ICU में कनाडा की स्वास्थ्य व्यवस्था: 9 साल तक सर्जरी का इंतज़ार करते-करते मर रहे मरीज, सुपरपावर का ढोंग बेनकाब
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ICU में कनाडा की स्वास्थ्य व्यवस्था: 9 साल तक सर्जरी का इंतज़ार करते-करते मर रहे मरीज, सुपरपावर का ढोंग बेनकाब

कनाडा की स्वास्थ्य प्रणाली में प्रतीक्षा-सूचियों के कारण 23,746 मौतें हुईं (2024-25), जबकि भारत की आयुष्मान भारत योजना ने करोड़ों को मुफ्त इलाज देकर क्रांति ला दी। विकसित बनाम विकासशील: कौन सा मॉडल जीत रहा है?

Written byप्रमोद कौशलप्रमोद कौशल — edited by कुलदीप सिंह
Nov 30, 2025, 10:07 am IST
inविश्लेषण, स्वास्थ्य
Camada Healthcare System

प्रतीकात्मक तस्वीर

कनाडा की स्वास्थ्य व्यवस्था: दुनिया में दो तरह के देश होते हैं—एक वे जो अपनी समस्याएँ स्वीकार करके समाधान ढूंढते हैं, और दूसरे वे जो अपनी चमकदार छवि की धूल पोछने में पूरी ज़िंदगी निकाल देते हैं। कनाडा, दुर्भाग्य से, दूसरी श्रेणी में आ चुका है। वह देश जो खुद को “सबसे उन्नत स्वास्थ्य प्रणाली” का ध्वजवाहक बताता है, उसकी ज़मीन पर 23,746 नागरिक एक ही साल में सिर्फ इसलिए मर गए क्योंकि उन्हें इलाज नहीं मिला, समय मिला। अस्पताल नहीं मिला, एक अंतहीन प्रतीक्षा सूची मिली। डॉक्टर नहीं मिला, मौत मिली। जिस देश की सरकारें स्वास्थ्य को लेकर अपने आप को आदर्श मानती हैं, उसी देश में पिछले एक वर्ष के भीतर 23,746 मरीज सिर्फ इसलिए मर गए क्योंकि उन्हें इलाज नहीं मिला—सिर्फ इंतज़ार मिला। यह आंकड़ा किसी तृतीय विश्व देश का नहीं, बल्कि उसी कनाडा का है जो वैश्विक मंचों पर स्वास्थ्य और मानवीयता के सबसे ऊंचे दावेदारों की सूची में खड़ा होता है।

यह आंकड़े किसी गरीब, युद्धग्रस्त या संसाधनों से जूझ रहे देश के नहीं, बल्कि उसी कनाडा के हैं जिसे पश्चिमी पंचों ने ‘क्लीन एंड परफेक्ट हेल्थकेयर सिस्टम’ का प्रतीक बना रखा था। लेकिन वास्तविकता अब काग़ज़ों से फूटकर सामने आ चुकी है—कनाडा की हेल्थकेयर दरअसल एक धीमी गति से मौत देने वाली व्यवस्था में बदल चुकी है, और उसके नागरिक उसका ईंधन बन चुके हैं।

इलाज का इंतजार करते मरे हजारों लोग

सार्वजनिक नीति थिंक-टैंक SecondStreet.org की विस्तृत और विस्फोटक रिपोर्ट में बताया गया है कि अप्रैल 2024 से मार्च 2025 तक कनाडा में हजारों लोग सर्जरी, डायग्नोस्टिक टेस्ट और बुनियादी चिकित्सा जांच के इंतजार में ही मर गए। रिपोर्ट बताती है कि यह संख्या पिछले वर्ष से तीन प्रतिशत अधिक है।

FOI (सूचना की स्वतंत्रता) से खंगालकर निकाले गए आंकड़े बताते हैं कि 2018 से अब तक एक लाख से अधिक कनाडाई नागरिक स्वास्थ्य सेवाओं की प्रतीक्षा-सूची में दम तोड़ चुके हैं। यह आंकड़ा सिर्फ संख्या नहीं, बल्कि उस स्वास्थ्य ढांचे की शवगणना है जो अपने नागरिकों की जिंदगी बचाने के बजाय धीमी और घातक नौकरशाही का बोझ बन चुका है इससे बड़ा शर्मसार करने वाला तथ्य और क्या हो सकता है कि आधुनिक मशीनों, मॉडर्न अस्पतालों और अरबों डॉलर के हेल्थकेयर बजट के बावजूद लोग अपनी बारी आने से पहले ही दुनिया छोड़ देते हैं? जिस कनाडा को दुनिया “ह्यूमन डेवलपमेंट” का आदर्श कहती है, उसके स्वास्थ्य विभाग इस रिपोर्ट में इस कदर नंगे होकर सामने आए हैं कि पूरा ढांचा खोखला दिखने लगता है। रिपोर्ट बताती है कि 40 से अधिक प्रांतीय और क्षेत्रीय स्वास्थ्य निकायों से सूचना की स्वतंत्रता (FOI) के तहत मांगी गई जानकारी ने यह सारा सच उजागर किया है। कई प्रांतों ने तो आंकड़े देने से ही इंकार कर दिया, जबकि अल्बर्टा और मैनिटोबा के हिस्से ने कोई डेटा ही नहीं दिया। इसका सीधा मतलब है कि असली मौतें रिपोर्ट में दर्ज मौतों से कहीं ज्यादा हैं।

इसे भी पढ़ें: नेशनल हेराल्ड केस: 2000 करोड़ के घोटाले में सोनिया-राहुल गांधी के लिए नई मुसीबत, दिल्ली पुलिस ने दर्ज की नई FIR 

स्वास्थ्य पर प्रति वर्ष 244 अरब डॉलर खर्च करता है कनाडा

यह वही कनाडा है जहां स्वास्थ्य पर प्रति वर्ष 244 अरब डॉलर खर्च होता है। वहीं प्रति व्यक्ति स्वास्थ्य खर्च 1990 के दशक के मध्य की तुलना में तीन गुना बढ़कर 5,943 डॉलर तक पहुंच चुका है। लेकिन इतनी भारी-भरकम राशि खर्च करने वाला यह विकसित राष्ट्र अपने नागरिकों को न समय पर डॉक्टर दे पा रहा, न अस्पताल, न एमआरआई, न सर्जरी। जो देश मानवाधिकारों और गुणवत्ता जीवन का पाठ पढ़ाता है, उसकी हालत यह है कि नागरिक सर्जरी का इंतजार करते-करते मर जाते हैं। रिपोर्ट स्पष्ट कहती है कि कनाडा में डॉक्टरों की संख्या कम है, बिस्तर कम हैं, एमआरआई मशीनें कम हैं, और मरीजों का इंतजार — दुनिया की सबसे लंबी कतारों में से एक।

इस भयावहता की सबसे दर्दनाक मिसाल मैनिटोबा की तीन बच्चों की माँ डेबी फ्यूस्टर हैं। जुलाई 2024 में उन्हें बताया गया कि दिल की सर्जरी तीन सप्ताह के भीतर करनी जरूरी है। लेकिन उनकी सर्जरी का नंबर आया ही नहीं—दो महीने से अधिक इंतजार और फिर ‘थैंक्सगिविंग डे’ पर उनकी मौत। दुनिया को मानवीयता का पाठ पढ़ाने वाला देश अपनी नागरिकों के लिए यह तक सुनिश्चित नहीं कर पाया कि जिन्हें तीन सप्ताह में सर्जरी चाहिए, वे दो महीनों तक जिंदा भी रहेंगे या नहीं।

ऐसे ही ओंटारियो की 19 वर्षीय लॉरा हिलियर और 16 वर्षीय फिनले वैन डेर वेर्केन, जो युवा और जीवन से भरपूर थे—लेकिन इलाज का इंतजार करते-करते दुनिया छोड़ गए। यह किसी पिछड़े देश की कहानी नहीं, बल्कि एक G7 देश की वास्तविकता है। 2020 में अल्बर्टा के जेरी डनहम की भी मृत्यु पेसमेकर के इंतजार में ही हो गई थी।

स्वास्थ्य दुर्व्यवस्था का केंद्र बना ओंटारियो

ओंटारियो इस त्रासदी का केंद्र बनकर उभरा है, जहां 10,634 मरीज प्रतीक्षा-सूची में मर गए। इनमें 9,100 से अधिक लोग तो डायग्नोस्टिक स्कैन तक नहीं पहुंच पाए। यह मौतें नहीं, बल्कि उस सिस्टम की सामूहिक सजा हैं जो अपने नागरिकों के जीवन को फाइलों और फॉर्मों के नीचे कुचल देता है।

क्यूबेक में 6,290 मौतें हुईं, ब्रिटिश कोलंबिया में 4,620। छोटे प्रांतों में भी स्थिति भयावह है—नोवा स्कोटिया 727, न्यूफ़ाउंडलैंड 542, सस्कैचेवान 419, प्रिंस एडवर्ड आइलैंड 178, न्यू ब्रंसविक 121 और मैनिटोबा में 215 मौतें (वह भी अधूरे डेटा के साथ)। यह किसी एक क्षेत्र की समस्या नहीं, पूरा कनाडा इलाज की प्रतीक्षा-सूची में बदल चुका है।

दुखद यह है कि यह मौतें केवल जीवन-रक्षक सर्जरी के इंतजार में ही नहीं हुईं, बल्कि वे सर्जरी और प्रक्रियाएं जिनसे लोगों के जीवन की गुणवत्ता सुधर सकती थी—कूल्हे और घुटने की सर्जरी, मोतियाबिंद के ऑपरेशन, एमआरआई—उनका नंबर तक नहीं आया। रिपोर्ट कहती है कि मोतियाबिंद का इंतजार कर रहे मरीज अपनी दृष्टि खो बैठते हैं और जोड़ प्रत्यारोपण का इंतजार कर रहे लोग निष्क्रियता के कारण गिरकर घायल हो जाते हैं, रक्त थक्के बन जाते हैं और इस तरह छोटे-छोटे इंतजार बड़े-बड़े नुकसान में बदल जाते हैं।

लेकिन स्थिति इससे भी ज्यादा गंभीर है—कनाडा में 355 लोग हृदय प्रक्रियाओं का इंतजार करते-करते मर गए। कई मरीजों ने अनुशंसित सीमा से अधिक यानी 90 दिनों से लेकर कई महीनों तक इंतजार किया। और कुछ मौतें तो इतनी क्रूर हैं कि मरीजों ने सर्जरी के इंतजार में एक सप्ताह से लेकर लगभग नौ वर्षों तक पीड़ा झेली और फिर दम तोड़ दिया। यह दृश्य दुनिया के सबसे विकसित देशों में से एक कहा जाने वाले राष्ट्र का है।

रिपोर्ट में बार-बार यह बात उभरकर आती है कि कनाडा की स्वास्थ्य प्रणाली खर्च तो कर रही है, लेकिन काम नहीं कर रही। यह एक ऐसा ढांचा है जो पैसा तो निगलता है, पर सेवा नहीं देता। कनाडा में भ्रष्टाचार नहीं, पर अक्षमता, देरी, असमानता और अपारदर्शिता — ये चारों मिलकर एक घातक गलियारों की चक्रव्यूह बना चुके हैं।

लेकिन यहाँ से कहानी और दिलचस्प हो जाती है—जब इस भयावह तस्वीर के बगल में भारत का मॉडल रख दिया जाए।

भारत ने बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं देकर दुनिया को चौंकाया

भारत—जिसे कभी स्वास्थ्य व्यवस्था के मामले में पश्चिमी देशों के मुकाबले कमजोर कहा जाता था—आज वही देश है जिसने स्वास्थ्य सेवा को सबसे निचले स्तर तक पहुंचाकर दुनिया को चौंका दिया है। प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (PMJAY या आयुष्मान भारत) ने 60 करोड़ से अधिक भारतीयों को मुफ्त इलाज की गारंटी दी है। करोड़ों लोग कैंसर, हृदय सर्जरी, किडनी प्रत्यारोपण से लेकर जटिल ऑपरेशनों तक—बिना पैसे खर्च किए इलाज करवा चुके हैं।

भारत में स्वास्थ्य सेवाएँ केवल आधुनिक एलोपैथी तक सीमित नहीं, बल्कि आयुर्वेद, योग, सिद्ध, यूनानी और होम्योपैथी को मिलाकर एक समग्र प्रणाली का निर्माण किया गया है, जिसका नेतृत्व आयुष मंत्रालय कर रहा है। पूरी दुनिया आज भारतीय आयुष प्रणाली की ओर आकर्षित हो रही है—जबकि कनाडा आधुनिक मशीनों की अधिकता के बावजूद मरीजों को बचा नहीं पा रहा।

भारत का आरोग्य मंदिर मॉडल पंचायत स्तर तक पहुंचा

भारत के आरोग्य मंदिर मॉडल ने स्वास्थ्य को पंचायत स्तर तक पहुंचा दिया है। देशभर में हेल्थ एंड वेलनेस सेंटरों की स्थापना ने प्राथमिक स्वास्थ्य को लोकतांत्रिक बना दिया है। डिजिटल हेल्थ मिशन, टेलीमेडिसिन, जनऔषधि केंद्र और ड्रोन मेडिसिन डिलीवरी ने भारत को वह स्थान दिलाया है जहां विकसित देश आज प्रेरणा लेकर देख रहे हैं।

कनाडा की सरकारें जहां मौतों को छुपाती हैं, भारत की सरकार उपचारों की संख्या सार्वजनिक करती है। कनाडा जहां मरीजों को समय पर डॉक्टर नहीं दे पा रहा, भारत गांव के व्यक्ति तक को सुपर स्पेशलिटी अस्पतालों का इलाज उपलब्ध करा रहा है।

यह रिपोर्ट भारत की सफलता का प्रमाण

यह रिपोर्ट केवल कनाडा की विफलता नहीं दर्शाती, बल्कि भारत की सफलता का भी प्रमाण है। आज भारत अपने नागरिकों को जीवन का अधिकार सुनिश्चित कर रहा है, जबकि कनाडा इंतजार में मौतें सुनिश्चित करता दिख रहा है।

कनाडा की स्वास्थ्य प्रणाली का ढहना पश्चिमी मॉडल की असली पोल खोलता है। और भारत की उभरती स्वास्थ्य प्रणाली दुनिया को यह संदेश देती है कि संसाधनों से नहीं, नीयत और नीति-निष्ठा से स्वास्थ्य सेवा बनती है।

मौतों की टाइमलाइन (हाइलाइटेड सेक्शन) 

2018–2025:
कुल प्रतीक्षा-सूची मौतें: 1,00,000+

2024–2025:
वार्षिक मौतें: 23,746

प्रांतवार मौतें:

ओंटारियो — 10,634 (9,100+ स्कैन से पहले ही मौत)
क्यूबेक — 6,290
ब्रिटिश कोलंबिया — 4,620
नोवा स्कोटिया — 727
न्यूफ़ाउंडलैंड — 542
सस्कैचेवान — 419
पी.ई.आई — 178
न्यू ब्रंसविक — 121
मैनिटोबा — 215 (अधूरा डेटा)

मुख्य घटनाएँ:

• डेबी फ्यूस्टर – हृदय सर्जरी का इंतजार
• लॉरा हिलियर (19) – उपचार का इंतजार
• फिनले वैन डेर वेर्केन (16) – इलाज नहीं मिला
• जेरी डनहम – पेसमेकर का इंतजार (2020)

प्रतीक्षा अवधि:

एक सप्ताह → लगभग नौ वर्ष

कनाडा की स्वास्थ्य व्यवस्था का असली चेहरा:

एक ऐसा ढांचा जो पैसा तो खाता है, पर मरीज को निगल लेता है। भारत की उभरती हुई स्वास्थ्य क्रांति की तुलना में कनाडा की यह गिरती हालत हमें साफ दिखाती है—विकसित और विकासशील की परिभाषाएँ बदल रही हैं। आज सवाल यह नहीं है कि कनाडा कब सुधरेगा। सवाल यह है कि कनाडा कब जागेगा ? सवाल यह भी है कि क्या कनाडा खुद को झूठे गौरव से बाहर निकालकर अपने नागरिकों को जीवन का अधिकार दे पाएगा?

क्योंकि जो देश अस्पतालों को वेटिंग-रूम और वेटिंग-रूम को डेथ-रूम बना दे…वह ‘विकसित’ कहलाने का हक खो चुका है।

 

Topics: कनाडा स्वास्थ्य संकटप्रतीक्षा-सूची मौतेंकनाडा हेल्थकेयर फेलियरभारत स्वास्थ्य क्रांतिSecondStreet रिपोर्टCanada health crisiswait-list deathsCanada healthcare failureIndia health revolutionआयुष्मान भारतSecondStreet Report(Ayushman Bharat)
प्रमोद कौशल
प्रमोद कौशल
25+ वर्षों के पत्रकारिता अनुभव के साथ स्वतंत्र और टीम-आधारित काम में सक्षम। नेतृत्व, टीम विकास और प्रेरणा में सिद्ध कौशल। विशेषज्ञता: भारतीय व कनाडाई राजनीति। [Read more]
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