बेल्जियम में हाल ही में हुई सुनवाई में अदालत ने एंटवर्प कोर्ट ऑफ अपील के 17 अक्टूबर 2024 के फैसले को कायम रखा। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि मेहुल चोकसी की यह दलील कि भारत भेजे जाने पर उन्हें यातना का खतरा है, निराधार है। ब्रसेल्स के महाधिवक्ता हेनरी वेंडरलिंडेन ने ईमेल के जरिए जानकारी दी कि सर्वोच्च अदालत ने चोकसी की अपील खारिज कर दी है। इसका मतलब यह है कि निचली अदालत का फैसला ही अब लागू होगा।
मेहुल चोकसी पर पंजाब नेशनल बैंक (PNB) में 13,000 करोड़ रुपये के कथित घोटाले का आरोप है। उन्होंने भारत प्रत्यर्पण को चुनौती दी थी। इसके बाद एंटवर्प की अपीली अदालत ने इस प्रत्यर्पण को वैध बताते हुए पहले से दिए गए आदेश को बरकरार रखा। अदालत ने माना कि चोकसी के भारत भेजे जाने पर उन्हें किसी प्रकार का असहनीय जोखिम या यातना नहीं होगी। एंटवर्प की अपीली अदालत में चार सदस्यीय अभियोग कक्ष ने 29 नवंबर, 2024 को जिला अदालत द्वारा दिए गए ‘प्री-ट्रायल चैंबर’ के आदेशों की समीक्षा की। अदालत ने पाया कि जिला अदालत के आदेश में कोई खामी नहीं है। जिला अदालत ने मई 2018 और जून 2021 में मुंबई की विशेष अदालत द्वारा जारी गिरफ्तारी वारंट को लागू-योग्य बताया था और चोकसी के प्रत्यर्पण की अनुमति दी थी।
इस फैसले के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि मेहुल चोकसी अब बेल्जियम से भारत प्रत्यर्पित किए जाएंगे। विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम भारत में जांच और न्याय प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण है। भारत सरकार और जांच एजेंसियां लंबे समय से चोकसी को न्याय के कटघरे में लाने के लिए प्रयास कर रही थीं। चोकसी के प्रत्यर्पण से भारत में PNB घोटाले की जांच में गति आने की उम्मीद है। इस मामले में कई कंपनियों और व्यक्तियों के खिलाफ जांच जारी है। साथ ही, यह फैसला अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत प्रत्यर्पण मामलों में न्याय प्रक्रिया की पारदर्शिता और कानूनी नियमों का पालन करने का उदाहरण भी है।
अब चोकसी के भारत आने की प्रक्रिया शुरू होगी और उनके खिलाफ दर्ज केस की सुनवाई भारत में होगी। विशेषज्ञों के अनुसार, बेल्जियम और भारत की न्याय प्रणाली ने इस मामले में नियमों के अनुसार कदम उठाया है। इससे यह संदेश भी गया कि बड़े वित्तीय घोटालों में दोषियों को बचने का मौका नहीं मिलेगा। इस तरह, ब्रसेल्स की अदालत का फैसला न केवल चोकसी के लिए बल्कि भारत में बड़े घोटालों के मामलों में न्याय दिलाने की दिशा में भी अहम है। अदालत ने साफ किया कि कानून के सामने कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं है।

















