SIR प्रक्रिया कैसे काम करती है? जानिए चुनाव और सुरक्षा पर इसका असर
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SIR प्रक्रिया कैसे काम करती है? जानिए चुनाव और सुरक्षा पर इसका असर

SIR प्रक्रिया शुरू की गई है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सूची में केवल वही नाम हों जो वास्तव में भारतीय नागरिक हैं, कोई फर्जी नाम, अवैध घुसपैठिये प्रभाव न डाल सके।

Written byदीपक द्विवेदीदीपक द्विवेदी — edited by Sudhir Kumar Pandey
Nov 29, 2025, 03:15 pm IST
in भारत, पश्चिम बंगाल

किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसकी प्रगति, उसकी संस्कृति और उसके नागरिकों की पहचान पर टिका होता है। इन तीनों की रक्षा का दायित्व सरकार पर है। सरकार कैसी होगी, यह तय करते हैं वे नागरिक जो मतदान सूची में दर्ज होते हैं। इसलिए चुनाव तभी निष्पक्ष और पारदर्शी हो सकते हैं जब मतदाता सूची शुद्ध, सटीक और विश्वसनीय हो। इसीलिए SIR प्रक्रिया शुरू की गई है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सूची में केवल वही नाम हों जो वास्तव में भारतीय नागरिक हैं, कोई फर्जी नाम, अवैध घुसपैठिये प्रभाव न डाल सके।

SIR का अर्थ है विशेष गहन पुनरीक्षण, अर्थात् मतदाता सूची को एक व्यापक तरीके से “रीसेट” करना और सत्यापित करना कि सूची में सभी योग्य नागरिक हैं, और जो असमर्थ/अमान्य/डुप्लिकेट प्रविष्टियाँ हैं, उन्हें हटाया जाए।

एसआईआर पर क्या कहता है जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950

भारत में विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया पूर्णतः वैध, संवैधानिक और आवश्यक है। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धारा 16 के मुताबिक गैर-नागरिक मतदाता नहीं हो सकता। धारा 17 के तहत किसी को भी एक ही समय में दो जगह मतदाता नहीं बनाया जा सकता। धारा 21 – मतदाता सूची का सतत पुनरीक्षण अनिवार्य है। SIR इसी का हिस्सा है। धारा 22–23 कहती है कि गलत तरीकों से शामिल नाम हटाना चुनाव अधिकारी का कर्तव्य है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग को स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव कराने का अधिकार देता है, जिसमें मतदाता सूची का शुद्धिकरण शामिल है। जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 15 और 21 स्पष्ट रूप से कहती हैं कि मतदाता सूची को नियमित रूप से संशोधित और आवश्यकता पड़ने पर विशेष पुनरीक्षण के माध्यम से दुरुस्त किया जाए। इसी प्रकार निर्वाचक पंजीकरण नियम, 1960 घर-घर सत्यापन, दावे–आपत्तियां और बीएलओ रिपोर्ट जैसी प्रक्रियाओं को वैध आधार प्रदान करते हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी SIR न्यायसंगत है। मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा का अनुच्छेद 21 और नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय अनुबंध ( ICCPR) का अनुच्छेद 25 निष्पक्ष चुनाव और सटीक मतदाता सूची को लोकतंत्र का मूल अधिकार मानते हैं। भारत ICCPR का पक्षकार होने के कारण इस मानक का पालन करने के लिए प्रतिबद्ध है।

2003 को इसलिए बनाया आधार

2003 को आधार-सीमा बनाने के पीछे कारण यह है कि नागरिकता कानून 2003 ने नागरिकता को दस्तावेज़ों, जन्म-स्थान और माता–पिता की नागरिकता के आधार पर और स्पष्ट किया। 2003 -2004 से मतदाता सूची का डिजिटलीकरण प्रारंभ हुआ , जिससे सत्यापन, क्रॉस-चेकिंग, डुप्लीकेट हटाना संभव हुआ। लेकिन अगर हम गहराई से देखें तो 1971 के युद्ध के बाद भारत और नवगठित बांग्लादेश के बीच इंदिरा और मुजीबुर्रहमान के बीच समझौता इस बात पर आधारित था कि युद्धकालीन शरणार्थी अस्थायी होंगे और 1971 के बाद भारत में आने वाला कोई भी व्यक्ति विदेशी माना जाएगा। इसी तिथि को 1985 में असम अकॉर्ड के माध्यम से राजीव गांधी ने कानूनी रूप दिया, जहां स्पष्ट प्रावधान किया गया कि 24 मार्च 1971 के बाद असम में प्रवेश करने वाला प्रत्येक व्यक्ति विदेशी है। इस कटऑफ़ को संसद ने नागरिकता अधिनियम की धारा 6A में सम्मिलित करके वैधानिक बना दिया। हालांकि SIR का उद्देश्य नागरिकता तय करना नहीं, बल्कि मतदाता सूची को शुद्ध रखना है-मृत, डुपीलिकेट, फर्जी और अवैध प्रवासी प्रविष्टियों को हटाकर केवल वास्तविक भारतीय नागरिकों को सुरक्षित करना। ऐसे क्षेत्रों में, जहां इतिहास और कानून पहले ही 1971 को कटऑफ़ मान चुके हैं, SIR में इस तिथि को संदर्भ आधार बनाना पूरी तरह तार्किक और तथ्यपरक है।

गढ़ दिया जाता है अलग नैरेटिव

एसआईआर व्यवस्था वैधानिक होने के वावजूद अन्य राज्यों की तुलना में बंगाल और असम में इसका विरोध ज्यादा किया जा रहा है , जो वास्तव में सवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया का ही विरोध है। इसका कारण राजनीतिक है जैसे वोट बैंक संरक्षण जिन क्षेत्रों में अवैध प्रवासी या संदिग्ध दस्तावेज़ वाले हजारों–लाखों लोग वोट देते हैं, वे कई राजनीतिक दलों के स्थायी समर्थक होते हैं। यदि SIR में दस्तावेज़ सत्यापन सख्त हुआ और नागरिकता की जांच बढ़ी, फर्जी वोट हटाए गए तो वह दल चुनावी रूप से कमजोर हो सकता है। कुछ संगठनों और नेताओं द्वारा सारा मुद्दा गरीबों को परेशान करने की कहानी बना दिया जाता है। लेकिन वास्तविकता यह है कि गरीबी नागरिकता का प्रमाण नहीं। लेकिन गरीब/अल्पसंख्यक उत्पीड़न का नैरेटिव भावनात्मक समर्थन प्राप्त करने में मदद करता है। राष्ट्रीय हित कहता है अवैध प्रवासी मतदाता न बनें , चुनाव शुचिता सुरक्षित रहे ,राष्ट्रीय सुरक्षा मजबूत हो , भारत की जनसंख्या संरचना संतुलित रहे, सीमावर्ती राज्यों में स्थिरता बनी रहे वही वोट बैंक राजनीति कहती है फर्जी/अवैध/संदिग्ध मतदाताओं को बनाए रखा जाए ताकि राजनीतिक लाभ मिलता रहे यह संघर्ष वर्षों से चला आ रहा है। दुनिया के किसी भी देश में चाहे वह अमेरिका, यूरोप, जापान हो वहा भी गैर-नागरिक को वोट देने ,सरकारी योजना में लाभ लेने , भूमि अधिकार नहीं दिए जाते। भारत में भी यह कानून साफ है फिर सवाल यह है जब कानून स्पष्ट है, तो अवैध प्रवासियों को बचाने का दबाव क्यों? उसका उत्तर केवल राजनीति है कानून या इंसानियत नहीं।

SIR राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक संतुलन और जनसांख्यिकीय संतुलन और अवैध घुसपैठ के खिलाफ अनिवार्य है। अवैध घुसपैठ केवल जनसंख्या का मसला नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, जनसांख्यिकीय संरचना और लोकतांत्रिक स्थिरता के लिए गंभीर खतरा है। गृह मंत्रालय, IB, BSF, RAW और सुप्रीम कोर्ट कई बार स्पष्ट कर चुके हैं कि यह आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा है। बीएसएफ के अनुसार हर वर्ष भारत–बांग्लादेश सीमा से 5–10 लाख लोग पार करने की कोशिश करते हैं और लगभग 50,000–1,00,000 सफलतापूर्वक भारत में घुस आते हैं। यह संख्या सुरक्षा के दृष्टिकोण से अत्यंत चिंताजनक है।

भारत में अवैध घुसपैठ और दुष्प्रभाव

अवैध घुसपैठ ने असम और बंगाल की जनसांख्यिकी बदल दी है। असम के धुबरी में मुस्लिम आबादी 47% (1971) से बढ़कर 79% (2011) हो गई; बरपेटा 38% से 70%; नागांव 34% से 55%। बंगाल के मुर्शिदाबाद में 40% (1951) से 67% (2011) और मालदा में 33% से 51% हो गई। अनेक क्षेत्रों में स्थानीय निवासी अल्पसंख्यक बन चुके हैं, जिससे सामाजिक तनाव, भूमि और वन अतिक्रमण, मूल निवासियों का विस्थापन और मजदूरी दरों में गिरावट जैसी समस्याएं बढ़ीं। सरकारी योजनाओं में 10–15% फर्जी लाभार्थी पाए गए। सबसे बड़ा खतरा लोकतंत्र पर है-असम की 40 और बंगाल की 90–100 सीटें वोट बैंक आधारित हो चुकी हैं। गैर-नागरिक जब चुनाव परिणाम प्रभावित करते हैं, तो यह लोकतांत्रिक तंत्र को कमजोर करता है। अवैध प्रवासन सुरक्षा, समाज, अर्थव्यवस्था और चुनाव-चारों पर भारी बोझ है। इन्हें मतदाता सूची से हटाना राष्ट्रहित में अनिवार्य है।

नेता क्यों देते हैं संरक्षण

राजनीतिक दल घुसपैठियों को इसलिए संरक्षण देते हैं क्योंकि इससे उन्हें एक स्थायी, संगठित और वफ़ादार वोट बैंक मिलता है। घुसपैठिये जब भारत आते हैं तो उनके पास न भूमि होती है, न पहचान और न सुरक्षा। लेकिन जब कोई राजनीतिक दल उन्हें राशन कार्ड, आधार, मतदाता पहचान पत्र और झुग्गी की वैधता देता है, तो वे वोट देते हुए उसी दल के स्थायी समर्थक बन जाते हैं। राजनीतिक विज्ञान में इसे ग्राहक-परिपोषक संबंध (Clientelism) या परिरक्षक–ग्राहक नेटवर्क (Patron–Client Network) कहा जाता है। यही कारण है कि घुसपैठ-प्रभावित क्षेत्रों में मतदान प्रतिशत 85–90% तक पहुंच जाता है, जो एक संगठित वोट बैंक का संकेत है। अवैध घुसपैठ लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा है, क्योंकि यदि गैर-नागरिक तय करें कि कौन सांसद, मंत्री या मुख्यमंत्री बनेगा, तो यह जनसंख्या आधारित राजनीतिक हस्तक्षेप बन जाता है। यह मानवता नहीं, बल्कि राजनीतिक व्यापार है और राष्ट्रहित के विरुद्ध है।

भारत की सांस्कृतिक आत्मा पर चोट

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है , लेकिन लोकतंत्र केवल वोट डालने वालों की संख्या से नहीं, वोट डालने वालों की वैधता से चलता है। जब कोई राष्ट्र इस मूल सिद्धांत पर चोट खाता है, तो वह केवल राजनीतिक असंतुलन नहीं, बल्कि राष्ट्रीय पहचान का संकट झेलता है। आज भारत ऐसे ही एक दोराहे पर खड़ा है। पूर्वोत्तर और पूर्वी भारत विशेषकर असम और बंगाल ने पिछले 50–60 वर्षों में अवैध घुसपैठ की ऐसी लहरें देखी हैं जिन्होंने इन राज्यों की जनसंख्या संरचना बदल दी है। कुछ जिलों में स्थानीय लोग अल्पसंख्यक बन चुके हैं। यह केवल आंकड़ों का खेल नहीं यह भारत की सांस्कृतिक और राजनीतिक आत्मा पर गहरी चोट है।

लोकतंत्र पर प्राणघातक हमला है अवैध घुसपैठ

अवैध घुसपैठ केवल आर्थिक समस्या नहीं है। यह सीमा सुरक्षा का मुद्दा है, यह कट्टरपंथ और अपराध नेटवर्क का मुद्दा है, यह सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग का मुद्दा है, और सबसे बढ़कर यह भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सोचा–समझा, धीमा, लेकिन प्राणघातक हमला है। जब गैर-नागरिक वोट देने लगते हैं, मतदाता सूची में शामिल हो जाते हैं, और प्रतिनिधि चुनने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं, तो लोकतंत्र की आत्मा घायल होती है। भारत के संविधान ने वोट का अधिकार केवल भारतीय नागरिक को दिया है गरीब या अमीर होने से नहीं, बल्कि नागरिक होने से अधिकार मिलता है। इसलिए SIR, , और चुनावी सत्यापन केवल प्रशासनिक प्रक्रियाएँ नहीं हैं। ये भारत की सुरक्षा कवच हैं। जो इसका विरोध करते हैं, वे या तो राजनीतिक लाभ देख रहे हैं, या राष्ट्रहित को समझना ही नहीं चाहते। भारत का भविष्य यही मांग करता है कि इस भूमि को भारतीयों का राष्ट्र बनाए रखकर ही हम आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा सुनिश्चित करें। यह राष्ट्र केवल उन्हीं के लिए है जो इसके प्रति निष्ठा और नागरिकता रखते हैं। भारत को भारतीयों का राष्ट्र बने रहना ही होगा। यही लोकतंत्र की ताकत है, यही संस्कृति की सुरक्षा है, और यही राष्ट्र की अस्मिता है।

Topics: राष्ट्रीय सुरक्षाअवैध घुसपैठपाञ्चजन्य विशेषSIRबंगाल में एसआईआरएसआईआर प्रक्रियानिष्पक्ष चुनावएसआईआर क्यों जरूरी हैएसआईआर कानून
दीपक द्विवेदी
दीपक द्विवेदी
सिविल सेवा विशेषज्ञ , इतिहास संकलन समिति, जनजाति कल्याण केंद्र। इतिहास , भारतीय ज्ञान परम्परा एवं विभिन्न विमर्श पर वैचारिक लेखन और उद्बोधन। [Read more]
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