पाञ्चजन्य के लिए ऐतिहासिक दिन : कुरुक्षेत्र में प्रधानमंत्री ने किया पाञ्चजन्य स्मारक का उद्घाटन
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पाञ्चजन्य के लिए ऐतिहासिक दिन : कुरुक्षेत्र में प्रधानमंत्री ने किया पाञ्चजन्य स्मारक का उद्घाटन

गीता स्थली ज्योतिसर में स्थापित ‘पाञ्चजन्य’ शंख का निर्माण मूर्तिकार नरेश कुमावत की गुरुग्राम की शिल्पशाला में किया गया। यह शंख कैसे बना, इसे बनाने में उन्हें किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा, पढ़िए उन्हीं की कलम से

Written byनरेश कुमार कुमावतनरेश कुमार कुमावत
Nov 29, 2025, 09:45 am IST
inभारत, विश्लेषण, धर्म-संस्कृति, हरियाणा
स्मारक स्थल पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ (दाएं) हरियाणा के राज्यपाल प्रो. असीम कुमार घोष, मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी (बाएं) और पर्यटन मंत्री डॉ. अरविंद शर्मा

स्मारक स्थल पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ (दाएं) हरियाणा के राज्यपाल प्रो. असीम कुमार घोष, मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी (बाएं) और पर्यटन मंत्री डॉ. अरविंद शर्मा

अयोध्या नगरी में श्रीराम मंदिर की स्थापना के साथ प्रज्वलित धर्मज्योति की पूर्णाहुति के रूप में 500 वर्ष की प्रतीक्षा के बाद विराट धर्मध्वजा का आरोहण हुआ। इससे संपूर्ण सनातन समाज, साधु-संत एवं जनमानस धन्य हुआ है। इस ऐतिहासिक आनंद के साथ एक ‘दुग्धशर्करा योग’ भी घटित हुआ। राम जन्मभूमि के समानांतर हरियाणा के कुरुक्षेत्र में भी 25 नवंबर को एक धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन हुआ। मेरे लिए यह यूं भी विशेष था कि दोनों ही कार्यक्रमों में एक मूर्तिकार के तौर पर मुझे सम्मिलित होने का सौभाग्य मिला।

अपने मूर्तिशिल्पों कल्पना और रचना के समय मैंने ऐसा कभी नहीं सोचा था कि प्रभु एक ही दिन में ‘त्रेता’ (अयोध्या) से द्वापर (कुरुक्षेत्र) की यात्रा करा देंगे किन्तु मां सरस्वती और हनुमान जी की कृपा से 25 नवंबर को ऐसा विलक्षण संयोग भी मेरे जीवन में घटित हुआ।

हरियाणा के मुख्यमंत्री जी की दूरदर्शी भूमिका

सच कहूं तो ‘पाञ्चजन्य’ स्मारक की संपूर्ण योजना, आयोजन, समन्वय और कार्यान्वयन में हरियाणा के मुख्यमंत्री श्री नायब सिंह सैनी जी की दूरदर्शिता तथा ‘पाञ्चजन्य’ साप्ताहिक पत्रिका द्वारा पूर्व में दिए गए प्रस्ताव को ठीक समय पर क्रियान्वित करने का श्रेय देना चाहिए।
इस महत्वपूर्ण योजना में पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर जी के साथ उनके समन्वय तथा सक्रियता की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।
पाञ्चजन्य साप्ताहिक की ओर से प्रस्तुत विचार के महत्व को समझते हुए उन्होंने जिस सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत को आकार दिया, जो आने वाली पीढ़ियों को गर्व की अनुभूति कराएगा और उन्हें प्रेरणा देगा।

अटल जी के शताब्दी वर्ष में ‘पाञ्चजन्य परिवार’ की यह संकल्पना तथा हरियाणा सरकार द्वारा स्वीकृत यह अनूठा उपक्रम था। दोनों ही ओर से इस परियोजना को एक कार्य नहीं, अपितु एक राष्ट्रीय, सांस्कृतिक दायित्व तथा आध्यात्मिक साझेदारी के रूप में देखा गया। इसके क्रियान्वयन का दायित्व जब मुझे सौंपा गया तो यह न सिर्फ मेरे लिए बल्कि मेरे सभी सहयोगियों के लिए जीवन की कुछ सबसे बड़ी परीक्षाओं में से एक था। अपने जीवन की कुछ सबसे बड़ी घटनाओं में से इस एक को भी में हनुमान जी का आशीर्वाद मानता हूं, उनकी आशीष से ही अतिअल्प समय में यह ‘पहाड़ सा,’ कार्य सफल हो सका।

तथा उनकी अथक मेहनत, ऊर्जा और दृढ़ संकल्प ने इस स्मारक के निर्माण को सफल बनाया। पाञ्चजन्य सम्पादक तथा उनकी टीम इस परियोजना में हमारे साथ मुख्य अवधारक, प्रमुख मार्गदर्शक और समन्वयक ही नहीं रहे, उन्होंने इसे नीतिगत दिशा भी दी। पाञ्चजन्य परिवार ने यह सुनिश्चित किया कि यह विराट और बहु-आयामी परियोजना न केवल समय पर पूर्ण हो, बल्कि गुणवत्ता, सौंदर्य और आध्यात्मिक गरिमा-तीनों मानकों पर खरी उतरे।

मात्र 18 दिन में कार्य संपन्न

सरकारी स्तर की अनेक जटिल प्रक्रियाओं, स्वीकृतियों, सुरक्षा मानकों और तकनीकी मूल्यांकन के बीच भी उन्होंने परियोजना की गति कम नहीं होने दी। इस तत्परता और समर्पण के कारण ही वह अद्भुत समन्वय स्थापित हुआ कि विशेषज्ञ जिस काम की विभिन्न प्रक्रियाओं के पूरा होने में सवा से ढाई साल का अनुमानित समय बता रहे थे, वह वस्तुतः 18 दिन में अकल्पनीय ढंग से और पूरी कुशलता के साथ पूरा हो सका। मेरे लिए यह किसी शंख शिल्प का निर्माण नहीं, बल्कि असंभव को संभव होते हुए देखने वाली ऐतिहासिक, आध्यात्मिक, भावनात्मक प्रतीकों से जुड़ी एक विशिष्ट परियोजना थी।

यह स्मारक समय पर अपेक्षित गुणवत्ता और भव्यता में बिना किसी कमी के तैयार हो सका, क्योंकि नीति-स्तर पर नेतृत्व के स्तर पर परिकल्पना से लेकर लोकार्पण तक, हर चरण में मार्गदर्शक की भूमिका कुशलता से निभाई गई और यह सुनिश्चित किया गया कि परियोजना राज्य और केंद्रीय मानकों के अनुरूप आगे बढ़े। इस प्रकल्प में समय-सीमा का अनुपालन सबसे बड़ी चुनौती थी। लेकिन गंभीर प्रयासों और प्रतिदिन कार्य प्रगति की समीक्षा से यह कार्य सीमित समय में उत्कृष्ट गुणवत्ता के साथ पूरा हुआ। कलाकार एवं तकनीकी टीम का मनोबल बढ़ाते हुए पाञ्चजन्य साप्ताहिक की टोली ने शिल्पकार और टीम के लिए चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में उनका प्रोत्साहन किया।

चुनाैतीपूर्ण, पर प्रेरक परियोजना

एक शिल्पकार की दृष्टि से व्याख्या करूं तो गुरुग्राम की जिस शिल्पशाला में हमने ‘पाञ्चजन्य’ शंख को तैयार किया, उसकी समस्त प्रक्रियाओं की परीक्षा भी इस परियोजना के दौरान अच्छे से हो गई। यह परियोजना मेरे लिए सबसे चुनौतीपूर्ण और प्रेरक रही। लगभग 6.2 टन वजनी इस धातु शिल्प के निर्माण में डिजाइनिंग, 3-डी मॉडलिंग, कास्टिंग, असेंबलिंग और फिनिशिंग सहित कई जटिल चरण थे। इसका निर्माण मेरे लिए सपने का पूरा होने जैसा था। इसमें तकनीकि चुनौतियां भी आईं, लेकिन दैव कृपा से उनका समाधान भी निकला।

एक प्रकार से यह कार्य मेरी शिल्प साधना की कसौटी भी रहा, जिससे मेरे अंदर का कलाकार, सर्जक और विचारक थोड़ी और ऊर्जा पा सका, थोड़ा और परिपक्व हो सका। इस स्मारक की सबसे बड़ी विशेषता है-आभामंडल, जो विशेष रूप से ग्लोब के चारों ओर डिजाइन किया है। यह आभामंडल केवल एक सजावटी नहीं, बल्कि दिव्य प्रकाश, ऊर्जा प्रवाह और श्रीकृष्ण की विराट सत्ता का प्रतीकात्मक रूप है। एलईडी लाइटिंग से सुसज्जित यह आभामंडल रात के समय स्मारक को दिव्य तेज प्रदान करता है। जब रोशनी प्रस्फुटित होती है, तब ऐसा प्रतीत होता है जैसे ‘पाञ्चजन्य’ शंख स्वयं धर्मयुद्ध का शंखनाद करने के लिए पुन: प्रकाशित हो गया हो।

इस दिव्य ‘पाञ्चजन्य’ स्मारक का साकार होना भारत की संस्कृति, आधुनिक तकनीक, कलाकारों की प्रतिबद्धता और कुशल प्रशासन के संयोजन का श्रेष्ठ उदाहरण है। इस परियोजना की अवधारणा से लेकर प्रधानमंत्री द्वारा भव्य लोकार्पण तक की पूरी प्रक्रिया समर्पण, टीमवर्क, उत्कृष्ट कला-दृष्टि और प्रभावी नेतृत्व का सशक्त प्रमाण है। यह स्मारक न केवल ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्व रखता है, बल्कि भारतीय सभ्यता और इसकी निरंतर प्रगति का प्रतीक भी है, जो देश की गौरवशाली विरासत को नई ऊंचाइयों पर ले गया है।

पहले पाञ्चजन्य शंख का रेखा चित्र बनाया गया, फिर उसके आधार पर त्रिआयामी मॉडल (प्रकोष्ठ में) तैयार हुआ

‘स्मारक न्याय और सत्य की विजय का प्रतीक’

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुरुक्षेत्र में ‘पाञ्चजन्य’ शंख स्मारक के उद्घाटन अवसर पर कहा कि यहां की भूमि सिख और हिंदू परंपराओं का संगम स्थल है, जहां सत्य, धर्म तथा न्याय के लिए संघर्ष का इतिहास अंकित है। उन्होंने राम मंदिर में धर्मध्वजा के प्रतिष्ठापन को इस आयोजन से जोड़ते हुए इसे सनातन आस्था की वैश्विक प्रतिष्ठा बताया। उन्होंने कहा कि यह स्मारक आने वाली पीढ़ियों को धर्म और आस्था की प्रेरणा देगा तथा महाभारत के संदेशों को आधुनिक युग तक पहुंचाने में सहायक होगा। इस स्मारक की महत्ता केवल इसके विशाल आकार या सौंदर्य में ही नहीं, बल्कि उस धर्म-परंपरा की ऊर्जा में निहित है, जिसने 5,000 वर्षों से इस भूमि को जीवित रखा है। भगवान श्रीकृष्ण का यह शंख न्याय, धर्म, साहस और विजय का प्रतीक है।

महाभारत युद्ध में भगवान श्रीकृष्ण के इसी ‘पाञ्चजन्य’ के शंखनाद ने धर्मयुद्ध की उद्घोषणा की थी। आज उसी दिव्य शंख को आधुनिक शिल्पकला में नए स्वरूप में प्रस्तुत कर राष्ट्र को समर्पित किया गया है। उन्नत वैदिक शैली की वेदिका पर स्थापित स्वर्णिम शंख सनातन संदेश, धर्म और दिव्य ज्ञान की याद दिलाता है। इस पर विशेष रूप से अंकित श्रीमद्भगवद्गीता के 18 श्लोक इसे आध्यात्मिक गहराई प्रदान करते हैं। 6.2 टन वजनी और 18 फीट ऊंचा यह स्मारक भारतीय सनातन परंपरा और संस्कृति का गौरव है। यह आने वाली पीढ़ियों के लिए धर्म और न्याय की प्रेरणा स्रोत बना रहेगा। यह स्मारक हमारी धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक होने के साथ-साथ भारत की सनातन परंपरा और दिव्य ज्ञान की जीवंत अभिव्यक्ति है। महाभारत अनुभव केंद्र परिसर में आधुनिक तकनीकों के माध्यम से महाभारत के सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक महत्व को जीवंत रूप में देखा जा सकता है।

स्मारक के उद्घाटन के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महाभारत अनुभव केंद्र के विभिन्न कक्षों का भ्रमण किया। इस केंद्र में कुरु वंशावली, महाभारत, द्रौपदी स्वयंवर, श्रीकृष्ण का विराट स्वरूप, गीता के 18 अध्याय, दशावतार, कुरुक्षेत्र 48 कोस क्षेत्र, महाकाव्य सृजन कक्ष आदि को भव्य दृश्यात्मक तकनीकों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। इन सभी अनुभागों का ध्यानपूर्वक अवलोकन करने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने गीता की पावन धरा को नमन किया।

नरेश कुमावत : भारत की पहचान गढ़ने वाले वैश्विक शिल्पी

नई संसद भवन से दुनिया के कोनों तक

नरेश कुमार कुमावत उस विरासत के शिल्पी हैं, जिन्होंने पत्थर को केवल आकार नहीं दिया, उसमें भारत की आत्मा जगाई। राजस्थान के नागौर जिले के एक छोटे से गांव से निकलकर उन्होंने भारतीय शिल्पकला को दुनिया के सामने नए गौरव के साथ प्रस्तुत किया है। तीन पीढ़ियों की विरासत को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने 600 से अधिक मूर्तियां बनाईं, जिनमें भारतीय संस्कृति, परंपरा और जीवन दर्शन की स्पष्ट पहचान दिखती है।

उनके पिता मातूराम भी प्रख्यात शिल्पकार रहे। दिल्ली एयरपोर्ट के पास स्थापित 86 फीट ऊंची शिव प्रतिमा के कारण उनकी विशिष्ट पहचान बनी। पिता को छेनी और हथौड़ी से विशाल पत्थरों को जीवंत बनाते देखना नरेश के लिए बचपन का सबसे रोचक अनुभव था। 10 साल की उम्र से ही उनके हाथों ने वही लय पकड़ ली और यह कला उनके घर की तीसरी पीढ़ी में धड़कती परंपरा का स्वाभाविक विस्तार बन गई। नरेश कुमार कुमावत आज भारत के उन प्रमुख मूर्तिकारों में हैं, जिनकी कृतियां 80 से अधिक देशों में स्थापित हैं। नई संसद भवन के लिए बनाया गया ‘महासमुद्र मंथन’ म्यूरल उनकी तकनीकी दक्षता और रचनात्मक कल्पना का अनोखा उदाहरण है। विदेशों में भी उनकी दो प्रमुख कृतियां लगातार चर्चा में रहती हैं-कनाडा में 51 फीट ऊंची श्रीराम की प्रतिमा और अमेरिका के ह्यूस्टन में स्थापित महात्मा गांधी की प्रतिष्ठित प्रतिमा।

नरेश कुमावत पारंपरिक भारतीय शिल्प और आधुनिक तकनीक को मिलाकर ऐसी भाषा गढ़ते हैं, जिससे धातु और पत्थर भी जीवंत अनुभव देने लगते हैं। उनका मानना है कि पब्लिक आर्ट केवल दृश्य नहीं होता, वह एक अनुभव है जो किसी स्थान की आत्मा और पहचान को आकार देता है। कलाक्षेत्र के जानकार एक मत से कहते हैं कि नरेश कुमार कुमावत भारतीय कला के आधुनिक दूत हैं और वह शिल्पी जिनके हाथों में परंपरा भविष्य से जुड़ती है।

Topics: नरेश कुमार कुमावतदिव्य प्रकाशऊर्जा प्रवाहश्रीकृष्ण की विराटप्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीशंख धर्मयुद्ध का शंखनादअयोध्या में श्रीराम मंदिरविजय का प्रतीकधर्मध्वजापाञ्चजन्य स्मारक का निर्माणकुरुक्षेत्र में गीता स्थलीशिल्पशालाशिल्पकार
नरेश कुमार कुमावत
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