इस्लामी कट्टरपंथियों के कथित इशारे पर काम कर रही बांग्लादेश की मोहम्मद यूनुस सरकार ने मीडिया संस्थानों के लिए नया फरमान जारी किया है। इसमें कहा गया है कि कोई अखबार, टीवी चैनल या सोशल मीडिया शेख हसीना के वक्तव्य न छापे, न उसकी तस्वीर दिखाए। अभी दो दिन पहले राजधानी ढाका में विशेष न्यायाधिकरण ने पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को पांच आरोपों में दोषी पाते हुए फांसी की सजा सुनाई है।
बांग्लादेश सरकार के इस नए फैसले से बेशक, वहां एक बार फिर सत्ता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच गहरा टकराव सामने आ रहा है। मुख्य सलाहकार यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने यह कड़ा फरमान इस प्रकार जारी किया है मानो वे वहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सरेआम बेइज्जत कर रहे हों। इस फरमान ने उस इस्लामी देश में इस मुद्दे पर गर्मागर्म बहस छेड़ दी है।
बांग्लादेश के सूचना मंत्रालय की ओर से जारी अधिसूचना में कहा गया है कि ‘शेख हसीना को वर्तमान में गंभीर आपराधिक मामलों में सजा दी गई है, उनके वक्तव्यों का प्रसारण कानून व्यवस्था तथा राज्य की स्थिरता के लिए हानिकारक हो सकता है।’ आदेश में सभी मीडिया संस्थानों को चेतावनी दी गई है कि आदेश का उल्लंघन करने पर उनका लाइसेंस निरस्त किया जा सकता है तथा संबद्ध पत्रकारों या संपादकों के खिलाफ भी दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।
सरकार के प्रवक्ता के अनुसार, यह कदम इसलिए जरूरी था ताकि राजनीतिक स्तर पर अशांति और अराजकता की स्थिति न बने, इसे नियंत्रित करने के लिए यह प्रयास किया गया है। हालांकि, कुछ मीडिया विशेषज्ञों का कहना है कि यह फरमान सीधे-सीधे प्रेस की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति पर हमला है। कई स्वतंत्र मीडिया संगठनों ने इसे “तानाशाही का परिचायक” बताया है।
लगभग डेढ़ दशक तक बांग्लादेश की प्रधानमंत्री रहीं शेख हसीना पिछले साल सत्ता से बेदखल की गई थीं। चुनावी धांधली और विरोधों के बीच अंतरिम सरकार के रूप में नोबुल पुरस्कार विजेता प्रोफेसर मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में नई व्यवस्था स्थापित की गई थी। लेकिन सत्ता संभालने के बाद से यूनुस सरकार पर हिन्दू अल्पसंख्यकों, विपक्षी नेताओं और हसीना समर्थकों के दमन का आरोप लग रहा है।
हाल ही में एक विशेष अदालत ने शेख हसीना को ‘भ्रष्टाचार’ और ‘मानवाधिकार उल्लंघन’ के मामलों में दोषी ठहराया और उन्हें मृत्युदंड की सजा सुनाई। इस फैसले ने पूरे देश में तनाव और विरोध की स्थिति पैदा कर दी। हसीना की पार्टी अवामी लीग के कार्यकर्ताओं ने फैसले को ‘राजनीतिक बदले की कार्रवाई’ बताया और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से इसकी निंदा करने की मांग की। खबर है कि ब्रिटेन में बसे बांग्लादेशियों ने बड़ी संख्या में इकट्ठे होकर हसीना को यह सजा दिए जाने पर विरोध मार्च निकाला है।
उधर संयुक्त राष्ट्र महासचिव कार्यालय ने इस मामले में औपचारिक बयान जारी किया है। बयान में कहा गया है कि ‘संयुक्त राष्ट्र बांग्लादेश की न्यायिक प्रक्रिया और हसीना को सुनाई गई फांसी की सजा को लेकर ‘गंभीर चिंता’ व्यक्त करता है।’ संयुक्त राष्ट्र ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और निष्पक्ष न्याय व्यवस्था लोकतंत्र की बुनियाद होती है और इनका दमन अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानूनों के खिलाफ है।
यूएन महासचिव के प्रवक्ता ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “हम बांग्लादेश सरकार से अपील करते हैं कि वह मीडिया पर लगे प्रतिबंधों को तुरंत हटाए और सभी राजनीतिक विचारों को स्वतंत्र रूप से व्यक्त करने का अवसर प्रदान करे।” संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद ने भी इस फैसले की समीक्षा की मांग की है और बांग्लादेश पर अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संधियों के पालन का दबाव बढ़ाने की संभावना जताई गई है।
भारत, यूरोपीय संघ और अमेरिका सहित कई देशों ने भी बांग्लादेश में अभिव्यक्ति की स्थिति पर चिंता जताई है। वाशिंगटन से जारी एक बयान में अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने कहा है कि ‘राजनीतिक असहमति का दमन लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध है।’ वहीं दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) के भीतर भी यह मुद्दा चर्चा का विषय बन गया है।
बांग्लादेशी नागरिक समाज और अंतरराष्ट्रीय पत्रकार संघों ने सोशल मीडिया पर इस आदेश की खुलकर निंदा की है। ढाका विश्वविद्यालय के एक राजनीतिक विश्लेषक का कहना है कि ‘अगर किसी लोकतांत्रिक समाज में पूर्व प्रधानमंत्री तक की आवाज को दबा दिया जाए, तो आम नागरिक की अभिव्यक्ति का क्या होगा, यह समझा जा सकता है।’
बहरहाल, ढाका और चटगांव जैसे बड़े शहरों में सुरक्षा कड़ी की गई है। सोशल मीडिया पर निगरानी बढ़ा दी गई है और कई ऑनलाइन पोर्टलों को अस्थायी रूप से बंद कर दिया गया है। सरकारी चैनल केवल आधिकारिक प्रेस वक्तव्य प्रसारित कर रहे हैं। हालांकि, विपक्षी समर्थक छुपे नेटवर्क के माध्यम से हसीना के पुराने इंटरव्यू और संदेश साझा कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यूनुस सरकार का प्रतिबंध देश के भीतर असंतोष को और बढ़ा सकता है। अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण आने वाले दिनों में सरकार को कुछ नरमी दिखानी पड़ सकती है। वहीं संयुक्त राष्ट्र की निगरानी टीम को ढाका भेजने की संभावना पर विचार चल रहा है ताकि स्थिति का सामने जाकर मूल्यांकन किया जा सके।
इस पूरे प्रकरण ने एक बड़ा प्रश्न खड़ा कर दिया है, क्या आज की राजनीतिक स्थिति में बांग्लादेश में लोकतंत्र और मानवाधिकारों की रक्षा संभव है या मीडिया नियंत्रण का यह दौर एक नए अध्याय की शुरुआत है?

















