उच्चतम न्यायालय को मंगलवार को बताया गया कि विभिन्न राज्यों में जो खास गहन पुनरीक्षण (SIR) किया जा रहा है, उसके लिए निर्वाचन आयोग द्वारा दिए गए कारण- जैसे ‘तेज शहरीकरण’ और ‘लगातार प्रवास’काफी मजबूत नहीं हैं। आयोग का कहना है कि किसी एक निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में बदलाव करने का अधिकार होने का मतलब यह नहीं कि वह पूरे देश की सूची में ऐसा कर सकता है।
सुनवाई के दौरान वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि आयोग इस मामले में ‘निरंकुश’ तरीके से काम कर रहा है। इस पर प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमल्या बागची की पीठ ने कड़ा संज्ञान लिया। याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील अभिषेक सिंघवी ने कहा कि अगर सभी जगह एक जैसे कारण बताए जा रहे हैं, तो उनका तार्किक आधार होना चाहिए। उन्होंने बताया कि शहरीकरण कई सालों से चल रहा है, इसलिए यह विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के लिए कोई ठोस कारण नहीं हो सकता। भूषण ने कहा कि यह प्रक्रिया ‘अभूतपूर्व’ है, क्योंकि पहली बार मतदाता सूची को पूरी तरह से नए सिरे से तैयार किया जा रहा है। यह केवल किसी विशेष संशोधन की प्रक्रिया नहीं है। उन्होंने बताया कि जमीनी कर्मचारियों पर जल्दबाजी का दबाव है, जिससे परेशानियां भी सामने आई हैं। भूषण ने यह भी कहा कि मीडिया जांच में पता चला कि SIR के बाद भी पांच लाख से ज्यादा डुप्लीकेट मतदाता सूची में मौजूद हैं।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि हमें ऐसे बड़े बयान नहीं देने चाहिए जो दलीलों में शामिल नहीं हैं। सिंघवी ने नियमों का हवाला देते हुए बताया कि आयोग को हर निर्वाचन क्षेत्र में विशेष कारण के बिना कोई बड़ा बदलाव करने का अधिकार नहीं है। उन्होंने कहा कि केवल प्रशासनिक सुविधा के लिए गहन संशोधन लागू नहीं किया जा सकता। वकील अश्विनी उपाध्याय ने पश्चिम बंगाल में ब्लॉक स्तर के अधिकारियों पर हमलों की भी बात उठाई। प्रधान न्यायाधीश ने आश्वासन दिया कि अधिकारी इस मामले पर ध्यान देंगे। सुनवाई गुरुवार, 4 दिसंबर को फिर से होगी और भूषण अपनी दलीलें पेश करेंगे।















