राष्ट्रीयता की समन्वित अभिव्यक्ति
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होम भारत

राष्ट्रीयता की समन्वित अभिव्यक्ति प्रभु राम

अयोध्या नगरी भारत की सांस्कृतिक चेतना के एक और उत्कर्ष-बिंदु की साक्षी बनी। भारत का सांस्कृतिक- आध्यात्मिक वैभव अपने चरम को स्पर्श करने को तत्पर है। आज देश के समग्र विकास, एकता, समन्वय और सौहार्द के लिए भगवान श्रीराम जैसे एक राष्ट्रीय चरित्र की आवश्यकता

Written byस्वामी अवधेशानंद गिरिस्वामी अवधेशानंद गिरि
Nov 28, 2025, 01:47 pm IST
in भारत, विश्लेषण, धर्म-संस्कृति

श्री रामलला मंदिर के गर्भगृह की अनंत ऊर्जा और उनका दिव्य प्रताप धर्म ध्वजा के रूप में दिव्यतम-भव्यतम श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में प्रतिष्ठापित हुआ है। यह धर्म ध्वजा केवल एक ध्वज नहीं, बल्कि सनातन धर्म-संस्कृति, भारतीय सभ्यता और आर्ष परंपरा के पुनर्जागरण का प्रतीक है। अयोध्या नगरी भारत की सांस्कृतिक चेतना के एक और उत्कर्ष-बिंदु की साक्षी बनी जब श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के शिखर ध्वजारोहण उत्सव के अद्वितीय, अलौकिक परम पावन क्षणों के साक्षी बनने का सौभाग्य भारतीयों को प्राप्त हुआ। भारत का सांस्कृतिक-आध्यात्मिक वैभव अपने चरम को स्पर्श करने को तत्पर है।

भारत का अनेकता में एकता का दर्शन संपूर्ण विश्व के लिए एक बड़ा आदर्श है। नदियां, झील, जलाशय और प्रकृति सबके लिए है। यहां का जीवन जाति, वर्ण और सम्प्रदाय की संकीर्णताओं से परे, सर्वसमावेशी है, जिसमें सभी मतों और विचारों का सम्मान है। वेदों ने हमारा परिचय कराया कि हम अमृतपुत्र हैं, अमृत की सत्ता हमारे पास है। अपने मन को पवित्र रखें, अंतःकरण की पवित्रता से आप संसार को रूपांतरित कर सकते हैं। पूर्ण परात्पर ब्रह्म मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम भारत की कालजयी-मृत्युंजयी सनातन वैदिक संस्कृति के सर्वोच्च प्रतिमान हैं। उनके जैसा शील, संयम और चरित्र अन्यत्र कहीं भी देखने को नहीं मिलता। यद्यपि भगवान श्रीराम सर्वसमर्थ पूर्ण ब्रह्म हैं और तारक सत्ता हैं तथापि समाज में श्रेष्ठ आदर्श एवं उच्चतम प्रतिमानों की संस्थापना के लिए अपनी श्रेष्ठता व भगवत्ता को विस्मृत कर मानवोचित व्यवहार करते रहे। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं –

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।
अर्थात् समाज में सद्प्रवृत्तियों एवं मर्यादा की संस्थापना के लिए महापुरुषों को अत्यन्त सजग रहकर व्यवहार करना चाहिए, क्योंकि श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करते हैं, सामान्यजन भी प्रायः उसी का अनुसरण करते हैं। भगवान श्रीराम के इस धरा धाम पर अवतरण के अनेक हेतु हैं, जिनमें से वेदविहित आचरण करते हुए समाज में उच्चतम आदर्शों की स्थापना प्रमुख है। प्रभु श्रीराम का संपूर्ण चरित्र लोकव्यवहार एवं लोकमान्यताओं के आलोक में ही है। इस दृष्टि से प्रभु श्रीराम का आचरण हमारे लिए एक आचार संहिता जैसा है। भगवान श्रीराम के दिव्य गुणानुवादों एवं जीवन चरित्र के श्रवण, मनन और लेखन का अर्थ अंतःकरण में रामत्व के अवतरण से है।

राम जैसा कोई नहीं

राम जैसा स्वामी, परमात्मा और भक्तवत्सल कोई और नहीं, ठीक ऐसे ही उनके जैसा पुत्र, बंधु, सखा, शिष्य और धर्म का प्रतिपालक भी कोई और नहीं है। पिता की एक आज्ञा पर राज्य वैभव त्यागकर वन जाने का श्रेष्ठ उदाहरण कहां देखने को मिलता। भारत चरित्र उपासक देश है, जहां धनबल, बाहुबल के आधार पर कभी कोई बड़ा नहीं बन सकता। संभवत: इसीलिए उच्चकुल में जन्मे रावण को हम राक्षस और मांसभक्षी जटायु को महात्मा कहकर संबोधित करते हैं। जो सत्कर्म परायण है अथवा जिसके पास चरित्र बल है, वही श्रेष्ठ है।
रावण के विरुद्ध धर्म और अधर्म के महाभीषण संग्राम में भी प्रभु श्रीराम ने किसी राजा अथवा उनकी सेना का सहयोग नहीं लिया। अपने वनवास के कालखंड में वे शोषितों, वंचितों, वनवासी और गिरिवासियों के मध्य गए। प्रेम और दुलार देकर उन्हें अपनाया। राम का प्रेम शबरी का प्रेम है, जिसमें भक्ति है, मर्यादा है। राम के मित्र वे लोग हैं, जो संसार भर से पीड़ित और उपेक्षित हैं। उसमें केवट, वनवासी, विकलांग और वानरादि सम्मिलित हैं। जीवन में किसी बड़ी उपलब्धि पर मन में गर्व आए- श्रीराम की विनम्रता को याद कर लेना। लंका विजय के अनंतर जब भगवान श्रीराम से उनकी माता कौशल्या ने पूछा कि आप इतने सुकुमार हो, रावण का वध कैसे किया? तब श्रीराम यही कहते हैं कि मुझ पर अहर्निश महादेव और गुरु की कृपा बरसती थी। उनके आशीर्वाद का सम्प्रेषण मेरे बाणों तक होता था, अन्यथा मेरे बाणों में इतनी शक्ति कहां थी। यही विनम्रता राम को मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के रूप में प्रतिस्थापित करती है।

जितने भी हमारे दुःख हैं, उनका एक ही कारण है-आत्म विस्मृति। अज्ञानता ही हमारे दुःख का कारण है। भगवान श्रीराम का चरित्र मात्र उपाख्यान नहीं है, अपितु उनके जीवन चरित्रों का अनुगमन कर हम अपने जीवन को भी दिव्यता की ओर ले जा सकते हैं। सद्भाग्य से अयोध्या में माननीय प्रधानमंत्री श्रीयुत् नरेंद्र मोदी के करकमलों द्वारा पूर्ण परात्पर ब्रह्म भगवान श्रीरामलला के जन्मभूमि मंदिर के शिखर का ‘ध्वजारोहण’ का ऐतिहासिक कार्य राष्ट्र के लोकजीवन में रामत्व की संसिद्धि में सहायक सिद्ध होगा। प्रभु श्रीराम से सबको सम्मान देने व सभी को साथ लेकर चलने की प्रवृत्ति सीखकर सामाजिक समरसता के नए युग का सूत्रपात किया जा सकता है। समाज में नैतिक मूल्यों के प्रसार, परिवार में प्रीति और एकजुटता और विश्वमंगल के लिए अपने अंतःकरण में राम की प्रतिस्थापना आवश्यक है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम किसी एक मत, पंथ और सम्प्रदाय के न होकर राष्ट्रीयता की समन्वित अभिव्यक्ति हैं। आज देश के समग्र विकास, एकता, समन्वय और सौहार्द के लिए भगवान श्रीराम जैसे एक राष्ट्रीय चरित्र की आवश्यकता है।

समृद्धि और उत्कर्ष का नया अध्याय

वर्तमान काल सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और धार्मिक मूल्यों की पुनः प्रतिष्ठा को समर्पित है। जैसे लंका विजय के बाद राम राज्य की प्रतिष्ठा हुई थी, उसी प्रकार श्रीरामलला की प्राण-प्रतिष्ठा और ध्वजारोहण के बाद देश में समृद्धि और राष्ट्र उत्कर्ष का नया अध्याय आरंभ हो रहा है। श्रीराम मंदिर का निर्माण देश के सांस्कृतिक-आध्यात्मिक मूल्यों के संरक्षण हेतु हमारी पारमार्थिक प्रतिबद्धता को दर्शाता है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम राष्ट्रीयता की समन्वित अभिव्यक्ति हैं। देश के समग्र विकास, एकता, समन्वय और सौहार्द के लिए भगवान श्रीराम का चरित्र सामयिक, समीचीन, नित्य प्रासंगिक और प्रत्येक संदर्भ में नित्य नूतन है। अयोध्या में श्रीराम मंदिर का निर्माण देश में शील, संयम, मर्यादा के श्रेष्ठ मूल्यों के साथ समरस समाज के युग की संस्थापना है।

भगवान श्रीराम वनवास काल में आर्थिक रूप से विपन्नजन, वनवासी और गिरिवासियों के मध्य गए। निषादराज को मित्र बनाया। शबरी के जूठे बैर खाए। यही अंत्योदय, ग्रामोदय और सर्वोदय के कल्याणकारी सूत्र हैं। प्रजावत्सल भगवान श्रीराम का मर्यादित जीवन और लोकोत्तर चरित्र हमारे लिए प्रेरणा है कि घर, परिवार, समाज और राष्ट्र में सभी को साथ लेकर कैसे चला जाता है। हमें धर्म को युगानुकूल रूप से परिभाषित कर विकास के साथ मर्यादा और धर्म की रक्षा कैसे करनी है, यह प्रेरणा भगवान श्रीराम से प्राप्त होती है। हम परस्पर प्रीति, समन्वय और धर्म युक्त आचरण कर राष्ट्र को श्रेष्ठता और समृद्धि के शिखर तक लेकर जाएं, यही राम राज्य की संकल्पना है। श्रीराम मंदिर के निर्माण के बाद अयोध्या न केवल धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध होगी, अपितु यह मोक्ष प्रदात्रि नगरी वैश्विक पर्यटन का केंद्र बनकर अपने दिव्य गौरव को प्राप्त करने में समर्थ सिद्ध होगी। श्रीराम से हमें मर्यादा भी सीखनी है और धर्म की रक्षा भी। सरलता और सौम्यता भी सीखनी है और दुष्प्रवृत्तियों के निवारण की प्रतिबद्धता भी। वाल्मीकि रामायण के उत्तरकांड में भगवान श्रीराम द्वारा प्रजा के कल्याण हेतु संस्थापित विविध व्यवस्थाओं का सुंदर निरूपण किया गया है।

राम राज्य में स्वास्थ्य व्यवस्था

न पर्यदेवन्विधवा न च व्यालकृतं भयम्|
न व्याधिजं भयन् वापि रामे राज्यं प्रशासति||
महर्षि वाल्मीकि के अनुसार श्रीराम के शासनकाल में स्वास्थ्य व्यवस्था इतनी सुदृढ़ थी कि यज्ञ आदि शुभ कर्मों के प्रभाव से कोई रोग नहीं पनपता था। भगवान का राज्य प्रबंधन इतना कुशल था कि वहां सर्प आदि जहरीले जंतु सामान्य जन समुदाय के निकट नहीं आते थे। भगवान के शासन काल में कभी किसी महिला ने वैधव्य का दुःख नहीं भोगा।
राम राज्य की सुदृढ़ कानून-विधि व्यवस्था
निर्दस्युरभवल्लोको नानर्थः कन् चिदस्पृशत्|
न च स्म वृद्धा बालानां प्रेतकार्याणि कुर्वते||
सर्वं मुदितमेवासीत्सर्वो धर्मपरोअभवत्|
राममेवानुपश्यन्तो नाभ्यहिन्सन्परस्परम्||
संपूर्ण राज्य में राजा के सात्विक चरित्र और सुदृढ़ न्याय व्यवस्था के कारण चोरों और लुटेरों का भय नहीं था। कोई भी मनुष्य पाप कर्म में संलग्न नही था। किसी की अपमृत्यु नहीं हुई, जिससे वृद्धों को बालकों के अंत्येष्टि-संस्कार नहीं करने पड़ते थे। सब लोग सदा प्रसन्न ही रहते थे। सभी धर्मपरायण थे और श्रीराम के चरित्र पर बारंबार दृष्टि रखते हुए वे कभी एक-दूसरे को कष्ट नहीं पहुंचाते।

राम की प्रजा वत्सलता

आसन्वर्षसहस्राणि तथा पुत्रसहस्रिणः|
निरामया विशोकाश्च रामे राज्यं प्रशासति||
रामो रामो राम इति प्रजानामभवन् कथाः|
रामभूतं जगाभूद्रामे राज्यं प्रशासति||
श्रीराम राज्य की जनकल्याणकारी नीतियों के कारण लोगों की औसत आयु सहस्त्रों वर्ष थी। सहस्त्रों पुत्रों के जनक होते थे व उन्हें किसी प्रकार का रोग या शोक नहीं होता था।
राम राज्य में पर्यावरण संरक्षण के सूत्र
नित्यपुष्पा नित्यफलास्तरवः स्कन्धविस्तृताः|
कालवर्षी च पर्जन्यः सुखस्पर्शश्च मारुतः||
श्रीराम के राज्य में प्रजा निरंतर वृक्षारोपण करती थी। वृक्षों की जड़ें सदा सुदृढ़ रहती थीं। वे वृक्ष सदा फूलों और फलों से लदे रहते थे। मेघ प्रजा की इच्छा और आवश्यकता के अनुसार ही वर्षा करते थे। वायु मंद गति से चलती थी, जिससे उसका स्पर्श सुखद जान पड़ता था।
राम राज्य में अर्थोपार्जन की व्यवस्था
ब्राह्मणा: क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा लोभविवर्जिताः|
स्वकर्मसु प्रवर्तन्ते तुष्ठाः स्वैरेव कर्मभिः||
आसन् प्रजा धर्मपरा रामे शासति नानृताः|
सर्वे लक्षणसम्पन्नाः सर्वे धर्मपरायणाः||
सभी वर्णों के लोग लोभ रहित होते थे। सबको अपने पुरुषार्थ में संतोष था और सभी एक-दूसरे के पालन में लगे रहते थे। प्रजा धर्म में संलग्न थी। झूठ नहीं बोलती थी, सब लोग उत्तम लक्षणों से संपन्न थे और सब धर्मानुकूल अपनी आजीविका चलाते थे। राम क्या हैं? इसे महर्षि वेदव्यास अध्यात्म रामायण में परिभाषित करते हैं-
रमन्ते योगिनो यस्मिन् नित्यानंदे चिदात्मनि।
इति राम पदेनस्सौ परब्रह्मभिधीयते।। (अध्यात्म रामायण)
विपरीत परिस्थितियों से कैसे बाहर निकलें, यह कला भी भगवान श्रीराम से सीखी जा सकती है। वन गमन के समय भी उनके मन में किसी के प्रति रोष और क्रोध नहीं है। अपितु राम अपने स्वभाव में स्थिर हैं, शांत हैं। वर्ण भेद को मिटाकर भगवान श्रीराम ने कितने ही उपेक्षित और निरीह प्राणियों का उद्धार किया।
पिता दीन्ह मोहि कानन राजू। जहं सब भांति मोर बड़ काजू।।

राम की सद्गुण ग्राह्यता

गुरुगृह गए पढ़न रघुराई। अलप काल बिद्या सब पाई।।
जाकी सहज स्वास श्रुति चारी। सो हरि पढ़ यह कौतुक भारी।।
बड़ों के अनुभव का कैसे लाभ उठाना है, यह भी भगवान श्रीराम से सीखा जा सकता है। यद्यपि राम पूर्ण ब्रह्म हैं, फिर भी लोकमान्य विद्वानों, मनीषियों और ऋ षि-मुनियों के आश्रम जाकर उनसे धर्म और नीति का न केवल उपदेश ग्रहण करते हैं, अपितु उसे अपने व्यक्तित्व में धारण भी करते हैं।

राम की सरलता : अपने राज्य अभिषेक के बाद भगवान श्रीराम ने अर्थ नीति, धर्म नीति, समाज नीति तथा राजनीति की जो कल्याणकारी व्यवस्थाएं संस्थापित कीं, उन्हीं का नाम राम राज्य है। ये व्यवस्थाएं न केवल सामान्यजन के लिए थीं, अपितु राजा स्वयं भी उनका पालन करते हैं।

रामराज्य का स्वरूप

दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा
सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती।।
राम राज्य का प्रत्येक प्राणी सच्चरित्र, धर्मनिष्ठ और कर्तव्य परायण था। वे वेद मार्ग को अर्थात् वेदों की आज्ञानुसार और शास्त्र वचनों को मानदंड मानकर जीवन-यापन करते थे। इसके फलस्वरूप रोग, शोक तथा भय की प्राप्ति उनको नहीं होती थी।

राम का पारमार्थिक स्वभाव

मोर तुम्हार परम पुरुषारथु। स्वारथु सुजसु धरमु परमारथु॥
पितु आयसु पालिहिं दुहु भाईं। लोक बेद भल भूप भलाईं॥
राम राज्य में राम और जनता के मध्य की धुरी स्वयं राम हैं। ऐसी राज्य व्यवस्था, जिसमें राजा करुणा संपन्न हैं, सबको अपनाते हैं।
राम का लोकतांत्रिक दर्शन : राजा के रूप में राम जनता के मध्य जाकर ऋ षि-मुनियों से संवाद करते हैं। यह राम का लोकतांत्रिक दर्शन है-कृपासिंधु जनहित तनु धरहीं
जन साधारण के मध्य राम की लोकप्रियता
सुनि भए बिकल सकल नर नारी। बेलि बिटप जिमि देखि दवारी॥
अयोध्या की प्रजा उनको प्राणों से भी अधिक स्नेह करती है। इतना ही नहीं, अन्याय के विरुद्ध प्रतिकार के लिए भगवान श्रीराम ने सैन्य शक्तियों का सहयोग नहीं लिया। न ही अपने प्रचंड बल को प्रदर्शित किया। उन्होंने अन्याय से लड़ने के लिए जनबल और लोकशक्ति को एकत्रित किया।

राम राज्य में अंत्योदय के सूत्र : राम के राज्य में अंत्योदय भी दृष्टिगोचर होता है। लक्ष्मण को राजधर्म का उपदेश देते हुए वे स्वयं कहते हैं-
जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी।
सो नृपु अवसि नरक अधिकारी।।
राम का कर प्रबंधन एवं आर्थिक नीति : राम की अर्थ नीति और कर प्रबंधन ऐसा था कि जो आम जन के उपयोग की वस्तुएं हैं, उनमें न्यून या शून्य कर हो और रत्न आभूषण आदि अन्य प्रतिष्ठा रक्षक वस्तुओं के उपयोग में कर बढ़ाया जा सकता है। उदाहरण के लिए,
मणि-माणिक महंगे किए, सहजे तृण, जल, नाज।
तुलसी सोइ जानिए राम गरीब नवाज।।
आइए, हम सब एक होकर भगवान श्रीराम के चरित्र और जीवन के दिव्य आदर्शों को आत्मसात कर समरस और सर्व संपन्न समाज की संस्थापना का व्रत लें। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम राष्ट्रीयता की समन्वित अभिव्यक्ति हैं। देश के समग्र विकास, एकता, समन्वय और सौहार्द के लिए भगवान श्रीराम का चरित्र सामयिक, समीचीन, नित्य प्रासंगिक और प्रत्येक संदर्भ में नित्य नूतन है।

अंतरराष्ट्रीय गीता जयंती महोत्सव के पावन अवसर पर ब्रह्म सरोवर, कुरुक्षेत्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ‘पाञ्चजन्य’ की स्थापना भारत की इसी सांस्कृतिक चेतना, आध्यात्मिक उन्नयन और वैश्विक उत्कर्ष का दिव्य शंखनाद है। यह शंखनाद महाभारत की धर्मज्योति, गीता के दिव्य अद्वैत संदेश और भारत की सनातन आत्मा के पुनर्जागरण का प्रतीक बनकर संपूर्ण विश्व में गूंज रहा है।

Topics: मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीरामसांस्कृतिक चेतनाप्रभु रामपाञ्चजन्य विशेषसनातन धर्म संस्कृतिसमग्र विकासराष्ट्रीयतापुनर्जागरणरामत्व की संसिद्धिएकतासमन्वय और सौहार्दस्वामी अवधेशानंद गिरि
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आचार्य महामंडलेश्वर, जूनापीठाधीश्वर [Read more]
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