अमेरिकी संस्था यूएससीआईआरएफ ने भारत के खिलाफ एक बार फिर पक्षपातपूर्ण रिपोर्ट जारी की है। यह रिपोर्ट ऐसे समय आई है, जब भारत विरोधी मुस्लिम कट्टरपंथी ताकतें आतंकवाद के नए षड्यंत्र रच रही हैं। इस संस्था ने इन षड्यंत्रकारियों को ‘मजहबी अधिकारों’ से जोड़कर भारत के खिलाफ गलत प्रचार किया है। रिपोर्ट में बताए गए सभी मुद्दे आतंकवाद को छुपाने और आतंकवादियों को संरक्षण देने के प्रयास हैं। भारत सरकार ने इसे ‘भ्रामक’ और ‘तथ्यहीन’ रिपोर्ट करार दिया है जो भारत के बहु-सांस्कृतिक समाज और पांथिक सहिष्णुता के मूल्यों को गलत तरीके से प्रस्तुत करती है।
घुसपैठ, और आतंकवाद को संरक्षण
यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम (यूएससीआईआरएफ) एक स्वतंत्र अमेरिकी संघीय आयोग है, जिसकी स्थापना 1998 में हुई थी। इसे विश्वभर में पांथिक स्वतंत्रता के सार्वभौमिक अधिकारों की स्थिति पर रिपोर्ट तैयार करने का कार्य सौंपा गया है। यह संस्था प्रतिवर्ष रिपोर्ट जारी करती है और समय-समय पर इसके पदाधिकारियों के बयान भी आते रहते हैं। इस वर्ष की रिपोर्ट विशेष रूप से भारत के अल्पसंख्यकों, खासकर मुस्लिम समुदाय पर केंद्रित है, जिसमें बहुसंख्यक हिंदुओं और भारत सरकार पर मुसलमानों को मजहबी आधार पर उत्पीड़ित करने के गंभीर आरोप लगाए गए हैं। हालांकि, इस रिपोर्ट को पढ़ने पर प्रतीत होता है कि यह मजहबी स्वतंत्रता का निष्पक्ष विश्लेषण न होकर घुसपैठ, आतंकवाद और अलगाववाद को संरक्षण देने की कोशिश है। यह रिपोर्ट नवंबर के तीसरे सप्ताह में आई, जो भारत में मतदाता गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) अभियान के संवेदनशील समय से मेल खाती है। इस माह दो अन्य महत्वपूर्ण समाचार भी आए।
एक समाचार अयोध्या में रामजन्मभूमि मंदिर की पूर्णता और 25 नवंबर को ध्वजारोहण समारोह का था। अयोध्या में ढांचा विवाद का निपटारा पहले सर्वोच्च न्यायालय कुछ वर्ष पहले कर चुका है, जिसे सभी पक्षों ने स्वीकार किया। मंदिर निर्माण के शुभारंभ समारोह में मुस्लिम समुदाय के भी कुछ लोग शामिल हुए। फिर भी भारत विरोधी शक्तियां पुराने विवाद को तूल देकर मुसलमानों को भड़काने का प्रयास कर रही हैं। दूसरा समाचार बड़े आतंकी षड्यंत्र की विफलता से जुड़ा था। इसमें देश के 12 राज्यों में फैले आतंकी नेटवर्क का खुलासा हुआ, जिसके तार पाकिस्तान, तुर्की, सऊदी अरब व हमास से जुड़े थे। आतंकियों की योजना भारत में 100 से अधिक स्थानों पर सिलसिलेवार विस्फोट करने और किसी बड़े हिंदू धार्मिक आयोजन के अवसर पर पानी में जहर मिलाकर लाखों हिंदुओं को मारने की थी।

रिपोर्ट की भाषा कट्टरपंथियों जैसी
इन खबरों के बीच यूएससीआईआरएफ की रिपोर्ट की प्रस्तुति व भाषा शैली उपरोक्त तीन विषयों की वास्तविकता से अलग है। रिपोर्ट की भाषा वही है, जो एआईएमआईएम नेता ओवैसी और तृणमूल कांग्रेस के विधायक हुमायूं कबीर की है। हुमायूं कबीर ने मुर्शिदाबाद जिले में बाबरी मस्जिद बनाने की घोषणा की है और इसके शिलान्यास के लिए 6 दिसंबर की तारीख चुनी है। इसी दिन अयोध्या में विवादित ढांचा ध्वस्त हुआ था। प्रस्तावित मस्जिद का नाम ‘बाबरी’ रखने और 6 दिसंबर की तिथि चुनने से तृणमूल विधायक की मानसिकता और मंसूबे स्पष्ट हो रहे हैं। पश्चिम बंगाल के राज्यपाल ने अनहोनी की आशंका जताते हुए राज्य सरकार से कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक कदम उठाने के निर्देश दिए हैं।
मुसलमानों को तुष्ट करने के क्रम में कांग्रेस सांसद उदितराज और सुरेंद्र राजपूत ने हुमायूं कबीर का समर्थन किया है। दरअसल, कांग्रेस, तृणमूल और कुछ अन्य राजनीतिक दलों को केवल मुस्लिम वोटों में ही अपना राजनीतिक भविष्य सुरक्षित दिखाई देता है। इसलिए वे सनातन आस्था को ठेस पहुंचाने और मुसलमानों को तुष्ट करने के लिए किसी भी हद तक जाने से परहेज नहीं करते।
प्रतीत होता है कि यूएससीआईआरएफ को भी अपना भविष्य मुस्लिम तुष्टिकरण में ही दिखता है। रिपोर्ट में ‘विवादित ढांचे’ ‘बाबरी मस्जिद’ लिखना तो इसी ओर संकेत करता है। विवादित ढांचे को ‘बाबरी मस्जिद’ नाम अंग्रेजों के शासनकाल में दिया गया, हिंदुओं और भारत सरकार ने नहीं। इसे विवादित बताते हुए अंग्रेजों ने मंदिर इस परिसर पर ताला लगवाया था। फिर भी यूएससीआईआरएफ ने इसे विवादास्पद न कहकर सीधे ‘बाबरी मस्जिद’ लिखा और कहा कि ‘अयोध्या में मंदिर का निर्माण ‘बाबरी मस्जिद’ के खंडहरों पर किया गया है।’
वास्तव में यह रिपोर्ट उन भारत विरोधी शक्तियों की मंशा को पूरा करती है, जो देश में सामाजिक व सांप्रदायिक तनाव फैला कर विकास को बाधित करने का मंसूबा पाले बैठी हैं। एक ऐसी शक्ति, जो छल-बल से भारत के सांस्कृतिक स्वरूप को बदलने के कुत्सित प्रयासों में जुटी है। इनकी कुदृष्टि राम मंदिर पर है। राम मंदिर आंदोलन के साथ राष्ट्रीय और सांस्कृतिक भावनाओं के जाग्रत होने से ये शक्तियां परेशान हैं। इसलिए ये राम मंदिर से जुड़ी महत्वपूर्ण तिथियों पर विवाद पैदा करने की कोशिश करती हैं और ‘बाबरी मस्जिद’ नाम का शोर भी मचाती हैं। इन्हीं दो बातों की झलक यूएससीआईआरएफ की रिपोर्ट में दिखती है।
आतंकवाद और अपराध को मजहब से जोड़ा
रिपोर्ट में एक बिंदु भारत में नागरिकता सत्यापन और घुसपैठियों की जांच का भी है, जिसे मुसलमानों के ‘मजहबी अधिकार’ से जोड़कर तीखी आलोचना की गई है। हालांकि, यह संस्था ऐसे देश से जुड़ी है, जहां केवल वीजा मियाद समाप्त होने पर ही विदेशी नागरिकों को ‘डिपोर्ट’ कर दिया जाता है। लेकिन इस पर वह कुछ नहीं बोलती। भारत ने घुसपैठियों को बाहर करने की बात कही तो यूएससीआईआरएफ उसकी आलोचना कर रही है। यही नहीं, अपनी रिपोर्ट में इसने आतंकियों और अपराधियों के विरुद्ध की जाने वाली कार्रवाई को भी ‘मजहबी अधिकारों’ से जोड़कर मुसलमानों को भड़काने का प्रयास किया है। यह जानते हुए कि दुनिया के किसी भी देश में आतंकियों और अपराधियों की पहचान मजहबी या पांथिक आधार पर नहीं की जाती है। भारत में बहुसंख्यक समाज द्वारा मजहबी आधार पर ‘अल्पसंख्यकों’ के उत्पीड़न का प्रमाण भी नहीं मिलता। इसके विपरीत ‘अल्पसंख्यक’ ही पांथिक आधार पर बहुसंख्यक समाज पर हमले करते रहे हैं।
हिंदुओं के तीज-त्योहारों पर हमले तो आम हैं। फिर भी यूएससीआईआरएफ ने अपनी रिपोर्ट में भारत सरकार पर आरोप लगाया है कि वह मजहबी आधार पर अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा और उत्पीड़न को बर्दाश्त करती है या बढ़ावा देती है। रिपोर्ट में कमिश्नर स्टीफन श्नेक ने कहा है, ‘‘मुसलमानों को अपनी नागरिकता साबित करने के लिए मजबूर करना, मजहबी पहचान के आधार पर निशाना बनाना तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नागरिक व राजनीतिक अंतरराष्ट्रीय संधियों का उल्लंघन है।’’ स्टीफन ने ट्रंप प्रशासन से भारत के साथ द्विपक्षीय संबंधों में ‘मजहबी सुरक्षा’ को शामिल करने का आग्रह भी किया है।
यही नहीं, इस रिपोर्ट में सरकार द्वारा रोहिंग्या घुसपैठियों को खोज कर उन्हें वापस भेजने पर भी आपत्ति जताई गई है। रिपोर्ट कहती है कि घुसपैठियों को ‘शरणार्थी’ माना जाना चाहिए। संस्था के अध्यक्ष अध्यक्ष विकी हार्टजलर ने सरकार के इस कदम को अंतरराष्ट्रीय कानून और गैर-वापसी के सिद्धांत के विरुद्ध बताते हुए भारत से रोहिंग्या घुसपैठियों के ‘मनमाने निष्कासन‘ और उनकी हिरासत पर रोक लगाने की बात भी कही है। हालांकि, म्यांमार में रोहिंग्या पर अत्याचार की आशंका के बावजूद म्यांमार पर कार्रवाई की अनुशंसा नहीं की गई है, बल्कि भारत पर दबाव बनाने का प्रयास किया गया है।
रिपोर्ट में पाकिस्तान-बांग्लादेश में हिंदुओं की हत्या व उन पर लगातार हो रहे हमलों पर कुछ नहीं कहा गया है। यूएससीआईआरएफ ने अपनी रिपोर्ट में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर भी निशाना साधा है और कहा है कि यह संगठन कन्वर्जन रोकने का प्रयास करता है। रिपोर्ट की यह पंक्ति परोक्ष रूप से उन तत्वों की करतूतों पर परदा डालती है, जो भारत में छल-प्रपंच से कन्वर्जन कर रहे हैं। कोई संगठन यदि इन षड्यंत्रों से समाज को जागरूक करने का प्रयास करता है तो यूएससीआईआरएफ को उस पर भी आपत्ति है। यही नहीं, रिपोर्ट में रा.स्व.संघ पर गोहत्या रोकने के प्रयास और पाठ्यपुस्तकों से मुस्लिम शासकों के संदर्भ हटाने का भी आरोप लगाया गया है।
यूएससीआईआरएफ ने अपनी रिपोर्ट में अमेरिका के विदेश विभाग से भारत को ‘विशेष चिंता वाले देश’ वाले देश के रूप में नामित करने की सिफारिश भी की है। यह पहला अवसर नहीं है, जब यूएससीआईआरएफ ने ने भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करते हुए ऐसी रिपोर्ट जारी की है। इससे पहले भी इसने कई बार भारत के खिलाफ रिपोर्ट जारी की है, जिनमें नागरिकता संशोधन विधेयक जैसे विषय शामिल थे। पहले की तरह इस बार भी भारत सरकार ने इसकी रिपोर्ट को ‘भ्रामक’ और ‘तथ्यहीन’ बताते हुए पूरी तरह से खारिज किया है।
















