श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के शिखर पर ध्वजारोहण समारोह में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत ने कहा कि आज हम सबके लिए सार्थकता का दिवस है। कितने ही लोगों ने जो सपना देखा, कितने ही लोगों ने जो प्रयास किए, अपने प्राण अर्पित किए, आज उनकी स्वर्गस्थ आत्मा तृप्त हुई होगी। आज वास्तव में अशोक सिंहल जी की आत्मा को शांति मिली होगी। महंत रामचंद्र दास जी महाराज, डालमिया जी समेत कितने ही संत, गृहस्थ एवं विद्यार्थियों ने प्राणार्पण किए, पसीने बहाए। जो पीछे रहे, वे भी यही इच्छा व्यक्त करते थे कि मंदिर बनेगा, जो अब बन गया है। आज मंदिर निर्माण की शास्त्रीय प्रक्रिया पूर्ण हो गई। ध्वजारोहण भी हो गया। निश्चित तौर पर यह एक ऐतिहासिक व पूर्णत्व का क्षण है। आज का दिन कृतार्थता का दिवस है। आज हमारे संकल्प की पुनरावृत्ति का दिवस है, जिसे हमारे पूर्वजों ने हमें दिया है।
सरसंघचालक जी ने कहा कि रामराज्य का ध्वज, जो कभी अयोध्या में फहराता था और संपूर्ण विश्व में अपने आलोक से सुख-शांति प्रदान करता था, वह ध्वज आज फिर से नीचे से ऊपर चढ़कर शिखर पर विराजमान हो चुका है। इसे हमने अपनी आंखों से इसी जन्म में देखा है। ध्वज धर्म का प्रतीक होता है। इतना ऊंचा ध्वज चढ़ाने में भी समय लगा, ठीक ऐसे ही मंदिर बनाने में भी समय लगा। 500 साल छोड़ें तो भी 30 साल तो लगे ही। उस मंदिर के रूप में हमने उन तत्वों को ऊपर पहुंचाया है, जिनसे संपूर्ण विश्व का जीवन ठीक चलेगा। उसी धर्म का प्रतीक भगवा रंग इस धर्म ध्वज का रंग है।
उन्होंने कहा कि इस धर्म ध्वज पर कोविदार का प्रतीक रघुकुल की परंपरा से जुड़ा हुआ है। यह कचनार जैसा लगता है। यह मंदार और पारिजात, दोनों वृक्षों के गुणों का संयुक्त रूप है। वृक्ष स्वयं धूप में खड़े रहकर सबको छाया देते हैं, फल उगाते हैं और दूसरों को बांट देते हैं। ‘वृक्षाः सत्पुरुषाः इव सन्ति’ अर्थात् वृक्ष सत्पुरुषों के समान हैं। यदि ऐसा जीवन जीना है तो चाहे कितनी प्रतिकूलता हो, साधनहीनता हो, दुनिया स्वार्थ में बहती हो, फिर भी हमारा संकल्प है कि हमें धर्म के पथ पर चलना है।
कचनार के औषधीय गुण हैं, खाद्य उपयोग में भी आता है। सूर्य भगवान धर्म के तेज और संकल्प के प्रतीक हैं। उनके रथ का चक्र एक है, रास्ता नहीं है, सात घोड़े हैं, जिन्हें नियंत्रित करने के लिए सर्प की लगाम है, सारथी के पैर नहीं हैं। क्या ऐसी गाड़ी चल सकती है? फिर भी वे बिना थके प्रतिदिन पूरब से पश्चिम जाते-आते हैं। कार्य की सिद्धि स्वयं के भरोसे होती है। हिंदू समाज ने लगातार 500 वर्षों और बाद के दीर्घ आंदोलन में अपने इस स्वत्व को सिद्ध किया। रामलला आ गए, मंदिर बन गया। यही बात सत्य पर आधारित धर्म को लेकर भी है। सत्य का प्रतिनिधित्व ‘ओंकार’ से होता है। वही ‘ओंकार’ संपूर्ण विश्व को देने वाला भारत हमें खड़ा करना है।
सरसंघचालक जी ने कहा, ‘एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः’ अर्थात् इस देश में जन्मे अग्रजन्मा ऐसा जीवन जिएं कि दुनिया उनसे प्रेरणा ले। ‘स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवाः’ यानी पृथ्वी के समस्त मानव भारतवासियों के चरित्र से जीवन की विद्या सीखें। परम वैभव सम्पन्न, सबके लिए खुशी और शांति बांटने वाला तथा विकास का सुफल देने वाला भारतवर्ष हमें खड़ा करना है। यही विश्व की अपेक्षा और हमारा कर्तव्य भी है।
श्रीरामलला विराजमान हैं, उनसे प्रेरणा लेकर कार्य की गति हम आगे बढ़ाएं। इस अवसर पर रामदास स्वामी के श्लोक ‘स्वप्नी जे देखिले रात्री। ते ते तैसेचि होतसे’ का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जैसा सपना उन्होंने देखा था, उससे भी अधिक भव्य और सुंदर मंदिर आज बन गया है’। सभी सनातन धर्मावलंबियों और भारतवर्ष के नागरिकों को शुभकामनाएं देते हुए उन्होंने कहा कि यह हमारे हृदय में तप का सृजन करें यही कामना है।

















