America ने China के नागरिक गुआन को निर्वासित करने से किया मना, गुआन ने सिंक्यांग में Uighur दमन को किया था उजागर
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America ने China के नागरिक गुआन को निर्वासित करने से किया मना, गुआन ने सिंक्यांग में Uighur दमन को किया था उजागर

गुआन वही है जिसने चोरी छिपे उइगर यातना शिविरों को कैमरे में कैद करके दुनिया को उस दमन की जानकारी दी थी। उसके बाद से ही चीन की कम्युनिस्ट सरकार उसे किसी भी तरह वापस चीन बुलाने पर तुली हुई थी

Written byAlok GoswamiAlok Goswami
Dec 24, 2025, 12:17 pm IST
in विश्व, विश्लेषण
चीनी नागरिक गुआन हेंग (तस्वीर धुंधली की गई है)

चीनी नागरिक गुआन हेंग (तस्वीर धुंधली की गई है)

चीन सिंक्यांग में मानवाधिकार उल्लंघन की किस प्रकार हदें पार कर रहा है, यह तथ्य विश्व के किसी भी सभ्य समाज की जानकारी से अछूता नहीं रहा है। चीन सिंक्यांग में उइगर मुस्लिमों के संपूर्ण चीनीकरण की प्रक्रिया में इस कदर लगा है कि उइगरों की आने वाली नस्लें भूल ही जाएं कि उनके पुरखे मूलत: चीन के मुस्लिम हुआ करते थे। कम्युनिस्ट चीन इस बात का भी बहुत ध्यान रखता है कि उसकी इन हरकतों को कोई चीन दूसरे देशों तक न पहुंचाए। पूर्व में अनेक अवसरों पर ऐसी ‘हिमाकत’ करने वालों को चीन उस देश पर दबाव डालकर अपने यहां वापस लेता है और फिर उनका क्या होता है, यह किसी मीडिया में नहीं आ पाता। ऐसा ही एक ताजा मामला अमेरिका से सामने आया है। पता चला है कि अमेरिका के विदेश विभाग ने अपने यहां रह रहे चीनी नागरिक गुआन हेंग को निर्वासित करने से इंकार कर दिया है।

38 साल का गुआन वही है जिसने चोरी छिपे उइगर यातना शिविरों को कैमरे में कैद करके दुनिया को उस दमन की जानकारी दी थी। उसके बाद से ही चीन की कम्युनिस्ट सरकार उसे किसी भी तरह वापस चीन बुलाने पर तुली हुई थी और इसके लिए उसने अमेरिका पर कथित दबाव तक बनाया था। लेकिन अब अमेरिका के इस ताजे फैसले से दुनियाभर के मानवाधिकारी कार्यकर्ता राहत की सांस ले रहे हैं।

चीन सिंक्यांग में मानवाधिकार उल्लंघन की किस प्रकार हदें पार कर रहा है, यह तथ्य विश्व के किसी भी सभ्य समाज की जानकारी से अछूता नहीं रहा है (File Photo)

दमन के कारनामे उजागर हो रहे

दुनिया भर में अनेक मंचों से चीन की अपने आलोचकों को दबाने की कोशिशों के संदिग्ध प्रयासों की व्यापक चर्चा होती रही है। यूएस प्रशासन ने ऐसे व्यक्तियों के बारे में कई बार स्पष्ट किया कि निर्वासन या प्रत्यावर्तन के लिए राजनीतिक दबाव के बजाय कानून-सम्मत प्रक्रिया और मानवाधिकार मानक ही व्यवहार के आधार होंगे। अमेरिका ने यह स्पष्ट किया है कि वह राजनीतिक शरण की शर्तों, स्वतंत्र न्यायिक प्रक्रियाओं और सुरक्षा हेतु जरूरी कदमों के बीच संतुलन बनाए रखेगा। यह संदेश तब और प्रासंगिक होता है जब विश्व में चीन की उइगर मुस्लिमों के दमन के कारनामे उजागर हो रहे हैं।

चीन ने सिंक्यांग प्रांत में उइगरों की गतिविधियों को सीमित किया हुआ है। इसके लिए उसने ग्राम-स्तर तक निगरानी तंत्र स्थापित किए हुए हैं। हर इलाके में सीसीटीवी कैमरे, बायोमीट्रिक पहचान मशीनें लगी हैं जो मुस्लिम इलाकों में पल पल की गतिविधियों की जानकारी देती हैं। ऐसी कड़ी निगरानी है कि किसी भी सामाजिक आंदोलन की संभावना तक न बन पाए और ऐसा हो भी तो फौरन उस पर कार्रवाई की जा सके।

बताया जाता है कि सिंक्यांग में चीनी प्रशासन ने ‘पुनर्वास केन्द्र’ बनाए गए हैं जो असल में ‘यातनागृह’ ही हैं। इनमें उइगरों का कथित चीनीकरण होता है। उन्हें यह भुलाने की कोशिश की जाती है कि उनका मजहब इस्लाम है। इन ‘सुधार’ कार्यक्रमों के तहत लोगों को चीन की संस्कृति, भाषा, रहन—सहन सिखाया जाता है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार समूहों के अनुसार यह कदम अत्यधिक कठोर ढंग से मजहबी और भाषाई अल्पसंख्यक उइगरों को निशाने पर रखता है जिससे उनकी सांस्कृतिक पहचान और मजहबी कायदों को कुंद किया जाता है।

उस प्रांत में उइगर और अन्य मुस्लिम समुदायों के लिए शिक्षा-नीतियां मंदारिन यानी चीनी भाषा में चलती दिखती हैं, किन्तु उन समुदायों की मजहबी गतिविधियों पर ज्यादा नियंत्रण दिखता है।

सिंक्यांग की सीमा-नीतियां अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर उलटा असर डाल रही हैं। चीन इसके पीछे ‘सुरक्षा’ का तर्क देता है, जबकि आलोचक कहते हैं कि यह राजनीतिक नियंत्रण का ही एक पहलू है जिसे अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार मानवाधिकार उल्लंघन के रूप में देखा जाना चाहिए।

मजहब विरोधी चीनी प्रशासन ने उइगर मुस्लिमों की अनेक मस्जिदों को शॉपिंग मॉल में बदल दिया है। मजहबी रस्में भी सीमति दायरे और समय पर मनाने की इजाजत दी जाती है। हज पर जाने वाले मुस्लिमों की संख्या सीमित होती है और उन पर कड़ी निगरानी रखी जाती है। उइगरों की भाषा और इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में बदलाव करके उनकी सांस्कृतिक पहचान को दबाने के प्रयास किए गए हैं।

सिंक्यांग में चीनी प्रशासन ने ‘पुनर्वास केन्द्र’ बनाए गए हैं जो असल में ‘यातनागृह’ ही हैं (File Photo)

रोजगार-नीतियों में उइगर युवाओं के लिए विशेष निगरानी कार्यक्रम चलते हैं। कुछ रिपोर्ट बताती हैं कि रोजगार देने से पहले उइगरों से उनकी राजनीतिक सोच की पुष्टि आदि की जाती है। इससे पूर्वाग्रह और समुदाय-आधारित भेदभाव की कलई स्वत: ही खुल जाती है।

कहने को तो संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय संघ और कई मानवाधिकार संगठनों ने सिंक्यांग के हालात पर चिंता व्यक्त की है। वे चीन से स्पष्ट और ठोस आधार वाले जवाब तलब करते रहे हैं, लेकिन चीन हर बार इसे ‘दुष्प्रचार’ ही बताता रहा है। चीन ने इन सभी आरोपों को ‘गलत सूचना पर आधारित’ कहता आ रहा है।

अमेरिका ने गुआन हेंग के मामले में भी नीतिगत रूप से निर्वासन के बजाय मानवीय दृष्टिकोण, कानूनी प्रावधानों और शरण की प्रणाली के अनुसार कदम उठाने की बात की है। इससे आंतरिक सुरक्षा ढांचे के साथ-साथ मानवाधिकारों की रक्षा की दिशा में एक स्पष्ट संदेश गया है।

कूटनीति के लिहाज से देखें तो अमेरिका और अन्य देशों का दबाव चीन को सीमित रखने में सहायक रहा है। सिंक्यांग में उइगर मुस्लिम समुदाय के दमन और इसके अंतरराष्ट्रीय आयामों पर बहस जारी रही है। अमेरिका का निर्वासन से इनकार बेशक एक राजनीतिक निर्णय है।

Topics: extraditionChinaउइगरसिंक्यांगचीनअमेरिकाAmericaUighur Muslimsxinxiang
Alok Goswami
Alok Goswami
A Delhi based journalist with over 25 years of experience, have traveled length & breadth  of the country and been on foreign assignments too. Areas of interest include Foreign Relations, Defense, Socio-Economic issues, Diaspora, Indian Social scenarios, besides reading and watching documentaries on travel, history, geopolitics, wildlife etc. [Read more]
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