पाञ्चजन्य दंतेश्वरी डायलॉग: साहित्यकार राजीव रंजन बोले-कम उम्र के बच्चों को टार्गेट कर रहे नक्सली
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पाञ्चजन्य दंतेश्वरी डायलॉग: साहित्यकार राजीव रंजन बोले-कम उम्र के बच्चों को टार्गेट कर रहे नक्सली

12 साल की उम्र में बंदूक, जबरन गर्भपात, भूख और बीमारी – बस्तर में नक्सलवाद का असली चेहरा पूर्व नक्सलियों ने दंतेश्वरी संवाद में बताई सच्चाई।

Written byकुलदीप सिंहकुलदीप सिंह
Dec 2, 2025, 03:33 pm IST
inछत्तीसगढ़
Panchjanya Danteshwari Dailouge Rajeev Ranjan Prasad

दंतेश्वरी संवाद में बोलते राजीव रंजन प्रसाद

दिल्ली से बस्तर दिखता है, मैंने बोया नीबू, लेकिन उसे कद्दू बता कर छापा गया।
घर में मूसा घुसा था देख ले उसे हाथी बताकर के नापा गया।
जब से कोदौ के खेत में बंदूक हैं, सांस लेना भी अपनी खबर बन गई।
हम डकारें तो मुंह में घुसे कैमरा, अपनी-अपनी उत्सुकता है। दिल्ली से बस्तर दिखता है…
कैसी मड़ई कैसी कुकड़ा लड़ई, चल रे संगी अंधेरा घना छा रहा।
गांव का रास्ता खस्ता-खस्ता, उससे नहीं डर है मुझको मगर राह में भेड़िए भिड़ जो कहीं।
आखिरी रात फिर ये हमारी न हो। फिर तो ऐसी बनेगी खबर देखना, जिससे अखबार दुनिया में बिकता है। दिल्ली से बस्तर दिखता है…।।

छत्तीसगढ़ के नवा रायपुर में पाञ्चजन्य के ‘दंतेश्वरी डायलॉग’ में नक्सलवाद के मुद्दे पर प्रख्यात लेखक राजीव रंजन प्रसाद ने पूर्व नक्सलियों से बातचीत की। उन्होंने कहा कि दिल्ली से बस्तर को देखने की जो दृष्टि है, उसमें बस्तर की हकीकत कहीं छुप सी गई है। बस्तर को हमने दिल्ली के उन लोगों की ही दृष्टि से देखा, जिन्होंने हमें हमेशा केवल नक्सलियों का ही पक्ष दिखाया। लेकिन, क्या नक्सलियों का पक्ष ही वास्तवमें बस्तर का पक्ष था। इस मौके पर उन्होंने पूर्व नक्सलियों से भी बातचीत की।

उन्होंने पूर्व नक्सली रही संगीता, प्रदीप कुंजान और नक्सल पीड़ित गौतम राम विश्वकर्मा और राधा सलाम से बातचीत की। राजीव रंजन कहते हैं कि जो लोग नक्सली बने वे इसे जल, जगल और जमीन की लड़ाई बताते हैं, लेकिन शायद लोग ये भूल जाते हैं कि जो नक्सली बस्तर में आंध्र और तेलंगाना के रास्ते घुसे उनका अपना एक एजेंडा था। इन्हें पता था कि बस्तर के जंगल घने हैं और अगर वे यहां आ गए तो ये जंगल उन्हें एक ढाल देता है। अबूझमाड़ जैसा क्षेत्र ऐसे लोगों के लिए एक आधारशिला जैसा था। इस मौके पर उन्होंने आत्मसमर्पण कर चुके माओवादी अर्जुन से बातचीत का किस्सा बताया कि जब उसकी पत्नी गर्भवती हो गई थी तो दोनों को माओवादियों ने अलग कर दिया। इसके बाद जबरन उसका गर्भपात करा दिया। इसके कारण महिला की हालत अब बहुत ही खराब है। जब महिला मृत्यु के करीब थी, तब जाकर उसे उसके पति से मिलने दिया गया। पेश हैं पूर्व नक्सली से बातचीत..

संगीता

पूर्व नक्सली संगीता 2017 में 12-13 साल की उम्र में नक्सली बनी थी। संगीता ने बताया कि शुरुआत में उसे ये सब बिल्कुल पसंद नहीं था, लेकिन धीरे-धीरे उसमें ढल गई। वह बताती हैं कि वह अपनमी मर्जी से नक्सली नहीं बनी थीं, लेकिन उनके ही गांव का एक नक्सली कमांडर था और वो ही उसे लेकर गया था। संगीता ने बताया कि उसकी बहन नक्सली थी, लेकिन उसने शादी कर लिया था, जिस कारण से उसे जबरन नक्सली बना दिया गया। अगर मैं नक्सली नहीं बनती तो मेरे मां-बाप की हत्या कर देते।

संगीता की जिम्मेदारी नक्सलियों के लिए खाना की व्यवस्था करना होता था। वहीं नक्सली विचारधारा को छोड़ने को लेकर संगीता कहती है कि वहां किसी प्रकार की कोई सुविधा नहीं होती। संगीता ने बताया कि वो अपने माता-पिता से नहीं मिल पा रही है।

प्रदीप कुंजाम

प्रदीप कुंजाम, जो कि पूर्व नक्सली हैं, वे 2008 में माओवाद से जुड़े और 2020 में इन्होंने नक्सलवाद छोड़ दिया। प्रदीप बताते हैं कि वो कक्षा 9वीं के छात्र थे। उनके गांव में नक्सलियों का वर्चस्व था और सभी को संगठन में जुड़ना अनिवार्य था। वो बताते हैं कि वो संगठन में रहते हुए कई बार बीमार भी हुए, उस दौरान अगर दवाइयां होती थी, तो इलाज होता था, अन्यथा छोड़ दिया जाता था। नक्सलवाद छोड़ने की बात को लेकर प्रदीप ने बताया कि उन्हें अच्छे से खाना-पीना नहीं मिलता था। इसके अलावा भी कई तरह की अव्यवस्था थी। रही बात पैसों की तो ये एरिया कमांडर को मिलता था।

बात नक्सल पीड़ितों की भी

राजीव रंजन ऐसे ही एक पूर्व नक्सली की बात करते हुए बताते हैं कि कैसे एक नक्सली रहे व्यक्ति ने जब मुख्यधारा में लौटने की कोशिश की तो उसे प्रताड़ित किया गया। तीन दिन तक पेड़ से उल्टा लटकाकर मारा गया। हकीकत ये है कि बस्तर में नक्सलवाद से जुड़े हुए लोग भी पीड़ित हैं। आंध्र और तेलंगाना के माओवादियों ने यहां के युवाओं का उपनिवेश के तौर पर इस्तेमाल किया। नक्सलियों के द्वारा प्रताड़ित ऐसी ही एक कहानी….

गौतम राम विश्वकर्मा

गौतम राम विश्वकर्मा अपनी दुखद नक्सली कहानी बताते हुए कहते हैं कि 2009 में नक्सलियों ने घर से उनका अपहरण करके गोली मारकर फेंक दिया था। वे अपने घर वालों को घायल अवस्था में पड़े मिले थे। इलाज के बाद बड़ी मुश्किल से मैं बचा। सरकार की नई पुनर्वास नीति की तारीफ करते हुए गौतम ने कहा कि अब जिन नक्सलियों ने सरेंडर किया है, वो अच्छी स्थिति में है। गौतम बताते हैं कि जब 2009 में नक्सलियों ने उन्हें गोली मारी थी, तो उस दौरान उनका एक माह का बच्चा था। आज भी वह अपने गांव अपने बच्चों से मिलने नहीं जा पा रहे हैं और बाहर रह रहे हैं।

राधा सलाम

वहीं एक अन्य नक्सल पीड़िता राधा सलाम (नारंगपुर जिला) ने बताया कि उनके माता-पिता नक्सलियों की प्रताड़ना से पीड़ित थे। इसके कारण उनका पूरा परिवार बिखर गया। वह बताती हैं कि ये घटना 1999 के बीच है, जब नक्सलियों की मुठभेड़ हुई थी। नक्सलियों की योजना रात के वक्त एक पुल को उड़ाने की थी। उसमें राधा के पिता को नक्सलियों ने खाना बनाने की जिम्मेदारी थी। जिस वक्त उनके पिता को खाना बनाने के लिए जबरन बुलाया गया तो उसी दौरान पुलिस ने नक्सलियों पर हमला किया और नक्सलियों को लगा कि ये जानकारी मेरे पिता ने पुलिस को दी थी। इसके बाद से नक्सलियों ने मेरे पूरे परिवार को 6 माह तक प्रताड़ित किया। अगर मेरे पिता उन्हें मिल जाते थे वे उन्हें मार देते।

राजीव रंजन कहते हैं कि बस्तर घावों से भरा हुआ है। लेकिन, उन घावों पर सरकार ने जो मरहम लगाने का कार्य किया है, वो बहुत ही प्रभावशाली है। उन्होंने राज्य के गृहमंत्री विजय शर्मा के प्रयासों की सराहना की।

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कुलदीप सिंह
कुलदीप सिंह
नागपुर स्थित राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज विद्यापीठ (नागपुर यूनिवर्सिटी) से मॉस कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएट। बीते एक दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हूं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर विशेष रुचि। पत्रकारिता की इस यात्रा की शुरुआत नागपुर नवभारत में इंटर्नशिप से शुरू होती है, तदोपरांत GTPL न्यूज चैनल, लोकमत समाचार, ग्रामसभा मेल, मोबाइल न्यूज 24 और Way2News हैदराबाद के बाद अब पाञ्चजन्य के साथ सफर जारी है। [Read more]
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