उत्तराखंड: बागेश्वर का चौनी गांव क्यों खाली हो गया? 25 परिवारों से शून्य तक पहुंचने की दर्दभरी कहानी
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उत्तराखंड: बागेश्वर का चौनी गांव क्यों खाली हो गया? 25 परिवारों से शून्य तक पहुंचने की दर्दभरी कहानी

बागेश्वर जिले का चौनी गांव कभी 25 परिवारों की रौनक से भरा रहता थालेकिन आज पूरा गांव पूरी तरह वीरान हो चुका है।

Written byMahak SinghMahak Singh
Nov 16, 2025, 05:09 pm IST
inउत्तराखंड
बागेश्वर के चमड़थल के चौनी गांव में पलायन से बाखली वीरान पड़ी है

बागेश्वर के चमड़थल के चौनी गांव में पलायन से बाखली वीरान पड़ी है

बागेश्वर जिले का छोटा सा चौनी गांव कभी 25 परिवारों की हंसी-खुशी से भरा रहता था। बच्चे आंगन में दौड़ते थे, खेतों में हल की आवाज गूंजती थी और बाखली में चूल्हों से उठते धुएं से गांव जुड़ा हुआ सा लगता था। लेकिन आज चौनी गांव पूरी तरह वीरान हो चुका है। वर्ष 2025 में आखिरी परिवार के भी मजबूरी में यहां से चले जाने के बाद यह गांव जनशून्य बन गया। जिला मुख्यालय से मात्र 23 किलोमीटर दूर होने के बावजूद यहां सन्नाटा इतना गहरा है कि लगता है जैसे समय थम गया हो। सूने रास्ते, खाली घर और सन्नाटे में गूंजती अपनी ही कदमों की आवाज एक अजीब सी उदासी छोड़ जाती है।

कैसे बदला गांव का हाल- चमड़थल ग्राम पंचायत का यह गांव वर्ष 2015 तक किसी तरह 15 परिवारों के सहारे टिका हुआ था। धीरे-धीरे गांव से लोगों का पलायन शुरू हुआ। इनके पलायन की वजह सिर्फ शहरों की चकाचौंध नहीं थी, बल्कि गांव में शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और रोजगार जैसी मूलभूत सुविधाओं की भारी कमी थी। बच्चों की पढ़ाई रुक न जाए, बुजुर्गों को इलाज मिले, रोज़गार का रास्ता बने- इन्हीं जरूरतों ने लोगों को मजबूर कर दिया कि वे अपने पैतृक घर छोड़कर बड़े शहरों की ओर जाएं। आखिरकार 2025 में गांव में रहने वाली अंतिम महिला ने भी मजबूरी को समझते हुए अपना घर छोड़ दिया। उसके जाने के साथ ही चौनी गांव की अंतिम उम्मीद भी चली गई।

खाली खेत, बंद घर और टूटती विरासत- गांव में करीब 550 नाली उपजाऊ जमीन है। कभी इन खेतों में गेहूं, मक्का और मंडुवा लहलहाते थे। हल के पीछे-पीछे बच्चे दौड़ते थे और खेतों में गाने गूंजते थे। आज वही खेत घास-फूस से भरे पड़े हैं और किसी के लौटने का इंतजार कर रहे हैं। गांव में कई पुराने नक्काशीदार मकान हैं, जिन पर कभी कारीगरों की मेहनत साफ झलकती थी। साथ ही कुछ नए लिंटर वाले घर भी बने हुए हैं। लेकिन इन सब पर आज सिर्फ ताला लगा है। कुछ मकान पूरी तरह खंडहर बन चुके हैं, जबकि बाकी धीरे-धीरे टूटने की राह पर हैं। बारिश और धूप में पड़े ताले जंग खाते जा रहे हैं, जैसे वक़्त खुद बता रहा हो कि इंसानों के बिना घर भी अकेले पड़ जाते हैं।

गांववालों का दर्द- गांव के वरिष्ठ नागरिक और सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य वंशीधर जोशी कहते हैं- मैं इसी गांव में रहते हुए क्षेत्र का पहला स्नातक बना था, लेकिन सुविधाएं न होने के कारण मुझे भी गांव छोड़ना पड़ा। वर्षों का संघर्ष आज भी जारी है। सरकारें बदलती रहीं, लेकिन हालात नहीं बदले। इसी तरह गांव के एक अन्य बुजुर्ग गणेश चंद्र बताते हैं- गांव में न सड़क आई, न अस्पताल, न रोजगार। बच्चे और जवान लोग मजबूरी में दिल्ली, लखनऊ और दूसरे शहरों में बस गए। हम भी पिछले साल तक गांव में थे, पर आखिर हमें भी सड़क के पास नया घर बनाना पड़ा। न बातों से साफ पता चलता है कि गांव के लोगों ने पलायन खुशी से नहीं किया, बल्कि जरूरतों ने उन्हें ऐसा करने पर मजबूर किया।

आस्था अब भी जिंदा- चौनी गांव भले ही इंसानी तौर पर सूना हो चुका हो, लेकिन ग्रामीणों की मान्यता है कि यहां आज भी देवता निवास करते हैं। सी आस्था के चलते हर साल गर्मियों में गांव छोड़ चुके परिवार पूजा-अर्चना के लिए अपने पैतृक घरों में लौटते हैं। इन 8-10 दिनों में गांव में फिर से हलचल दिखने लगती है। झाड़ियां काटी जाती हैं, रास्ते साफ किए जाते हैं, बंद घर खोले जाते हैं और पुराने चूल्हों में फिर धुआं उठता है। इन कुछ दिनों के लिए चौनी गांव मानो फिर से जीवंत हो उठता है। लेकिन पूजा खत्म होते ही सब लोग वापस लौट जाते हैं और गांव फिर उसी खामोशी में डूब जाता है।

Topics: उत्तराखंड समाचारबागेश्वर समाचारbageshwar newsRural MigrationDeserted VillageChauani Villageग्रामीण पलायनसुनसान गांवचौनी गांवUttarakhand News
Mahak Singh
Mahak Singh
2022 में ज़ी न्यूज़ से पत्रकारिता की शुरुआत की। उसके बाद न्यूज़ नेशन, दैनिक जागरण और न्यूज़ 24 जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में कार्य करते हुए पत्रकारिता के विभिन्न आयामों का अनुभव प्राप्त किया। वर्तमान में पाञ्चजन्य में सब एडिटर के रूप में कार्यरत हूं। ज़िमा ज़ी इंस्टीट्यूट ऑफ मीडिया आर्ट्स से मैने पत्रकारिता की है। [Read more]
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