मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में हो रहे मध्य प्रदेश सुशासन संवाद 2.0 में ‘फैक्ट चेक’ विषय पर माखन लाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति विजय मनोहर तिवारी ने वरिष्ठ पत्रकार तृप्ति श्रीवास्तव से बात की। उन्होंने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान ही 300 फेक वीडियो वायरल किए गए थे, जिसे न्यूज चैनलों ने भी कवर किया। फेक न्यूज से निपटने के लिए मीडिया कोर्स जहां भी चल रहे हैं, वहां एक बेसिक प्रोटोकॉल बनाना पड़ेगा। और फैक्ट चेक को सिलेबस में लाना पड़ेगा।
भारत में पिछले कुछ दशक में पत्रकारिता में एक सेक्शन बनाने की आवश्यकता क्यों लगने लगी कि फेक न्यूज या फैक्ट चेक करने के लिए अलग विभाग या क्लासेस हमें लगानी चाहिए?
डिजिटल मीडिया का प्रसार होने के साथ ही जिस तेजी से असली/नकली सब तरह का कंटेंट बेहिसाब फैल रहा है और इसका ताजा उदाहरण बिहार इलेक्शन का रिजल्ट आए, लेकिन बीते 30 घंटे में करीब 25 ऐसे वीडियो सर्कुलेट हुए हैं, जिनमें से एक भी बिहार से संबंधित नहीं था और वो देश के अलग-अलग हिस्सों की घटनाएं थीं, लेकिन इन्हें बिहार चुनाव से जोड़कर प्रसारित किया गया। इसके जरिए ये झूठ फैलाने की कोशिश की गई कि चुनाव आयोग के खिलाफ बिहार का नौजवान सड़कों पर उतर आया है। इसके बाद एक राष्ट्रीय न्यूज एजेंसी को अपना एक वीडियो जारी कर इसे स्पष्ट करना पड़ा।
तकनीक ने ऐसे लोगों के हाथ में एक ब्रम्हास्त्र दे दिया है, जिन्हें उसकी गरिमा का कोई भान ही नहीं है। फेक न्यूज फैलाने से देश पर क्या असर होगा, ऐसे लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ता है। इसलिए, ऐसे हालात में मीडिया को अपनी विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए ये बैरिकेड्स लगाने पड़ रहे हैं। ये विभाग ही खबरों की विश्वनीयता की पड़ताल करेंगे। हमारे जमाने में इस तरह की समस्या नहीं थी। जिस अखबार से मैंने पत्रकारिकता की शुरुआत की थी, उसमें फैक्ट चेक विभाग तो नहीं, लेकिन प्रूफ रीडर जरूर होते थे। लेकिन, टीवी, इंटरनेट के आने के बाद हर अखबार को ये रक्षा कवच बनाना ही पड़ेगा।
फैक्ट चेक में अगर हम अलग विभाग शुरू करते हैं तो किस तरह की ट्रेनिंग बच्चों को देनी पड़ेगी कि पत्रकारिता के क्षेत्र में वो फेक न्यूज से बचें और उसे पहचानें भी?
मीडिया को कोर्स जहां भी चल रहे हैं तो वहां एक बेसिक प्रोटोकॉल बनाना पड़ेगा कि फैक्ट चेक को सिलेबस में लाना पड़ेगा। मैं आपको बताना चाहता हूं कि माखन लाल चतुर्वेदी विश्व विद्यालय ने इस दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं। जब तक हमारे कोर्स अपडेट नहीं हो जाते हैं तब तक के लिए बूस्टर डोज की तरह ही एआई, डीपफेक और इस तरह के जितने भी फैक्ट चेक टूल्स हैं इस पर वर्कशॉप कर रहे हैं। इस पर एक वर्कशॉप करीब एक माह पहले हमने आयोजित किया था, जिसमें पीटीआई की टीम आई, जिसने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान करीब 300 फेक वीडियोज उजागर किए थे। उस टीम ने हमारे स्टूडेंट को फैक्ट चेक करना सिखाया।
फेक न्यूज को समझना और पहचानना कितनी बड़ी चुनौती होती है?
ये इतना गंभीर मसला है कि इसमें दिल्ली से लेकर छोटे-छोटे स्थानों पर मीडिया संस्थान अपनी जगह काफी अलर्ट हैं। एमसीयू में तो हम इसके लिए पूरे सिलेबस रखने जा रहे हैं। बिजनेस संवाददाता रहे जयप्रकाश पाराशर का पोर्टल डेढ़ साल से इस पर बहुत ही गहराई से काम कर रहा है। उन्होंने इसके लिए 48 लेक्चर भी तैयार किए हैं। इसमें इस क्षेत्र में काम करने वाले 150 से अधिक विशेषज्ञों को देशभर से उन्होंने जोड़ा है। हम इससे निपटने के लिए न केवल एमसीयू की रिसर्च टीम, बल्कि देश की मीडिया से लोगों को भी जोड़ रहे हैं। इसमें फेक न्यूज से निपटने के लिए अकादमिक स्तर पर हम कोर्स तैयार कर रहे हैं।
पिछले कुछ सालों में अगर देखा जाए तो कौन से ऐसे विषय हैं, जिन पर सबसे अधिक फेक न्यूज फैलाई जाती है और जो समाज को नुकसान पहुंचा सकते हैं?
इस पर पिछले साल एक सर्वे किया गया था, जिस साइबर पीस बिजनेस स्कूल ने मिलकर किया था। उसके मुताबिक, भारत में फैलने वाला फेक कंटेंट है वो किस-किस सब्जेक्ट से है। उस सर्वे के अनुसार, 46 प्रतिशत कंटेंट राजनीतिज्ञ होता है, विशेषज्ञों का मानना है कि चुनाव के समय को इसकी (फेक कंटेंट) की बाढ़ सी आ जाती है। इसके अलावा सामान्य दिनों में स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था से जुड़े मुद्दों को लेकर बड़ी मात्रा में फेक कंटेंट प्रसारित किया जाता है। इसी तरह से 2018 में बच्चों के अपहरण को लेकर बहुत सी फेक न्यूज फैलाई गई थीं।
इसी तरह कोरोना के दौरान भी फेक कंटेंट फैलाया गया। 2020 में सीएए के खिलाफ शाहीन बाग को लेकर भी कई सारे फेक न्यूज फैलाए गए। इसीलिए पीआईबी को अलग से अपनी एक फैक्ट चेक यूनिट बनानी पड़ी। पीआईबी की एक वेबसाइट भी है, जिसमें इसको लेकर शिकायत भी की जा सकती है।
फैक्ट चेकिंग के लिए ऑथेंटिसिटी और क्रेडिबिलिटी आवश्यक है। ऐसे में इसके लिए क्या किया जाना चाहिए?
21 ऐसे संस्थान हैं, जो कि अंतरराष्ट्रीय फैक्ट चेक नेटवर्क के द्वारा सर्टिफाइड हैं। इसके अलावा अगर कोई स्वयंभू सरताज बनकर बैठा है तो उस पर भरोसा नहीं करना चाहिए। इन 21 संस्थानों की प्रक्रिया बहुत ही कड़ी है और हर एक साल के बाद उनको अपना सर्टिफिकेशन रिन्यू करवाना पड़ता है। इसमें पीटीआई, दैनिक जागरण, इंडिया टुडे भी इसमें शामिल है। ये संस्थान जो भी फैक्ट चेक करते हैं उसकी चेकिंग अगले रिन्यूअल के दौरान होती है।
स्वयंभू फैक्ट चेकर्स, जो खास नरैटिव चलाते हैं उनके ऊपर क्या कार्रवाई होगी?
तीन नए कानून सरकार के द्वारा लाए गए हैं, जिनमें आईटी एक्ट-2021 है, उसने सरकार को इस पर एक एक्शन प्लान बनाने के लिए एंपॉवर किया है। लेकिन, इस मामले में एक मजबूत अथॉरिटी की भारत को जरूरत है। देश में अभी ये चीजें प्रक्रिया में ही हैं। उस प्रक्रिया का इतना डर है कि अगर आप कोई एआई जेनरेटेड तस्वीर भी इस्तेमाल कर रहे हैं तो आपको बताना पड़ेगा कि ये एआई से बना है।
ऐसी क्या बेसिक चीज है, जिससे ये समझ आए कि ये फेक है?
सबसे अच्छी चीज ये है कि अगर कोई कंटेंट आपके फोन पर आता है और आपको लगता है कि इसे आगे बढ़ाने से समाज की हानि हो सकती है, तो ये आपकी जिम्मेदारी है कि आप उसे खुद ही रोक दें। अपराध, आतंक और महामारी ये तीनों के बारे में कंटेंट पर हमें सतर्क रहने की आवश्यकता है।
क्या ये जो एजेंसियां बनेंगी, इसे रेग्युलेट करने के लिए कोई बॉडी है?
फेक न्यूज से निपटने के लिए बहुत ही मजबूत अथॉरिटी की आवश्यकता है। कम से कम फैक्ट चेक के मामले में जो भी अथॉरिटी हैं, उन्हें बहुत ही अधिकार संपन्न होने की आवश्यकता है। ये दिखावे की संस्था न बनें।
(हितेश शंकर ) : माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय के साथ पाञ्चजन्य को हाथ क्यों मिलाना चाहिए? हमने आईआईएमसी के साथ 15 बड़ी ऐसी खबरों का खुलासा किया था, जिसे बड़े पत्रकारों, संपादकों या मीडिया संस्थान लेकर आए, जिसका कोई आधार नहीं था। जैसे रवीश कुमार का प्राइम टाइम बैंकों को लेकर था। होली को लेकर महिलाओं की शालीनता को धूमिल करने वाला नरैटिव रचने की कोशिश की गई। सेना को लेकर फेक न्यूज चलाई गई और ये मुख्य धारा मीडिया ने किया। इस तरह के फेक न्यूज से निपटने के लिए पाञ्चजन्य माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय में फैक्ट चेकिंग लैब स्थापित करेगा।
विजय मनोहर तिवारी ने रखा प्रस्ताव
वीसी विजय मोहन तिवारी ने माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय के क्लासरूम को पाञ्चजन्य के न्यूजरूम के साथ जोड़ने का प्रस्ताव रखा, जिस पर पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर ने सहमति व्यक्त की। उन्होंने कहा कि इस प्रस्ताव की बारीकियों को समझते हुए हमने कुछ चरण आगे बढ़ाए हैं। वहीं एमसीयू के वीसी के इस मामले में एक एमओयू के हिसाब से आगे बढ़ने के सवाल पर संपादक हितेश शंकर ने ये स्पष्ट किया कि पाञ्चजन्य पूरे फ्रेमवर्क के साथ आगे बढ़ेगा, जिसमें बच्चों के लिए भी अवसर होंगे। खबरों की प्रमाणिकता के लिए भी एक मैकेनिज्म बनाए जाएंगे।

















