मुस्लिम समाज तीन तलाक देने के नए-नए तरीके निकाल रहा है। सामने से, फोन पर और सोशल मीडिया के बाद अब वकील भेज कर तीन तलाक दिया गया। ऐसे ही एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में स्पष्ट किया है कि मुस्लिम पुरुष अगर वकील को जिम्मेदारी देकर तीन तलाक का नोटिस भेजते हैं, तो वो बिल्कुल अमान्य है। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि तलाक का नोटिस बिना पति के हस्ताक्षर के बस कागज का टुकड़ा है।
जस्टिस सुर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच, जिसमें जस्टिस यू भूयान और एनके सिंह भी शामिल थे, ने ये बातें बुधवार को कही। शीर्ष अदालत ने कहा कि ये प्रथा मुस्लिम महिलाओं की इज्जत को ठेस पहुंचाती है, और कोर्ट ऐसी कोई गुंजाइश नहीं देगा।
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क्या है पूरा मामला?
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, ये मामला एक टीवी पत्रकार बेनाजीर हिना का है। वो खुद कोर्ट में हाजिर हुईं और अपनी आपबीती सुनाई। उन्होंने बताया कि उनकी शादी एक वकील से हुई थी, जो खुद उनका एडवोकेट था। लेकिन शादी के बाद सब उलट-पुलट हो गया। पति ने तलाक-ए-हसन के नाम पर तीन तलाक का नोटिस वकील के जरिए भेजा – हर महीने एक। नोटिस में पति का साइन तक नहीं था। फिर पति ने तलाक फाइनल कर लिया और दूसरी शादी कर ली। बेनाजीर को कुल 17,000 रुपये ही इसके हर्जाने के तौर पर मिले, जिससे वो बच्चे समेत सड़क पर आ गईं।
महिला ने कोर्ट में बताया कि कैसे वो एक जगह से दूसरी जगह भटकती रहीं। कोर्ट ने उन्हें सलाह दी कि वो और बच्चे की भलाई व पढ़ाई के लिए आवेदन दें। जजों ने कहा, “हम जरूरी कदम उठाएंगे।” बेनाजीर की हिम्मत की तारीफ करते हुए कोर्ट ने कहा कि वो लाखों मुस्लिम महिलाओं की आवाज बन रही हैं, खासकर जो गांवों में अनपढ़ हैं और कोर्ट तक पहुंच ही नहीं पातीं।
हस्ताक्षर की अनदेखी क्यों गलत?
केस की सुनवाई में बेनाजीर की तरफ से सीनियर एडवोकेट रिजवान अहमद ने दलील दी। उन्होंने कहा कि तलाकनामा बिना पति के हस्ताक्षर के वैध नहीं हो सकता। अगर कोई औरत इस आधार पर दोबारा शादी कर ले, तो पति बाद में कह सकता है कि तलाक तो हुआ ही नहीं, और उसे व्यभिचार का इल्जाम लगा सकता है। नया दूल्हा भी शादी से मना कर सकता है। दूसरी तरफ, पति की तरफ से सीनियर एडवोकेट एमआर शमशाद ने इसे मुस्लिम रिवाज बताया। लेकिन कोर्ट ने साफ मना कर दिया। बेंच ने पूछा, “पति के नाम पर तीसरा व्यक्ति कैसे नोटिस दे सकता है? ये वैध प्रथा कैसे हो गई?”
नया नियम मत बनाओ
कोर्ट ने इस प्रथा पर सख्ती दिखाई। जजों ने कहा कि तलाक का नोटिस या तलाकनामा में पति का साइन जरूरी है। वकील या किसी और को ये जिम्मेदारी देने की इजाजत नहीं। कल को पति कह दे कि उसने वकील को ऑथराइज ही नहीं किया, तो औरत का क्या होगा? कोर्ट ने कई केसों का जिक्र किया जहां क्लाइंट ने वकील के काम को नकार दिया। पति को फटकार लगाते हुए कहा गया कि वो कानून के मुताबिक वैध तलाक दें। बेंच ने ये भी जोड़ा कि तलाक-ए-हसन की वैधता पर विस्तृत सुनवाई के बाद फैसला होगा। ये सिर्फ उन महिलाओं के लिए नहीं, जो कोर्ट जा सकती हैं, बल्कि सबके लिए न्याय हो। कोर्ट ने पति के वकील होने पर भी नाराजगी जताई – इतना पढ़ा-लिखा इंसान ऐसा कैसे कर सकता है?















