशल मीडिया पर ध्यान देंगे, तो न्याय की क्वालिटी प्रभावित हो सकती है।
पुराना अनुभव
पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में रहते हुए जस्टिस सूर्यकांत को 2015 के आसपास ड्रग्स का बड़ा केस मिला था। तब पंजाब में नशे की समस्या बहुत बेकाबू थी। उन्होंने इसे धैर्य की असली परीक्षा बताया और कहा कि एक आदेश से ये हल नहीं होता, कई कदम उठाने पड़ते हैं। अब सीजेआई बनने के बाद उनका फोकस कॉलेजियम को और खोलने और लंबित केसों को निपटाने पर है।
















