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वैचारिक परंपरा और सुशासन का संकल्प

पाञ्चजन्य का यह आयोजन भी उसी सुशासन के आग्रह पर आधारित है। समाज आधारित विकास ही वास्तविक विकास है, केवल राजनीति-आधारित नहीं। इसी भावना से इस संवाद में उद्योग, स्वास्थ्य और सुशासन के विविध आयामों पर विचार होगा।

Written byPanchjanyaPanchjanya
Nov 22, 2025, 11:38 am IST
inविश्लेषण, मध्य प्रदेश, पाञ्चजन्य इवेंट
द्वीप प्रज्ज्वलन कर कार्यक्रम का शुभारंभ करते हुए (बाएं से) मध्य भारत प्रांत के संघचालक अशोक पांडे, मध्य क्षेत्र के सहकार्यवाह हेमंत मुक्तिबोध, प्रज्ञा प्रवाह केंद्रीय टोली के सदस्य दीपक शर्मा एवं पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर

द्वीप प्रज्ज्वलन कर कार्यक्रम का शुभारंभ करते हुए (बाएं से) मध्य भारत प्रांत के संघचालक अशोक पांडे, मध्य क्षेत्र के सहकार्यवाह हेमंत मुक्तिबोध, प्रज्ञा प्रवाह केंद्रीय टोली के सदस्य दीपक शर्मा एवं पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर

पाञ्चजन्य द्वारा 16 नवंबर, 2025 को भोपाल के कुशाभाऊ ठाकरे इंटरनेशनल कन्वेंशन सेंटर में सुशासन संवाद के दूसरे संस्करण का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र में पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर ने कहा कि आप सब अनेक कार्यक्रमों के साक्षी रहे होंगे, परंतु यह आयोजन सामान्य मीडिया कॉन्क्लेव जैसा नहीं है। मीडिया समूह द्वारा आयोजित होने के बावजूद यह पारंपरिक मीडिया कार्यक्रम की परिभाषा में नहीं आता। जब मीडिया की बात होती है और उसमें भी जब पाञ्चजन्य की बात होती है तो लोगों की अपेक्षाएं सामान्य नहीं होतीं, वे इसे विशिष्ट भाव और मूल्यों के साथ देखते हैं, क्योंकि इसकी यात्रा ही ऐसी है।

पाञ्चजन्य भगवान श्रीकृष्ण के शंख का नाम है, महाभारत में सत्य के उद्घोष और धर्म की घोषणा का प्रतीक। मीडिया में जब यह नाम, यह गूंज आती है, तो उसका समय और उसके पीछे का विचार भी महत्वपूर्ण है। 1947 में ब्रिटिश राज समाप्त हुआ और 1948 की मकर संक्रांति पर पाञ्चजन्य का जन्म हुआ। यह ऐसा समय था जब समाज में यह भावना उभर रही थी कि मीडिया का कार्य देश को स्वतंत्रता दिलाकर पूर्ण हो गया है। उस समय श्रद्धेय भाऊराव देवरस तथा पं. दीनदयाल उपाध्याय जी के मन में यह मंथन चल रहा था कि स्वतंत्रता मिल जाने भर से काम पूरा नहीं होता, सरकारें आती हैं और जाती हैं किंतु समाज के सरोकार, उसका भाव जागरण इस सबसे ऊपर है। उनकी रक्षा और अभिव्यक्ति की यात्रा तो जारी रखनी ही होगी।

राष्ट्र कार्य के इसी शाश्वत उद्देश्य से सांस्कृतिक आधार पर समाज अभिव्यक्ति को स्वर देने के लिए पाञ्चजन्य का बीज रोपा गया। संस्थापक संपादक के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी जी का चयन इस भाव, गरिमा और समाज की अपेक्षाओं का प्रतीक था।
यह यात्रा प्रतिकूलता, अभावों तथा संघर्षों से भरी रही। चाहे श्रीराम मंदिर का प्रश्न हो, धारा 370 का विषय, गोरक्षा का आंदोलन या अन्य सामाजिक विमर्श, पाञ्चजन्य ने इन मुद्दों को साधारण रिपोर्टिंग की तरह नहीं, बल्कि वैचारिक दायित्व समझकर उठाया। यह कोई तेज़ दौड़ नहीं, बल्कि रिले रेस सरीखा है, एक पीढ़ी आगे बढ़ाती है, दूसरी उसे और आगे ले जाती है। आज पाञ्चजन्य के नाम के साथ जो थोड़ी-बहुत चमक दिखती है, वह परिश्रम की चमक है, संघर्ष की साधना है।

वैसे पाञ्चजन्य के लिए यह वर्ष इसलिए भी विशेष है क्योंकि संविधान 75वें वर्ष में, संघ शताब्दी वर्ष में हैं और संस्थापक संपादक अटल जी का भी यह शताब्दी वर्ष है। ऐसे में यह आयोजन वैचारिक रूप से अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।

आज राजनीति में सिंगल इंजन और डबल इंजन की चर्चा होती है, पर असल प्रश्न यह है कि इंजन जो भी हो उस इंजन का ईंधन क्या होगा? यदि शासन की ऊर्जा, उसकी प्रेरणा, उसका ईंधन भारत की संस्कृति, लोक परंपरा, ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक प्रतीक बने रहेंगे, तो राष्ट्र की गति-प्रगति और गड़गड़ाहट वैसी ही रहेगी, जैसी आशा भरी दृष्टि से संपूर्ण समाज या कहिए कि पूरा विश्व आज भारत को देख रहा है।

लोकमाता अहिल्याबाई होलकर, गोंड रानी दुर्गावती, समाज की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करते लोकतंत्र के पुरखे, गणराज्यों की भारतीय परंपरा… ये केवल इतिहास की कहानियां नहीं हैं। इन प्रतीकों के माध्यम से पाञ्चजन्य ने कार्यक्रमों से आगे बढ़कर वैचारिक और क्षेत्रीय विस्तार किया है। इनका उद्देश्य केवल स्मरण नहीं, बल्कि यह देखना है कि उनके आदर्शों का युगानुकूल आचरण में समन्वय कैसे हो।

आज विश्व में जेन-जी को लेकर बहुत सारी बातें हो रही हैं, कुछ लोग जेन-ज़ी को अपनी राजनीति के लिए ‘खर्च करने’, उपद्रवों में झोंकने का प्रयोग भी करना चाहते हैं, लेकिन भारत में ऐसा नहीं है। यहां का युवा, यहां की जेन-ज़ी भिन्न प्रकार से सोचती है। यदि ऐसा न होता तो न कौशल विकास इतनी तेजी से आगे बढ़ता, न इतने स्टार्टअप होते, न पेटेंट की संख्या बढ़ती।

यह बदलाव कैसे है, क्यों है, इसे समझना हो तो स्मरण रखना होगा कि राजनीतिक नेतृत्व के बड़े कार्यों के पीछे जनमत की शक्ति है। प्रशासनिक पारदर्शिता से भरोसा आता है, भरोसा ही सुशासन का रीढ़, उसका आधार है।

विवाद और कटुता राजनीति में बार बार उभरती है, कभी मर्यादा भी लांघती है, पर यदि जनता का भरोसा तंत्र पर जमने लगे तो वह सही-गलत का अंतर अधिक तर्कपूर्ण और व्यवस्थित तरीके से स्वयं करने लगती है। यह व्यवस्था, परिमार्जन की प्रक्रिया जनतंत्र अंतर्निहित निहित तत्व है। ब्रह्म और कड़वाहट की आंधियां आती हैं, किंतु लोकतंत्र ऐसे विषैले स्वर अंततः बाहर फेंक देता है।

हाल में हुआ बिहार विधानसभा चुनाव इसका उदाहरण है। बहुत बातें हुईं, पर जनता ने स्पष्ट कहा कि आगे बढ़ना है तो जंगलराज हटाना होगा और सुशासन ही विकल्प होगा।

बहरहाल, पाञ्चजन्य का यह आयोजन भी उसी सुशासन के आग्रह पर आधारित है। समाज आधारित विकास ही वास्तविक विकास है, केवल राजनीति-आधारित नहीं। इसी भावना से इस संवाद में उद्योग, स्वास्थ्य और सुशासन के विविध आयामों पर विचार होगा।

Topics: स्वास्थ्यविकास‘जंगलराज’संघर्षईंधनसुशासन संवादपाञ्चजन्य विशेषशताब्दी वर्ष
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