'आत्मनिर्भरता ही दीर्घकालिक रणनीति'
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‘आत्मनिर्भरता ही दीर्घकालिक रणनीति’

‘स्वदेशी संकल्प’ सत्र में डीबीजी टेक्नोलॉजी एवं विनशार्प इलेक्ट्रानिक्स के प्रबंध निदेशक अभिषेक गर्ग ने अपने विचार रखे

Written byपाञ्चजन्यपाञ्चजन्य
Nov 25, 2025, 10:45 am IST
inविश्लेषण, मध्य प्रदेश, पाञ्चजन्य इवेंट
अभिषेक गर्ग

अभिषेक गर्ग

ट्रंप के टैरिफ युद्ध के दौर में उद्योगपति होना स्वाभाविक रूप से तनावपूर्ण अनुभव है। वैश्विक व्यापार का यह असंतुलन अचानक नहीं आया। इतिहास बताता है कि जब जापान में शोगन-शाही थी, तब देश ने स्वयं को 400 वर्षों के लिए दुनिया से लगभग पूरी तरह बंद कर लिया—न जहाज़ आते थे, न जाते थे, और यहां तक कि ईसाई पंथ प्रसारकों तक का प्रवेश प्रतिबंधित था। पर वे 400 वर्ष जापान के लिए स्थिरता, आत्मनिर्भरता और अंततः दीर्घकालीन प्रगति के वर्ष साबित हुए। यह बताता है कि आत्मनिर्भरता हमेशा कठिन परिस्थितियों में एक विकल्प और शक्ति दोनों बनकर उभरती है।

मौजूदा दौर में असमानताओं को संतुलित करने की भूमिका विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) निभाता आया है। इसमें कमजोर और सशक्त अर्थव्यवस्थाओं के बीच संतुलन सुनिश्चित करने के लिए विशेष प्रावधान रखे गए। छोटे अफ्रीकी देशों से लेकर भारत, ब्राज़ील, रूस और दक्षिण अफ्रीका जैसे विकासशील देशों तक के लिए डब्ल्यूटीओ ने एक सामूहिक संघर्ष–शक्ति तैयार की।

इससे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के पक्ष में स्वतः झुक जाने वाली व्यापार–व्यवस्था अपेक्षाकृत न्यायपूर्ण बनी रही। हालांकि भारत भी डब्ल्यूटीओ के भीतर बहुत आरामदायक स्थिति में नहीं था,थाईलैंड और वियतनाम जैसे देशों को अवसंरचना आधारित कुछ अधिक लाभ मिलते रहे-फिर भी सामूहिक बातचीत की शक्ति हमारे पास थी। समस्या तब शुरू होती है जब देश वैश्विक मंच से हटकर द्विपक्षीय व्यापार समझौतों पर उतर आते हैं।

इसमें हमेशा एक बड़ी और एक छोटी अर्थव्यवस्था आमने-सामने होती है, और संतुलन बड़े की ओर झुक ही जाता है। यदि यह नया सामान्य (न्यू नॉर्मल) बन गया, तो वही स्थिति भारत भी अपने पड़ोसी छोटे देशों के साथ दोहरा सकता है। इससे विश्व अर्थव्यवस्था में अव्यवस्था और अनिश्चितता बढ़ेगी। लोग कहते हैं कि ‘ग्लोबल विलेज’ खत्म हो रहा है। पर सच यह है कि ग्लोबल विलेज कभी बना ही नहीं। गांव लोग बनाते हैं, बाजार नहीं। पर वैश्वीकरण में मनुष्यों की आवाजाही, मानव का वैश्वीकरण कभी हुआ ही नहीं।

35 मिलियन भारतीय प्रवासी हैं, 350 मिलियन क्यों नहीं? क्योंकि सीमाएं बंद हैं। यह वैश्विक गांव नहीं था, केवल वैश्विक मंडी थी, जहां भारत को एक विशाल उपभोक्ता बाजार मानकर प्रवेश किया गया। मनुष्य का वैश्वीकरण नहीं होगा, तो बाजार का वैश्वीकरण भी स्थायी नहीं रह सकता। इसी परिप्रेक्ष्य में प्रधानमंत्री आत्मनिर्भर भारत की बात करते हैं कि भारत को अपनी विनिर्माण क्षमता बढ़ानी होगी। हम ऐतिहासिक रूप से एक व्यापारी समाज रहे हैं, जहां थोड़ा निर्माण, थोड़ा निर्यात और बीच का व्यापार प्रमुख रहा।

लेकिन यदि दुनिया टैरिफ युद्धों की ओर बढ़ रही है, तो आत्मनिर्भरता ही दीर्घकालिक रणनीति बनती है।
एच-1बी वीज़ा प्रतिबंध पर भी यही तर्क लागू होता है। यह भारत के लिए लाभकारी नहीं होगा। भारत का व्यापार घाटा 200-250 अरब डॉलर है, जिसे सेवा-निर्यात का 100 अरब डॉलर सरप्लस कवर करता है।

एच-1बी पर रोक इस सेवा-निर्यात को सीधे प्रभावित करेगी। जो लोग वहां जाकर सेवा प्रदान करते हैं, वही भारत के आर्थिक समीकरण को संतुलित रखते हैं। फिर भी संकट में अवसर छिपा है। यदि विश्व अपने लिए दरवाज़े बंद करता है, तो भारत को अपनी मानव-शक्ति और उद्यमिता को अपने यहां ही अवसर देने होंगे। इतिहास गवाह है कि हमने पहले भी कठिन परिस्थितियों में आत्मनिर्भर होकर उन्नति की है।

Topics: रणनीतिआत्मनिर्भरतासुशासन संवादपाञ्चजन्य विशेषविकासशील देशदीर्घकालिकट्रंप के टैरिफ युद्धईसाई पंथ प्रसारक
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