सलमान रुश्दी एक आँख से देख नहीं पाते हैं। उनकी एक आँख एक हमले में चली गई है और वह हमला आँख पर नहीं, बल्कि उनके जीवन पर हुआ था। हादी मतार नामक एक युवक ने वर्ष 2022 में सलमान रुश्दी पर हमला किया था। यह हमला इसलिए किया था क्योंकि वह उन पर जारी फतवों का पालन कर रहा था। सलमान रुश्दी पर कुल 15 वार किये गए थे। उनकी आँख, गाल, गर्दन, छाती, और जांघ पर घाव हुए थे। उन्होनें सैटेनिक वर्सेज़ नामक उपन्यास लिखा था, जिसके विषय में कहा जाता है कि यह इस्लाम के पैगंबर मुहम्मद के जीवन पर आधारित था। इसके कारण उनपर बेअदबी के आरोप लगे थे और फिर उन पर फतवे जारी हुए थे।
उन्हें ब्रिटेन में पुलिस की सुरक्षा में रहना पड़ा था और जब फतवों का डर कुछ कम हुआ था, तो 2000 के दशक में वे न्यूयॉर्क में बस गए थे। मगर इस सुरक्षा घेरे को तोड़कर भी उनपर हमला हो गया था। वे घायल हुए और एक आँख की रोशनी से हाथ धो बैठे।
रुश्दी पर हमले का कट्टरपंथियों ने मनाया जश्न
सलमान रुश्दी पर जब हमला हुआ था तो सबसे ज्यादा अट्टाहास उनपर जिहादी मानसिकता वाले लोगों ने ही किया था। पूरी की पूरी सोशल मीडिया पर जिहादी तत्व इस हमले का समर्थन कर रहे थे और भारत में भी एक बड़ा वर्ग ऐसा था, जो इस हमले पर खुशी जाहिर कर रहा था।
हिन्दुओं ने जताया था दुख
इस हमले पर दुख व्यक्त जो वर्ग कर रहा था, वह था एक विशाल ऐसा हिन्दू समाज, जो अभिव्यक्ति की आजादी का आदर करता है। जिसे पता है कि स्वतंत्रता अनमोल होती है और जिसने सदा ही लेखन में स्वतंत्रता का समर्थन किया है। यह वही वर्ग है, जिससे वह कथित आजादी गैंग डरता है और बदनाम करता है, जो केवल एकतरफा आजादी चाहता है और जो सलमान रुश्दी पर हुए हमले पर अफसोस जताता हुआ भी हमलावर की पहचान पर बात नहीं करता है। वह उन कारणों पर भी चुप रहता है, जो सलमान पर हमले का कारण बनते हैं। मगर हिन्दू समुदाय खुलकर जिहादी तत्वों की आलोचना करता है क्योंकि वह समझता है कि एक लेखक को अपनी बात खुलकर कहने का अवसर हमेशा मिलना चाहिए।
हमला मुस्लिमों ने किया, लेकिन रुश्दी ने हिन्दू राष्ट्रवाद पर उगला जहर
मगर अपने हमले के बाद जब सलमान रुश्दी बोल रहे हैं तो कह रहे हैं कि उन्हें भारत में रह रहे उनके पत्रकार दोस्तों से पता चलता रहता है कि भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खतरा है और पत्रकारों और लेखकों पर दबाव हैं। सबसे मजे की बात यही है कि जिहादी हमले में घायल सलमान रुश्दी को हिन्दू राष्ट्रवाद का खतरा दशकों पहले दिख गया था। ब्लूमबर्ग में मिशल हुसैन के साथ बातचीत करते हुए सलमान रुश्दी ने कहा कि उन्हें भारत में मुस्लिमों की छवि को लेकर और भारत के लेखकों, पत्रकारों और शिक्षाविदों पर लगातार बढ़ रहे दबाव को लेकर बहुत चिंता है।
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रुश्दी का बयान सुनिए
उन्होंने इस इंटरव्यू में कहा कि “मैं इसे लेकर बहुत चिंतित हूँ। भारत में मेरे बहुत सारे दोस्त हैं और जो पत्रकार हैं और जहां से मुझे बहुत रोचक जानकारियाँ मिलती रहती हैं कि वहाँ पर क्या चल रहा है।“ उन्होंने आगे कहा, “मुझे लगता है कि हर कोई पत्रकारों, लेखकों, बुद्धिजीवियों की अभिव्यक्ति की आजादी पर हो रहे हमलों को लेकर बहुत चिंता में है।“ मगर उसके बाद जो वह कहते हैं, वह और भी हास्यास्पद और विडंबनापूर्ण है। वे कह रहे हैं कि इसके अतिरिक्त देश के इतिहास को दोबारा लिखे जाने का भी प्रयास हो रहा है और अनिवार्य रूप से यह दिखाना कि हिन्दू अच्छे हैं और मुसलमान बुरे।
उन्होंने वीएस नायपाल का भी उल्लेख करते हुए कहा कि वीएस नायपाल ने यह कहा था कि भारत एक घायल सभ्यता है तो मूल विचार यह कि भारत एक हिन्दू सभ्यता है और जिसे मुस्लिमों ने घायल किया है, इस पर मिशेल कहती हैं कि “हमलावर”!
और रुश्दी भी हामी भरते हैं।
मोदी सरकार ने ही सलमान रुश्दी की सैटेनिक वर्सेस से प्रतिबंध हटाया था
जिस मोदी सरकार की आलोचना सलमान रुश्दी कर रहे हैं, और जिसपर अभिव्यक्ति की आजादी को कुचलने का आरोप लगा रहे हैं, यह वही मोदी सरकार है, जिसके शासनकाल में उनकी पुस्तक सैटेनिक वर्सेज़ से प्रतिबंध हटा है। नहीं तो अभी तक भारत में वह पुस्तक उपलब्ध ही नहीं थी। वह कौन से विचारधारा थी, जिसने उनकी पुस्तक पर प्रतिबंध लगाया था और वे उनके कौन से मित्र हैं, जिन्होनें इस प्रतिबंध का समर्थन किया था?
अभिव्यक्ति की आजादी का समर्थन या मुस्लिम आक्रमणकारियों के सच सामने आने से डर?
सलमान रुश्दी के इस इंटरव्यू से एक बात तो स्पष्ट है कि वे अपनी मुस्लिम पहचान को ही मुख्य मानते हैं। क्योंकि भारत में जो इतिहास के अनकहे तथ्य सामने आ रहे हैं, वे केवल मुस्लिम आक्रमणकारियों की ही बातें बताते हैं, उनमें कहीं से भी मुस्लिमों को बदनाम करने का भाव नहीं है। यदि यह तथ्य सामने आता है कि औरंगजेब ने दराशिकोंह की निर्मम हत्या के बाद अपने वालिद शाहजहाँ को अपने भाई का कटा हुआ सिर तश्तरी में रखकर भेजा था, तो इसमें पीड़ित भी मुसलमान है और मारने वाला भी मुसलमान है। जहांगीर ने गद्दी के लालच में अपने ही बेटे को अंधा करा दिया था, तो इसमें पीड़ित भी मुसलमान है और मारने वाला भी, तो इसमें मुस्लिमों की बदनामी कैसे होगी?
हिन्दुओं की अभिव्यक्ति की आजादी से डरते हैं सलमान रुश्दी
सच कहा जाए तो अभिव्यक्ति की आजादी का समर्थन करने वाले सलमान रुश्दी, जो जिहादी मानसिकता के हमले के कारण अपनी आँख गवां चुके हैं, वे हिंदुओं की अभिव्यक्ति की आजादी से डरते हैं।
वे हिंदुओं को यह अभिव्यक्त करने की आजादी देना ही नहीं चाहते कि दरअसल कितनी हत्याएं जिहादी मानसिकता के लोगों ने की हैं और कितने मंदिर उसी मानसिकता में तोड़े गए। शायद जिहादी हमले में जो उनकी एक आँख गई है, उसने उन्हें यह देखने में असमर्थ कर दिया है कि हिंदुओं को भी अपना इतिहास लिखने की उतनी ही आजादी है, जितना कि आक्रमणकारी मुस्लिम शासकों को थी और उनका गुणगान करने वाले वामपंथी और मुस्लिम इतिहासकारों को है।
















