छत्तीसगढ़ के नवा रायपुर में पाञ्चजन्य के ‘दंतेश्वरी डायलॉग’ में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सह सरकार्यवाह रामदत्त चक्रधर ने ‘संघ संवाद’ विषय पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि हाल ही में हमने गुरुतेग बहादुर की बलिदान की 350वीं वर्षगांठ मनाया। इसके अलावा वंदेमातरम के भी 150वीं वर्षगांठ देशभर में मनाई जा रही है। यह आरएसएस का शताब्दी वर्ष भी है। इसके संस्थापक डॉ केशव बलिराम हेडगेवार ने उस दौरान देश में चलने वाले सभी स्वाधीनता संग्रामों में सक्रिय भूमिका निभाई थी। उस दौरान क्रांतिकारियों की धारा चलती थी। जिसमें खुदीरामबोस से लेकर राम प्रसाद बिस्मिल समेत अनेक क्रांतिकारियों ने अपना बलिदान दिया।
कलकत्ता में नेशनल मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई करते वक्त डॉ हेडगेवार क्रांतिकारियों से जुड़े रहे और त्रैलोक्यनाथ चक्रवर्ती की क्रांतिकारी संस्था अनुशीलन समिति के कार्यकर्ता थे। उस समय चलने वाले राजनीतिक जागृति के कार्यक्रमों में उन्होंने लोकमान्य बालगंगादर तिलक, महात्मा गांधी के साथ भी कार्य किया। सामाजिक सुधारों में शामिल रहे। इन सब में काम करते हुए मिले अनुभवों के आधार पर ही उन्होंने अग्रिम जीवन की दिशा को तय किया। भारत माता की जय-जयकार दुनिया में गूंजे ये हम सभी का सपना है। लेकिन इसके लिए करना का क्या होगा, तो ये महात्मा गांधी, बाबा साहब आंबेडकर समेत अन्य का निष्कर्ष है कि कुछ अच्छे लोग देश को महान नहीं बना सकते हैं, सभी अच्छे लोगों से ये देश महान बनेगा।
सर मानवेंद्र राय की बातों का जिक्र करते हुए चक्रधर जी ने कहा कि अगर देश को अच्छा बनाना है तो सामान्य नागरिकों के सद्गुणों का स्तर बढ़ाना होगा। डॉ हेडगेवार जी का भी यही निष्कर्ष था। लोगों के सद्गुणों के स्तर को बढ़ाने के लिए एक व्यवस्था या कार्यपद्धति खड़ी करनी पड़ेगी। अपने सभी प्रकार के आदोलनों से अनुभव लेते हुए डॉ हेडगेवार ने तीन निष्कर्ष निकाले थे।
1. देश के समाज को आत्मबोध कराना होगा (विरासतों का)
2. स्वार्थकेंद्रित हो चुके समाज को राष्ट्रकेंद्रित और समाजकेंद्रित बनाना होगा
3. असंगठित समाज को संगठित करना होगा
एक स्वयंसेवक से लाखों स्वयंसेवकों की यात्रा
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में विजयदशमी के अवसर पर नागपुर में की गई। उस दौरान इसके एक मात्र स्वयंसेवक डॉ केशव बलिराम हेडगेवार थे। लेकिन, इन 100 वर्षों की यात्रा के बाद संघ के लाखों की संख्या में स्वयंसेवक हैं। हाल ही में जब संघ की शताब्दी वर्षगांठ मनाई गई तो देशभर में 60,000 से अधिक कार्यक्रम आयोजित किए गए थे। इसमें 33,00000 स्वयंसेवक अपने गणवेश में इकट्ठे हुए थे। ये सभी अपने प्रयत्नों से पहुंचे। आज देश में संघ की 83,000 शाखाएं चल रही हैं। आज देश का कोई जिला या तहसील बचा नहीं है। आज संघ के विचारों से प्रेरित होकर ऐसे 42 अखिल भारतीय संगठन कार्य कर रहे हैं।
पूजनीय डॉ हेडगेवार ने व्यक्ति निर्माण की एक पद्धति का निर्माण किया था, उसे ही हम शाखा कहते हैं। हर दिन एक उद्देश्य के साथ एक निश्चित स्थान पर इकट्ठा होना ही शाखा संचालन है। शुरुआत में संघ के कार्यों की उपेक्षा हुई, उपहास भी उड़ाया गया, फिर इसका विरोध भी हुआ, लेकिन अब इसे स्वीकार्यता दी गई। इस तरह से ये तीन स्टेज हैं। शुरुआत में लोगों ने मजाक उड़ाया था कि हिन्दू समाज कभी संगठित नहीं हो सकता है। पूना में डॉ साहब जाते थे तो लोग कहते थे कि नागपुरी संतरा वहीं बेचो, यहां नहीं है। लेकिन, दो साल के बाद पहली बार 90 स्वयंसेवकों का एक मार्च निकला था। गुलाम भारत में स्वाभिमानी हिन्दुओं को संगठित होते देखा गया था। आज हम सब देख रहे हैं कि करोड़ों लोग एक दिशा में एक साथ चल रहे हैं। संगच्छम, संवदध्वं का मंत्र साकार हो रहा है।
संघ के विरोध की साजिश
चक्रधर जी कहते हैं कि संघ का विरोध इतना तीव्र हु्आ कि 1948 में महात्मा गांधी की हत्या का आरोप आरएसएस पर लगाया गया। जब संघ ने कहा कि सिद्ध कीजिए तो उस समय जज ने फैसला भी दिया, लेकिन फिर भी प्रतिबंध नहीं हटाया गया, तो फिर सत्याग्रह किया गया। आत्माचरण कमिटी की रिपोर्ट के आने के बाद भी उस दौरान की सरकार ने संघ पर से बैन नहीं हटाया। उस दौरान 70,000 स्वयंसेवकों ने जेल भरो आंदोलन किया। इसके बाद सरकार को झुकना पड़ा और प्रतिबंध हटा दिया गया।
1975 में इंदिरा गांधी, जिनके चुनाव को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने खारिज किया था, लेकिन फिर भी प्रतिबंध संघ पर लगाया गया। उस दौरान स्वर्गीय जयप्रकाश नाराय़ण के नेतृत्व में 67,000 स्वयंसेवक जेलों में चले गे और 18 माह तक जेलों में रहे। संघ को समाप्त करने की भरसक कोशिशें हुई, लेकिन संघ को समाप्त नहीं किया जा सका। इसी साल केवल अक्तूबर माह में 48,000 लोगों ने संघ में शामिल होने के लिए आवेदन किया। इससे समझा जा सकता है कि संघ आज विरोध के बाद स्वीकार्य की स्थिति में पहुंच चुका है। आज आत्मविस्मृत समाज आत्मबोध की ओर है। एक बार मुलायम सिंह यादव ने कहा था कि हां मुझे भी हिन्दुत्व चाहिए, लेकिन स्वामी विवेकानंद वाला।

















