क्या China के दबाव में Taiwan को हथियार देने से मुकर जाएगा America! ताइवान को लेकर चीन के तेवर क्यों हुए तीखे!
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क्या China के दबाव में Taiwan को हथियार देने से मुकर जाएगा America! ताइवान को लेकर चीन के तेवर क्यों हुए तीखे!

ताइवान को 330 मिलियन डॉलर के हथियार और कल-पुर्जे देने का फैसला एक प्रकार से अमेरिका के उसको समर्थन का मजबूत संकेत है। यह सुरक्षा ताइवान की सैन्य ताकत बढ़ाएगी और चीन की आक्रामकता को रोकने में मदद करेगी

Written byAlok GoswamiAlok Goswami
Nov 29, 2025, 05:47 pm IST
in विश्व, विश्लेषण
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और राष्ट्रपति शी जिनपिंग (File Photo)

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और राष्ट्रपति शी जिनपिंग (File Photo)

रक्षा क्षेत्र में आजकल एक चर्चा जोरों पर चल रही है कि अमेरिका संभवत: ताइवान को उसकी ‘क्षमता’ बढ़ाने वाले हथियार देने के वादे से मुकर जाएगा। इसके पीछे शायद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की चीन को लेकर दीर्घकालिक रणनीति है और इस वजह से फिलहाल वे ताइवान से दूरी बढ़ा सकते हैं। यह चर्चा जापान के चीन के प्रति रुख नरम करने से शुरू हुई है। यहां ध्यान रखना होगा कि अमेरिका ने गत 13 अक्तूबर को ताइवान को 330 मिलियन डॉलर के लड़ाकू जेट और अन्य विमानों के कल—पुर्जे बेचने की मंजूरी दी थी।

Representational Image

इस कदम का मकसद ताइवान की सैन्य क्षमता और परिचालन तत्परता को मजबूत करना है, जो एफ-16, सी-130 और अन्य विमानों के लिए बहुत जरूरी है। यही वह करार है जिसको लेकर चर्चाओं का बाजार इसलिए गर्म है क्योंकि इस पर दस्तखत होने के बाद चीन की तरफ से आक्रामक बयान सुनाई दिए हैं।

अमेरिका की ताइवान को हथियार व कल—पुर्जे उपलब्ध कराने की यह नीति 1979 के ताइवान संबंध अधिनियम के अंतर्गत है, जिसमें ताइवान को रक्षात्मक हथियार प्रदान करने की जिम्मेदारी तय की गई है। हालांकि, चीन हथियारों की इस बिक्री से नाराज है और उसने प्रतिबंध लगाने की धमकियां दी हैं, जिससे अमेरिका-चीन संबंधों पर दबाव बढ़ना स्वाभाविक ही है।

लेकिन, दिक्कत यहां यह है कि अमेरिका की ताइवान नीति में रणनीतिक अस्पष्टता रही है, क्योंकि अमेरिका जानबूझकर यह स्पष्ट नहीं करता कि अगर चीन ताइवान पर हमला करता है तो क्या वह सैन्य दखल देगा! विशेषज्ञ कहते हैं कि यह अस्पष्टता चीन को हमला करने से रोकने और ताइवान को ‘स्वतंत्रता’ की एकतरफा घोषणा करने से रोकने के लिए है। हालांकि अमेरिका औपचारिक रूप से ताइवान को ‘स्वतंत्र राज्य’ के रूप में मान्यता नहीं देता, फिर भी यह अमेरिकन इंस्टीट्यूट इन ताइवान (AIT) जैसे संस्थानों के माध्यम से ताइवान से अनौपचारिक संबंध बनाए रखता है। यह संस्थान एक प्रकार से ताइवान में अमेरिकी दूतावास के तौर पर कार्य करता है।

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ताइवान के राष्ट्रप​ति लाई चिंग ते (File Photo)

अमेरिका-चीन नजदीकी और तनाव
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले दिनों एक इंटरव्यू में कहा था कि अमेरिका और चीन के बीच रिश्ते अच्छे हैं, दोनों में व्यापार बेहतर हो रहा है, लेकिन टैरिफ और व्यापार घाटे को लेकर तनाव जारी है। दोनों देशों ने कुछ व्यापार समझौतों पर सहमति बनाई है, जैसे चीन की तरफ से आवश्यक खनिज तेजी से भेजने पर राजी होना और टैरिफ में कमी लाने के अवसर तलाशना। जुलाई 2025 तक व्यापार और आर्थिक क्षेत्र में ऐसे समझौते अमेरिका-चीन के नजदीकी संकेत थे, लेकिन सैन्य मुद्दों और तकनीकी प्रतिस्पर्धा में यह तनाव कम नहीं हुआ है और अब तो इसके बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं!

ताइवान को हथियार बिक्री
दरअसल, ताइवान को 330 मिलियन डॉलर के हथियार और कल—पुर्जे तथा उपकरण देने का फैसला अमेरिका के उसको समर्थन का मजबूत संकेत है। यह सुरक्षा ताइवान की सैन्य ताकत बढ़ाएगी और चीन की आक्रामकता को रोकने में मदद करेगी। ट्रंप के पहले कार्यकाल में ताइवान को भारी मात्रा में हथियारों की आपूर्ति हुई थी और अब उनकी योजना इसे और बढ़ाने की है। ताइवान इसे ‘नई शुरुआत’ बता रहा है, लेकिन चीन ने इसका तीखा विरोध करते हुए ताइवान की सरहदों पर सैन्य गतिविधियां बढ़ा दी हैं।

ताइवान को 330 मिलियन डॉलर के हथियार और कल—पुर्जे तथा उपकरण देने का अमेरिका का फैसला ताइवान की सैन्य ताकत बढ़ाएगा (File Photo)

ताइवान को हथियार बेचने का यह करार अमेरिका-चीन संबंधों में तनाव बढ़ाने वाला इसलिए भी हो सकता है, क्योंकि चीन इस प्रयास को अपनी संप्रभुता पर ‘सीधा हमला’ मानता है। हालांकि, ट्रंप ने हाल ही यह भी कहा है कि वह चीन के साथ अच्छे संबंधों को बनाए रखने के पक्ष में हैं, लेकिन सुरक्षा और रणनीतिक संतुलन के लिए ताइवान की रक्षा जरूरी है। इस लिहाज से, लगता तो है कि वह ताइवान से हुए समझौतों को निरस्त करने नहीं करेंगे। वे चीन को खुश करने के लिए सुरक्षा समझौतों को ठंडे बस्ते में डालने की कोई योजना नहीं बना रहे हैं, क्योंकि ताइवान अमेरिकी क्षेत्रीय रणनीति का अहम हिस्सा है। लेकिन कुछ विशेषज्ञों की राय अमेरिका और चीन के बीच हाल के निकटता बढ़ाने के कुछ कदमों को देखते हुए कुछ अलग ही है।

चीन और अमेरिका ने इस साल व्यापार और तकनीकी क्षेत्र में कुछ समझौते किए हैं, जैसे कि रेयर अर्थ मेटीरियल्स की आपूर्ति बढ़ाना और टैक्स कम करना। साथ ही, भारत-चीन तथा रूस-चीन के बीच भी इस साल कुछ रणनीतिक वार्ता और शिखर बैठकें हुई हैं, जो एशिया के भू-राजनीतिक समीकरण में अमेरिका-चीन संबंधों को प्रभावित करती हैं। ट्रंप प्रशासन की नीति में सैन्य और आर्थिक, दोनों मोर्चों पर भारत और अमेरिका के सहयोग में विस्तार को चीन के साथ संतुलित करने की कोशिश होती रही है।

इसलिए, कुछ विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि अमेरिका का ताइवान को हथियार बेचना अमेरिका-चीन नजदीकी के पहले से तय समझौतों और रणनीतिक संतुलन को फिलहाल भारी नुकसान नहीं पहुंचाएगा। ट्रंप द्वारा चीन को खुश करने के लिए ताइवान से हुए हथियार सौदे को निरस्त करने की संभावना कम है, क्योंकि ताइवान की सुरक्षा अमेरिकी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है, और चीन के साथ संबंधों में संतुलन बनाना भी अमेरिका की प्राथमिकता है।

Topics: trumpdiplomacyताइवानxi jingpinarms supplyus china relationsinternational affairstaiwanचीनअमेरिका
Alok Goswami
Alok Goswami
A Delhi based journalist with over 25 years of experience, have traveled length & breadth  of the country and been on foreign assignments too. Areas of interest include Foreign Relations, Defense, Socio-Economic issues, Diaspora, Indian Social scenarios, besides reading and watching documentaries on travel, history, geopolitics, wildlife etc. [Read more]
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