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सिद्ध हुआ संकल्प

श्रीराम मंदिर के शिखर पर लगी धर्म-ध्वजा संदेश दे रही है कि सनातनियों का सदियों से रहा संकल्प पूरा हुआ है। उन योद्धाओं की साध भी पूरी हुई, जिन्होंने राम मंदिर के निर्माण को ही अपना ध्येय बना लिया था

Written byहरि मंगलहरि मंगल
Dec 1, 2025, 01:35 pm IST
in भारत, विश्लेषण, धर्म-संस्कृति
श्रीराम मंदिर के शिखर पर लगी धर्म-ध्वजा

श्रीराम मंदिर के शिखर पर लगी धर्म-ध्वजा

सनातन धर्म के इतिहास में 25 नवंबर, 2025 को एक और स्वर्णिम अध्याय जुड़ गया। इस दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अयोध्या स्थित श्रीराम जन्मभूमि पर निर्मित राम मंदिर के शिखर पर केसरिया धर्म ध्वजा फहरा कर पूरी दुनिया को संदेश दिया कि मंदिर निर्माण का कार्य औपचारिक रूप से पूर्ण हुआ। 191 फीट की ऊंचाई पर धर्म ध्वजा के आरोहण की प्रक्रिया में प्रधानमंत्री का साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत ने दिया। इस अवसर पर श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास जी, उत्तर प्रदेश की राज्यपाल श्रीमती आनंदीबेन पटेल, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ आदि उपस्थित थे। शिखर पर ध्वज के लहराते ही वहां उपस्थित धर्माचार्यों, साधु-संतों और अन्य रामभक्तों ने ‘जय श्रीराम’, ‘हर हर महादेव’ जैसे गगनभेदी नारे लगाकर मानो उद्घोष किया कि लगभग 500 वर्ष का संघर्ष

पूर्ण हुआ। ध्वजारोहण समारोह में स्वतः स्फूर्त नई ऊर्जा, भक्ति, उल्लास और सामाजिक समरस्ता दिखाई पड़ी। सुबह से ही लोग ‘जय सिया राम’ से अभिवादन और एक-दूसरे को बधाई देते दिखे। सरयू नदी के तट पर पंहुचे अधिकांश श्रद्धालुओं की चर्चा का एक ही विषय था-’राम मंदिर कितनी जल्दी बन गया।’ कोई इसे श्रीराम की कृपा बता रहा था, तो कोई मोदी-योगी को श्रेय दे रहा था। गोरखपुर से आए रतन कुमार राय कहते हैं, “मेरा सौभाग्य है कि इस दिन को देखने के लिए अयोध्या आ पाया। हर सनातनी के लिए यह गौरव का दिन है।”

सप्तमंदिर :

 

सप्तमंदिर

यह राम मंदिर परिसर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो भगवान राम के जीवन से जुड़े सात प्रमुख मनीषियों, महर्षि वशिष्ठ, महर्षि विश्वामित्र, महर्षि अगस्त्य, महर्षि वाल्मीकि, देवी अहिल्या, निषादराज और माता शबरी को समर्पित है। ये सभी प्रभु श्रीराम के गुरु, भक्त और मित्र माने जाते हैं, जिन्होंने उनके जीवन में महत्वपूर्ण योगदान दिया था। महर्षि विश्वामित्र ने राम-लक्ष्मण को युद्ध कला और दिव्य अस्त्र की शिक्षा दी, जबकि अगस्त्य मुनि ने वनवास के समय राम जी को दिव्य अस्त्र दिए, जो लंका विजय में सहायक बने। कुलगुरु महर्षि वशिष्ठ से राम जी को ज्ञान और जीवन के विभिन्न आयामों पर मार्गदर्शन मिला। देवी अहिल्या का श्राप से मुक्त होना राम कृपा से जुड़ी एक महत्वपूर्ण घटना है। माता शबरी की निश्छल भक्ति और प्रेम राम पर विशेष प्रभाव डालती है, जो उनके जीवन में एक आदर्श भक्ति की मिसाल है। महर्षि वाल्मीकि ने रामायण की रचना की। उनके आश्रम में लव और कुश का जन्म हुआ था। निषादराज और अन्य पात्र भी राम के जीवन की महत्वपूर्ण कड़ियां हैं, जिनका स्मरण इस सप्त मंदिर में होता है।

सामाजिक समरसता

समारोह में गजब की सामाजिक समरसता दिखी। कार्यक्रम के लिए लगभग 7,000 अतिथियों को आमंत्रित किया गया था। अधिकतर अतिथि आम लोग थे। ये लोग पूर्वी उत्तर प्रदेश के सोनभद्र, मिर्जापुर, चंदौली जैसे जनपदों से आए थे। बड़ी संख्या में साधु-संतों, जनजातियों और निषाद समाज के लोगों को बुलाया गया और उचित सम्मान देकर उन्हें यह अहसास कराने का प्रयास किया गया कि राम की नगरी में फहराया गया राम राज्य का प्रतीक केसरिया ध्वज एक नए भारत के अभ्युदय की कथा लिखेगा।

सपना साकार

सकल विश्व में धारणा है कि अयोध्या का राम मंदिर केवल एक मंदिर नहीं है, यह भारतीय गौरव, अस्मिता और सनातन समाज के अस्तित्व से जुड़ा है। विश्व ने देखा कि कैसे हिंदू समाज अपने आराध्य के लिए मुगलों, अंग्रेजों और स्वतंत्र भारत में कुछ कट्टरवादियों से कानूनी और वैचारिक लड़ाई लड़ता रहा। हिंसा का भी दौर आया, लोगों ने अपनी जान तक न्योछावर कर दी, लेकिन हार नहीं मानी और आखिर में आस्था की विजय हुई। अब विश्व में यह स्थापित हो गया कि धर्म ध्वजा का फहराया जाना मंदिर की पूर्णता ही नहीं, सदियों से देखे गए सपनों के साकार होने के साथ ही धर्म और मर्यादा के मूल्यों की पुनर्स्थापना का प्रतीक है।

पूर्ण हुई प्रतीक्षा

कार्यक्रम में बड़ी संख्या में आए संतों के उत्साह की सीमा नहीं थी। हर कोई अयोध्या, श्रीराम मंदिर और धर्म ध्वजारोहण कार्यक्रम को अपने ढंग से प्रकट कर रहा था। राम मंदिर आंदोलन से जुड़ी रहीं साध्वी उमा भारती ने कहा, “अतीत में इसी अयोध्या में जब केसरिया फहराया गया था, तो अयोध्या के युवकों को गोलियों से भून दिया गया था। अब अयोध्या की गलियों में गोली नहीं फूल बरसते हैं।” राम मंदिर आंदोलन से जुड़े रहे एक अन्य संत राम विलास वेदांती कहते हैं, “कार्यक्रम में उपस्थित समाज के आम लोगों और संतों के चेहरे पर जो संतोष का भाव दिखा, जो प्रतिक्रिया आई, वह सिद्ध करती है कि सब लोग इस पुनीत कार्य से संतुष्ट हैं। यह भारत के हिंदू राष्ट्र बनने की ओर बढ़ने का एक और कदम है।” अखिल भारतीय संत समिति के महामंत्री आचार्य जितेन्द्रानंद सरस्वती कहते हैं, “यह कोई सामान्य कार्यक्रम नहीं था, यह पांच शताब्दी तक चले संघर्ष, तपस्या और प्रतीक्षा के पूर्ण होने का क्षण था।”

विकास को लगे पंख

अयोध्या का विकास चरम पर है। राम मंदिर के उद्घाटन के बाद से अयोध्या के मंदिरों का जीर्णोद्धार, मंदिर के आसपास बनी सड़कें रामपथ, भक्तिपथ इसके धर्म नगरी होने का आभास कराती हैं। अयोध्या की सोलर सिटी आज 600 मेगावाट विद्युत आपूर्ति कर रही है। अयोध्या में आगंतुकों के लिए बड़ी संख्या में होटल, फाइव स्टार होटल बन रहे हैं, उच्चकोटि के भोजनालय तैयार हैं। रामलला की मूर्ति की स्थापना के बाद से अयोध्या में 40 करोड़ श्रद्धालु आ चुके हैं। आज लखनऊ और वाराणसी के बाद अयोध्या ही ऐसा शहर है, जहां से सबसे अधिक उड़ानें उड़ रही हैंं। अयोध्या से जुड़ने वाली अधिकांश सड़कें छह अथवा चार लेन की हो गई हैं। अयोध्या में रहने वाले 50 वर्षीय मनीष द्विवेदी राम मंदिर के बनने से बेहद खुश हैं। वे कहते हैं, “मैं अपने बचपन से अयोध्या को देख रहा हूं। पहले शाम होते ही चारों ओर अंधेरा पसर जाता था। लोग अपने घरों में कैद हो जाते थे। मानो हम लोग एक बर्बर युग में जी रहे थे। आज अयोध्या जीवंत है, राममय है। शहर या आसपास, कहीं भी जाइए, विकास की बयार दिख जाएगी। दिन और रात का फर्क गायब हो गया है।” बाबरी ढांचे के विध्वंस के साक्षी रहे बद्री तिवारी ध्वजारोहण समारोह के भी साक्षी बने। वे कहते हैं, “प्रधानमंत्री को ध्वजारोहण करते देखना मेरे जीवन के ऐतिहासिक पलों में से एक है। यही कारण है कि कार्यक्रम की रात में अयोध्या के लोगों ने दीपावली मनाई।” विकास के मुद्दे पर मंदिर परिसर के समीप छोटी सी दुकान चलाने वाले शोएब खान कहते हैं, “अयोध्या बढ़ रही है। इससे सबका भला हो रहा है।”

अभिजीत मुहूर्त

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 5 अगस्त, 2020 को श्रीराम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर निर्माण का शिलान्यास किया था। मंदिर निर्माण के बीच ही गर्भगृह में 22 जनवरी, 2024 को रामलला की मूर्ति स्थापित की गई थी। अब लगभग 5 वर्ष में अपेक्षाओं से कहीं अधिक भव्य-दिव्य श्रीराम मंदिर बनकर तैयार हो गया है। पूर्णता के प्रतीक धर्म ध्वज के आरोहण हेतु 25 नवंबर की तिथि का निर्धारण ज्योतिष गणना के अनुरूप किया गया, क्योंकि इस दिन मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि थी, जो भारत में विवाह पंचमी के रूप में जानी जाती है। मान्यता है कि त्रेतायुग में इसी दिन प्रभु श्रीराम और माता सीता का विवाह संपन्न हुआ था। ज्योतिषाचार्यों ने ध्वज स्थापना के लिए 11.45 से 12.29 के मध्य का मुहूर्त निकाला था, क्योंकि इस अवधि में अभिजीत मुहूर्त था। शास्त्रों के अनुसार, भगवान श्रीराम का जन्म दोपहर में अभिजीत मुहूर्त में ही हुआ था। यद्यपि धर्म ध्वजा आरोहण के लिए 25 नवंबर की तिथि जब नियत हुई तो उन तमाम राम विरोधियों को आश्चर्य और निराशा हुई, जो इस प्रकार के सनातनी आयोजनों को चुनावी राजनीति से अब तक जोड़ते आए हैं।

अयोध्या खुश, हम भी खुश

अयोध्या के लिए एक दौर ऐसा भी था कि जब भी हिंदू समाज मंदिर निर्माण की बात करता था, तो राम विरोधी राजनीतिक दलों से जुड़े लोग मुसलमानों को खून-खराबे का भय दिखाते थे। अवसर मिलने पर ये लोग दंगा भी करा देते थे। लेकिन आज बदले परिवेश में विरोध की बात करने वाला कोई समझदार मुसलमान नहीं मिलता है। ध्वजारोहण कार्यक्रम में अयोध्या सहित अनेक स्थानों से कई मुसलमानों को आमंत्रित किया गया था। ये लोग बहुत खुश थे और उन्होंने वहां प्रसाद भी ग्रहण किया।

बाबरी ढांचा-राम जन्मभूमि मामले के पक्षकार रह चुके हामिद अंसारी के पुत्र इकबाल अंसारी प्रफुल्लित होकर करते हैं, “आज भारत के लिए गौरव का दिन है। पूरे देश-दुनिया के लोग यहां आए। अयोध्या खुश है, हम सभी खुश हैं।” मंदिर के द्वार के समीप आरा मशीन चलाने वाले नूर आलम को भी आमंत्रित किया गया था। वे कहते हैं, “ऐसे बड़े अवसर पर हमें बुलाया गया। मेरे पास उस खुशी को व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं हैं। कार्यक्रम में भागीदार बना, प्रसाद लिया, स्वयं खाया और बच्चों को खिलाया।”

श्रीराम मंदिर के शिखर पर धर्म-ध्वज के फहरने के साथ ही अशोक सिंहल जी, महंत परमहंस रामचंद्र जी दास, महंत अवेद्यनाथ जैसे तपस्वियों के साथ ही उन अनगनित रामभक्त योद्धाओं की आत्मा तृप्त हुई, जिन्होंने राम-काज के लिए अपनी आहुति दे दी है।

हनुमानगढ़ी :

यह हनुमान जी का प्राचीन और प्रमुख मंदिर है। अयोध्या के मध्य में राजद्वार के सामने ऊंचे टीले पर स्थित इस मंदिर के बारे में मान्यता है कि राम जी की लंका विजय के बाद हनुमान जी यहां रहते थे और अयोध्या की रक्षा करते थे। इसलिए इसे हनुमानगढ़ी या हनुमान कोट भी कहा जाता है। मंदिर में हनुमान जी की माता अंजनी की गोद में बैठे बाल रूप की मूर्ति स्थापित है। हनुमानगढ़ी की स्थापना लगभग 300 साल पहले स्वामी अभयारामदासजी के निर्देशों पर हुई थी। मंदिर के विशाल परिसर के चारों ओर साधु-संतों के आवास हैं। हनुमानगढ़ी को अयोध्या के सबसे पवित्र और शक्तिशाली मंदिरों में गिना जाता है। यहां हनुमान जी को राजा के रूप में पूजा जाता है। उनकी आज्ञा के बिना रामलला के दर्शन अधूरे माने जाते हैं। मंदिर के आसपास सुग्रीव टीला और अंगद टीला जैसी जगहें भी हैं, जो रामायण कथा से जुड़ी हैं। यहां दूर-दूर से भक्त दर्शन के लिए आते हैं और मंदिर में नियमित हवन, पूजन और भजन का आयोजन होता है। यह मंदिर अयोध्या के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व को बढ़ाता है और राम भक्तों के लिए अनिवार्य तीर्थ स्थल है।

तुलसीदास मंदिर :

तुलसीदास मंदिर

राम मंदिर परिसर में बना यह मंदिर गोस्वामी तुलसीदास को समर्पित है, जिन्होंने ‘रामचरितमानस’ की रचना की। संत तुलसीदास ने अवधी भाषा में ‘रामचरितमानस’ की रचना कर भगवान राम की कथा को संस्कृत तक सीमित न रखकर आम जनमानस के लिए सुलभ बनाया। तुलसीदास भक्ति आंदोलन के एक महान संत थे, जिन्होंने भगवान राम की साकार भक्ति को जन-जन तक पहुंचाया। उनका मंदिर उनकी इस आध्यात्मिक विरासत का प्रतीक है। राम मंदिर परिसर में उनका मंदिर स्थापित करना यह दर्शाता है कि तुलसीदास केवल एक कवि नहीं थे, बल्कि वे भारतीय संस्कृति और राम भक्ति के आधार स्तंभों में से एक हैं। उनका काम आज भी लाखों लोगों को प्रेरित करता है। यह मंदिर उनकी अतुलनीय साहित्यिक और भक्तिपूर्ण धरोहर का सम्मान और महान संत को श्रद्धांजलि है, जिन्होंने अपना पूरा जीवन भगवान राम की सेवा और उनकी शिक्षाओं के प्रसार में समर्पित कर दिया। उनकी प्रतिमा राजस्थान के मकराना संगमरमर से बनी है और महाराष्ट्र के प्रसिद्ध कलाकार वासुदेव कामथ द्वारा तराशी गई है।

 

शेषावतार मंदिर:

शेषावतार मंदिर

यह सरयू तट के पास सहस्त्रधारा क्षेत्र में स्थित है। यह मंदिर भगवान राम के छोटे भाई लक्ष्मण के शेषनाग अवतार को समर्पित है। लक्ष्मण जी ने वनवास काल में 14 वर्ष तक रामजी की सेवा की थी। कहा जाता है कि इसी स्थान पर लक्ष्मण ने अपना वास्तविक शेषनाग स्वरूप भी दिखाया था। मंदिर की स्थापना और निर्माण राम जन्मभूमि परिसर में राम मंदिर के समानांतर किया जा रहा है, जहां शेषावतार मंदिर की ऊंचाई भी राम मंदिर के बराबर रखी जाएगी। यह मंदिर रामदरबार के पूरक मंदिरों में से एक माना जाता है, जहां लक्ष्मण की पूजा साक्षात् शेषनाग के रूप में होती है। यहां सुबह-शाम आरती भी होती है।

 

कनक भवन:

कनक भवन

यह अयोध्या के सबसे पवित्र और प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है, जो भगवान राम और माता सीता को समर्पित है। मान्यता है कि महारानी कैकेयी के आग्रह पर दशरथ ने इसे देवशिल्पी विश्वकर्मा से बनवाया था। कैकेयी ने देवी सीता को विवाह के उपरांत इसे ‘मुंह दिखाई’ में भेंट किया था। यह भगवान राम और माता सीता का निजी महल था, जहां उन्होंने अपने नवविवाहित जीवन का काफी समय व्यतीत किया। भवन के अंदर भगवान राम और माता सीता की तीन स्वर्ण मंडित मूर्तियां स्थापित हैं, जिन्हें कनक बिहारी और कनक स्वामिनी नाम से जाना जाता है। कहते हैं कि द्वापर युग में भगवान कृष्ण अयोध्या आए थे और कनक भवन को देखा था। समय के साथ कई राजाओं और शासकों ने इसका जीर्णोद्धार और पुनर्निर्माण कराया। वर्तमान संरचना का निर्माण ओरछा की रानी (टीकमगढ़ की महारानी) वृषभानु कुंवरि ने 1891 में कराया था, जिसमें पुराने अवशेषों को संरक्षित किया गया था। मान्यता है कि यहां पूजा करने से दांपत्य जीवन में सुख और शांति आती है। विभिन्न त्योहारों, विशेषकर रामनवमी और विवाह पंचमी पर यहां भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है।

 

गिलहरी की प्रतिमा :

गिलहरी की प्रतिमा

राम जन्मभूमि मंदिर परिसर के अंदर अंगद टीले पर गिलहरी की एक भव्य प्रतिमा स्थापित की गई है। यह मंदिर निर्माण में हर छोटे-बड़े योगदान की भावना को दर्शाती है। गिलहरी की प्रतिमा ऐसी जगह है, जहां से वह मंदिर की ओर निहारती हुई दिखाई देती है। यह समर्पण, निष्ठा और भक्ति का संदेश देती है कि कभी भी छोटे प्रयास व्यर्थ नहीं जाते। जब भगवान राम लंका जाने के लिए समुद्र पर पुल (रामसेतु) का निर्माण कर रहे थे, तब एक छोटी गिलहरी ने भी अपनी श्रद्धा और भक्ति दिखाते हुए रेत के कणों को लाकर पुल बनाने में योगदान दिया था। यह प्रतिमा यह संदेश देती है कि किसी भी बड़े कार्य में, चाहे योगदान कितना भी छोटा क्यों न हो, वह अमूल्य होता है, खासकर जब वह पूर्ण श्रद्धा और समर्पण के साथ किया जाए। राम के काम में हर छोटा या बड़ा योगदान योगदान महत्वपूर्ण होता है। इस प्रतिमा की स्थापना उसी सम्मान की प्रतीक है।

जटायु की प्रतिमा: 

जटायु की प्रतिमा:

राम मंदिर परिसर में जटायु की प्रतिमा भी है। जटायु रामायण के एक महत्वपूर्ण पात्र हैं। जब रावण माता सीता का हरण कर ले जा रहा था, तब जटायु ने रावण को रोकने की पूरी कोशिश की। इस प्रयास में रावण ने उसके पंख काट दिए थे। भगवान राम जब सीता की खोज में निकले, तो मरणासन्न जटायु ने उन्हें रावण का पता बताया और फिर उनके सामने ही अपने प्राण त्यागे। राम ने जटायु को पिता समान मानकर उसका अंतिम संस्कार किया था। जटायु की प्रतिमा भगवान राम के प्रति उनकी निष्ठा, साहस और धर्म के लिए बलिदान की प्रतीक है। यह नारी सम्मान की रक्षा और अधर्म के विरुद्ध संघर्ष का भी प्रतिनिधित्व करती है। जटायु की प्रतिमा केवल एक कलाकृति नहीं, बल्कि साहस, कर्तव्यपरायणता और धर्म-रक्षा के मूल्यों की एक सशक्त प्रतीक है।

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हरि मंगल
हरि मंगल
वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार। संस्कृति के जानकार। विभिन्न समाचार पत्रों में लेख प्रकाशित। [Read more]
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