भारतीय संविधान सामाजिक न्याय का वह जीवंत महाकाव्य है जो सदियों के जातिगत अपमान को मिटाने का संकल्प लेता है। अनुसूचित जातियों और जनजातियों को प्रदत्त आरक्षण कोई साधारण सरकारी सुविधा नहीं, अपितु ऐतिहासिक अन्याय की क्षतिपूर्ति और समता की संवैधानिक गारंटी है। किन्तु जब कोई व्यक्ति स्वेच्छा से हिन्दू, सिख अथवा बौद्ध धर्म त्याग कर इस्लाम मजहब या ईसाई रिलीजन अपना लेता है, तो क्या वह अब भी वर्ण-दमन का शिकार बना रहता है जिसके विरुद्ध यह संरक्षण दिया गया था? यही मूल प्रश्न बार-बार न्याय-मंदिरों के द्वार खटखटाता रहा है।
हाल ही में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक याचिका खारिज करते हुए पुनः स्पष्ट किया कि धर्म-परिवर्तन के साथ अनुसूचित जाति का संरक्षण स्वतः समाप्त हो जाता है। यह निर्णय संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 की आत्मा का पुनरुत्थान है तथा संविधान सभा की ऐतिहासिक बहसों और सर्वोच्च न्यायालय के सुप्रतिष्ठित सिद्धांतों का सुसंगत अनुसरण भी है ।
संवैधानिक ढाँचा और 1950 का ऐतिहासिक आदेश
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 341 राष्ट्रपति को अधिकार देता है कि वे कुछ जातियों को “अनुसूचित जाति” घोषित करें। किन्तु संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 की पैरा 3 अत्यंत स्पष्ट है :
“जो व्यक्ति हिन्दू, सिख अथवा बौद्ध धर्म के अतिरिक्त किसी अन्य धर्म का पालन करता हो, वह अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जाएगा।”
विदित हो कि 1956 में सिखों और 1990 में नव-बौद्धों को इसमें सम्मिलित किया गया, क्योंकि इन दोनों पंथों की सामाजिक यात्रा हिन्दू वर्ण-व्यवस्था और अस्पृश्यता से अविभाज्य रही। संविधान के अनुच्छेद 25(2) के स्पष्टीकरण (Explanation) के अनुसार, ‘हिंदुओं’ में सिख, जैन और बौद्ध पन्थों को मानने वाले लोग भी शामिल हैं।
27 अगस्त 1949 को डॉ. भीमराव आम्बेडकर जी ने कहा :
“अस्पृश्यता का यह दोष हिन्दू समाज की विशिष्ट बीमारी है… मैं समझ नहीं पाता कि जो व्यक्ति ईसाई या मुसलमान बन जाता है, वह उस अक्षमता को कैसे झेलता रह सकता है जो उसे हिन्दू रहते हुए थी।”
(Constituent Assembly Debates, Official Report, Volume IX, 27th August 1949, पृष्ठ 664–666)
उसी दिन मुख्य न्यायाधीश एच. जे. कनिया जी ने टिप्पणी की :
“यदि कोई व्यक्ति हिन्दू होना छोड़ देता है, तो वह अनुसूचित जाति का सदस्य भी होना छोड़ देता है।” (Constituent Assembly Debates, Vol. IX, 27th August 1949, पृष्ठ 704)
ये उद्धरण सिद्ध करते हैं कि आरक्षण को जन्मजात विशेषाधिकार नहीं, अपितु हिन्दू सामाजिक ढाँचे के भीतर उत्पन्न विशिष्ट ऐतिहासिक अपमान का प्रतिकार समझा गया था।
माननीय सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णय
1. सूसे वि. भारत संघ, (1985) Supp SCC 590 के मामले में कोर्ट ने कहा कि –
“अस्पृश्यता की अक्षमता हिन्दू धर्म से संबद्ध एक सामाजिक अक्षमता है… जब कोई व्यक्ति हिन्दू होना छोड़ देता है, तो वह अक्षमता भी समाप्त हो जाती है।”
2. एस. अंबालगन वि. बी. देवराजन, (1984) 2 SCC 112 के मामले में कोर्ट ने निर्णीत किया कि –
“जाति कोई अविनाशी स्थिति नहीं है… यह एक सामाजिक संयोजन है जिसके सदस्य एक ही धर्म का पालन करने और एक ही रीति-रिवाज अपनाने के कारण एक-दूसरे से बंधे होते हैं।”
3. केरल राज्य वि. चंद्रमोहनन, (2004) 3 SCC 429 के मामले में कोर्ट ने निर्णीत किया कि –
“जब कोई व्यक्ति हिन्दू होना छोड़कर दूसरा धर्म स्वीकार कर लेता है, तो अनुसूचित जाति की स्थिति से जुड़ी सामाजिक कलंक भी समाप्त हो जाती है।”
4. कैलाश सोनकर वि. माया देवी, (1984) 2 SCC 91 के मामले में कोर्ट ने निर्णीत किया कि –
“धर्म-परिवर्तन के बाद यदि व्यक्ति पुनः हिन्दू धर्म में लौटता है और उसका समुदाय उसे स्वीकार कर लेता है, तभी अनुसूचित जाति का दर्जा पुनर्जीवित हो सकता है। केवल व्यक्तिगत घोषणा पर्याप्त नहीं।”
क्या इस्लाम मजहब और ईसाई रिलीजन में वास्तव में कोई जाति-भेद नहीं?
सत्यता यह भी है कि भारतीय मुसलमानों में अशराफ-अजलाफ-अरजल (पसमांदा) और ईसाइयों में सीरियाई बनाम दलित ईसाई के बीच जातिगत भेदभाव आज भी हिन्दू समाज से अधिक भयावह स्थिति में विद्यमान है। यही कारण है कि हिन्दू धर्म में से छल ,बल या लालच से मतांतरित व्यक्ति इस्लाम मजहब या ईसाई रिलीजन में जाकर , वहां भी जातिगत भेदभाव से पीड़ित होकर आपने आप को ठगा सा अनुभव करता है , और आरक्षण एवं अन्य सुविधाओं से भी हाथ धो बैठता है।
यदि मतांतरित व्यक्ति को भी SC/ST कोटा मिलता रहे तो :-
- उन लाखों परिवारों का हिस्सा निरंतर घटेगा जो आज भी हिन्दू/सिख/बौद्ध परंपरा में रहते हुए समाज मे अस्पृश्यता की ज्वलंत पीड़ा झेल रहे हैं।
- आरक्षण व्यक्तिगत गरीबी-निवारण का साधन बन जाएगा, जबकि संविधान ने इसे सामूहिक ऐतिहासिक अन्याय के प्रतिकार के रूप में कल्पित किया था।
- प्रोत्साहन मिलेगा कि व्यक्ति लाभ के लिए धर्म बदल ले और बाद में पुनः लौट आए,जैसा अनेक मामलों में देखा गया है। डिलिस्टिंग की मांग इसीलिए जोर पकड़ रही है ।
- अलगाववादी और राष्ट्रद्रोही ताकतों, कुछ गद्दार वामपंथियों तथा मतांतरण में लगी कुछ मिशनिरियों तथा कुछ जेहादी कट्टरपंथियों का भारत को कमजोर करने का एजेंडा सफल हो जाएगा।
उक्तानुसार कारणों से भी इलाहाबाद उच्च न्यायालय का निर्णय इन प्रवृत्तियों पर अंकुश है। यह कहता है कि आरक्षण कोई हस्तांतरणीय व्यापारिक संपत्ति नहीं, अपितु उन लोगों के लिए संवैधानिक कवच है जो अभी भी उसी सामाजिक जंजीर में जकड़े हैं जिसे तोड़ने के लिए डॉ. आम्बेडकर ने जीवन अर्पित कर दिया।
हम कह सकते हैं कि इलाहाबाद हाइकोर्ट के निर्णय में न्याय और करुणा का संतुलन दिखाई पड़ता है । क्योंकि यद्यपि बिना दबाव या लालच में आये स्वेच्छा से मत-परिवर्तन करना प्रत्येक नागरिक का भले ही मौलिक अधिकार है (अनुच्छेद 25)। किन्तु उस अधिकार के साथ कुछ संवैधानिक संरक्षणों का स्वतः त्याग भी जुड़ा हुआ है। यह कोई दण्ड नहीं, अपितु तार्किक परिणाम है।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय का यह निर्णय संविधान की मूल भावना का पुनःप्रतिष्ठापन है। यह उन लाखों मौन पीड़ितों की आवाज है जो आज भी गाँव की गलियों में, खेतों में,कुंओं की पाल पर, श्मशानों के बाहर, मंदिरों के बाहर, संगठनों और पदों या नियुक्तियों की बन्दर बांट में अस्पृश्यता और जाति वर्ग भेद की काली छाया में साँस ले रहे हैं। सच्चा सामाजिक न्याय वही है जो सबसे अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे, न कि जो लाभ की दौड़ में धर्म बदल कर आगे निकल जाए।
यह निर्णय हमें स्मरण कराता है कि भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी संवैधानिक संवेदनशीलता है, जहाँ करुणा और न्याय, इतिहास और वर्तमान, दोनों एक साथ धड़कते हैं।

















