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‘सहमति’ से असहमति जरूरी

किशोरावस्था में मनाेवैज्ञानिक उथल-पुथल बहुत होती है। क्या सही है, क्या गलत है, इसका निर्णय किशोर सोच-समझकर नहीं कर पाते है, ऐसे में यदि यदि याैन संबंधों की ‘सहमति ‘ की उम्र 18 वर्ष से घटाकर 16 वर्ष की गई तो यह किशोरों के हित में नहीं होगा

Written byडॉ. कृपाशंकर चौबेडॉ. कृपाशंकर चौबे
Nov 20, 2025, 08:33 am IST
inभारत, विश्लेषण, मत अभिमत

गत 12 नवंबर को सर्वोच्च न्यायालय की तीन सदस्यीय पीठ ने किशोरों के लिए सहमति से यौन संबंधों के लिए कानूनी आयु 18 वर्ष से घटाकर 16 वर्ष करने के विषय पर सुनवाई की। हालांकि अभी कोई निर्णय नहीं आया है, लेकिन कोई निर्णय इस पर आए उससे पहले इस विषय पर एक गंभीर सामाजिक विमर्श की आवश्यकता है।

डॉ. कृपाशंकर चौबे
सदस्य एवं बाल कानून विशेषज्ञ, किशोर न्याय बोर्ड ,भोपाल

इस संदर्भ में यह जानना आवश्यक है कि सबसे पहले यह बहस वर्ष 1860 में प्रारंभ हुई थी और वर्ष 2013 तक सहमति से यौन संबंधों की उम्र 16 वर्ष निर्धारित थी। किंतु वर्ष 2013 में बालकों का यौन अपराधों से संरक्षण अधिनियम पारित होने पर अधिनियम की धारा 2(ई) में ‘बालक’ को पुनः परिभाषित करते हुए 18 वर्ष तक के किशोर को ‘बालक’ की श्रेणी में रखा गया। साथ ही बालकों की सुरक्षा हेतु बनाए गए एक अन्य अधिनियम “किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम 2015” की धारा 2(12) के अनुसार भी बालकों की आयु 18 वर्ष मानी गई, तदनुसार सहमति से यौन संबंधों की आयु 18 वर्ष तय की गई।

भारतीय सामाजिक परिदृश्य में संयम और नैतिक आचरण जीवन के आधारभूत भाव रहे हैं। ऐसे में निरंतर परिवर्तनशील सामाजिक मान्यताओं, मूल्यों और विचारधाराओं के दृष्टिगत, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और लैंगिक समानता की चर्चा के बीच यह प्रश्न और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या 18 वर्ष से कम उम्र के किसी किशोर द्वारा शारीरिक संबंधों के लिए दी गई सहमति को कानूनी मान्यता दी जानी चाहिए? क्या यह विषय केवल कानून की परिधि में आता है अथवा इसका भावनात्मक, नैतिक और सामाजिक मूल्य भी है?

सुरक्षा के साथ समझौता

इस विषय के समर्थक यह तर्क देते हैं कि ‘प्रत्येक व्यक्ति को अपने शरीर और जीवन पर अधिकार है तथा संविधान द्वारा प्रदत्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अर्थ यही है कि व्यक्ति अपनी इच्छा से अपने जीवन का निर्णय ले सके। आधुनिक समय में किशोर शिक्षित, आत्मनिर्भर और जागरूक होकर अपने अधिकारों को समझते हैं। ऐसे में उनकी शारीरिक संबंध बनाने की सहमति को केवल उम्र के आधार पर नकारना उनके संवैधानिक अधिकारों का अतिक्रमण है।’ एक तर्क यह भी दिया जाता है कि ‘प्रेम और शारीरिक संबंध प्राकृतिक और भावनात्मक आधार पर निर्मित होते हैं, ऐसे में उन्हें कानूनी मान्यता मिलनी चाहिए।’

इस विमर्श के दूसरे पहलू को देखा जाए तो ऐसी सहमति को कानूनी मान्यता देना वस्तुतः किशोरों की सुरक्षा के साथ समझौता करना है। किशोरावस्था एक मनोवैज्ञानिक उथल-पुथल की अवस्था है, जहां तर्क और समझ के स्थान पर भावनाएं प्रधान होती हैं। विचारपूर्वक किशोरों को शारीरिक शोषण और मानसिक आघात से सुरक्षित रखने के लिए सहमति की न्यूनतम आयु 18 वर्ष निर्धारित की गई है। यदि यह सुरक्षा कवच हट गया तो अपराधी वर्ग द्वारा ‘सहमति’ का सहारा लेकर उनके दुरुपयोग की आशंकाएं बढ़ जाएंगी।

भटक सकते हैं युवा

कोमल उम्र में भावनाओं और आकर्षण के प्रभाव में बालिकाएं देह व्यापार जैसी गलत दिशा में ले जाई जा सकती हैं। अपनी वास्तविक सामाजिक पस्थिति छिपाकर, छलपूर्वक अन्य सामाजिक पहचान के जरिए किए जाने वाले संगठित सामाजिक अपराधों जैसे “लव जिहाद” में बढ़ावा होना निश्चित है। ऐसे योजनाबद्ध अपराध न केवल वैयक्तिक रूप से बल्कि सामाजिक ढांचे और परिवार व्यवस्था पर भी सीधा आघात डालते हैं। अतः याैन संबंध हेतु ‘सहमति’ की आयु घटाना प्रकारांतर से उन नकारात्मक शक्तियों को बल प्रदान करना होगा, जो किसी भी प्रकार से सामाजिक स्थिरता को भंग करने का प्रयास करती हैं।

यह निश्चित करना अत्यंत कठिन होता है कि किसी बालिका ने सहमति स्वतंत्र इच्छा से दी थी या किसी भावनात्मक दबाव, प्रेम प्रवंचना अथवा छल के तहत। अपराधी इस अस्पष्टता का आसानी से अपने बचाव में उपयोग कर सकते हैं और इसका फायदा उठाकर समाज में अस्थिरता फैला सकते हैं। इस प्रकार वस्तुतः यह संरक्षण और स्वतंत्रता के स्थान पर शोषण का माध्यम बन जाता है।

कम उम्र में स्थापित यौन संबंध चाहे वे सहमति के आधार पर बने हों अथवा बलात्, शारीरिक और मनोवैज्ञानिक रूप से विनाशकारी प्रभाव ही छोड़ते हैं। अवांछित गर्भ, विभिन्न प्रकार के संक्रमण, अपराध बोध और सामाजिक अपमान जैसी स्थितियां किशोर के भविष्य को नकारात्मक रूप से प्रभावित करती हैं। अवांछित संतानों को झाड़ियों में फेंक देने, उन्हें कुत्तों और चूहों द्वारा कुतर दिए जाने की न जाने कितनी घटनाएं हमारे मनुष्य होने की पात्रता पर प्रश्नचिन्ह हैं, क्या इस प्रस्ताव के पारित होने पर इन घटनाओं में बढ़ोत्तरी नहीं होगी? कमोबेश इस उम्र में बालक कक्षा आठ या नौ का विद्यार्थी होता है।

जिस वय में उसे शिक्षा, भविष्य और आत्मविकास के स्वप्न देखने चाहिए, वह भावनात्मक बोझ और मानसिक पीड़ा में उलझ जाता है। सामाजिक संतुलन केवल अधिकार नहीं बल्कि जवाबदेही, कर्तव्य और नैतिकता से सधता है। यदि स्वतंत्रता की परिभाषा इतनी व्यापक हो जाए कि वह बच्चों की मासूमियत के साथ छेड़छाड़ करने लगे, तो वह स्वतंत्रता नहीं, अनैतिक स्वच्छंदता है और ऐसा समाज संतुलित नहीं रह जाता, अराजक बन जाता है।

यह बात सुनने में साहसिक, विचारोत्तेजक और प्रगतिशील लग सकती है, परंतु वस्तुतः यह कदम बालक को असुरक्षा, मानसिक तनाव और शोषण में धकेलने का कारण बनेगा। समय से पूर्व स्वतंत्रता और उसे कानूनी मान्यता देने की जल्दबाज़ी एक अनुत्तरदायी और आत्मघाती कदम है। समाज और कानून दोनों का ही यह दायित्व है कि वह केवल दैहिक रूप से नहीं बल्कि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक रूप से भी बालकों की सुरक्षा की संपूर्ण व्यवस्था सुनिश्चित करे।

Topics: कानूनी मान्यताव्यक्तिगत स्वतंत्रतासंरक्षण और स्वतंत्रतामनोवैज्ञानिक उथल-पुथलमानसिक आघातसर्वोच्च न्यायालयलव जिहादपाञ्चजन्य विशेषदेह व्यापारकिशोरावस्थायौन संबंधों की सहमति
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