मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में हो रहे मध्य प्रदेश सुशासन संवाद 2.0 में ‘स्वास्थ्य’ विषय पर वरिष्ठ पत्रकार अनुराग से बात करते हुए डॉ प्रवीण रेड्डी ने बड़ी बात कही है। उन्होंने कहा कि हमने पिछले 500-600 सालों में आयुर्वेद और हमारी भारतीय ज्ञान परंपरा को खो दिया है। उसे फिर से वापस पाने के लिए डीप रिसर्च करने की जरूरत है। हमें आयुर्वेद को पूर्ण विश्वास के साथ फिर से अपनाने की आवश्यकता है।
आय़ुर्वेद और एलोपैथी को लेकर चल रही बहस को आप कैसे देखते हैं?
आयुर्वेद को अगर हम ठीक से समझना चाहें तो ये अपने आप में एक वेद है। इसीलिए इसमें वेद शब्द जुड़ा है। एलोपैथी की बात करें तो उसमें लक्षण से हम शुरू करके सर्जरी तक जाते हैं। ज्यादा निर्भरता डायग्नोस्टिक्स पर होती है। जैसे कि कोविड के दौरान इस्तेमाल किए गए काढ़े को इम्युनिटी बूस्टर माना गया। लेकिन, एलोपैथी में ऐसा कुछ है ही नहीं। आयुर्वेद में एक जीवंत परंपरा और शैली है। इसमें व्यक्ति जब तक जीवित रहे, तब तक कैसे स्वस्थ रहे, इसका जीवन रहस्य आयुर्वेद में छिपा है।
एलौपैथी जो कि एक आधुनिक दवाई है उसका जो तरीका है, उसमें भी पिछले 40-50 सालों में काफी अच्छा रिसर्च हुआ है। लेकिन, अगर तुलनात्मक अध्ययन के तौर पर बात करें तो हमें अपने पारंपरिक विषयों को ध्यान देने की आवश्यकता है। आयुर्वेद को मुख्यधारा में लाने की आवश्यकता है। जितनी रिसर्च एलोपैथी में हुई है, उससे अधिक डीप रिसर्च आयुर्वेद में करने की आवश्यकता है, जो ज्ञान हमने 500-600 सालों में खो दिया है, उसे फिर से स्थापित करने की आवश्यकता है।
क्या ये कह सकते हैं कि एलोपैथी शरीर को एक मशीन के तौर पर देखती है? और आयुर्वेद शरीर के प्रकृति में विकास को देखता है?
बिल्कुल, एलौपैथी डॉक्टर अपनी प्रैक्टिस में जो सीखता है, उसे विज्ञान के द्वारा सीखे गए सिस्टम से समझता है और डायग्नोस की मदद लेता है। फिर नतीजे पर पहुंचता है। वहीं आयुर्वेद अपने पंचतत्वों पर आधारित है। उनको जोड़ते ये तीन तत्वों पर आता है-वात, पित्त और कफ। आयुर्वेद में इसे दोष कहा गया है। इन्हीं तीनों के आधार पर वैद्य परीक्षण करते हैं औऱ इलाज करते हैं। आयुर्वेद में वैद्य आपके बिना कुछ कहे नाड़ी परीक्षण से ही आपको इलाज बता देंगे।
अक्सर देखा जाता है कि एलोपैथी डॉक्टर आयुर्वेद से बचने की कोशिश करते हैं। अगर कोई पैथी इतनी ही मजबूत है तो फिर आयुर्वेद से ये लोग डर क्यों रहे हैं?
क्योंकि एलोपैथी फार्मा लॉबी के साथ चलती है। फार्मा लॉबी देश और दुनिया में अपना दबदबा रखती है। एलोपैथी का अपना पैमाना है। आजादी के पहले जो भारतीय पद्धति थी, उसे पश्चिमी दर्शन ने एक टैबू की तरह देखा। पश्चिमी देश इसे हमारे इतने अंदर तक स्थापित कर गए कि अगर कोई वैद्य के पास जाता है तो इसे काफी नकारात्मक दृष्टि से देखा जाता है। लेकिन, अच्छी बात ये है कि ये स्थिति अब बदल रही है। एलोपैथी की बात करें तो दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका में ही अब ट्रीटमेंट बीमारी से अधिक भयानक हो गया है।
वहीं इस मामले में भारत धीरे-धीरे आयुर्वेद की तरफ बढ़ रहा है। डॉक्टर आज भी महर्षि सुश्रुत को सर्जरी का पिता मानते हैं। आयुर्वेदिक विज्ञान में जो भी सर्जरी थीं, उस विज्ञान से अभी हम वंचित हो गए हैं। उस ज्ञान को फिर से हासिल करने के लिए हमें रिसर्च करने की जरूरत है। हमें एलोपैथी को साथ रखते हुए हमें पूर्ण विश्वास के साथ आयुर्वेद को फिर से अपनाने की आवश्यकता है। हमें एलोपैथी की अच्छी चीजों को सीखना चाहिए, लेकिन ये आपको कभी स्वास्थ्य नहीं दे सकती। ये केवल आपका इलाज कर सकती है। लेकिन, आयुर्वेदिक परंपरा में योग से लेकर अष्टांग योग तक आपके शरीर को स्वस्थ रखने का मार्ग बताता है।
क्या ऐसा है कि डायग्नोस आमतौर पर ड्रग पर निर्भर है और आयुर्वेद होलिस्टक अप्रोच पर जाता है, ऐसा कह सकते हैं क्या?
बिल्कुल सही, एलोपैथी में होलिस्टिक अप्रोच कम है। एलोपैथी में इसीलिए हम एक ट्यूबलर विजन की बात करते हैं। जबकि, आयुर्वेद में हमेशा तत्वों के आधार पर शरीर में जो दोष है उसे पहचानते हैं और उसे ठीक करते हैं।
क्या सरकारें एलोपैथी की व्यवस्था को खड़ा करने में सरकारें विफल रहीं, ऐसा माना जा सकता है?
अगर हम इतिहास देखें तो आजादी के पहले जब ब्रिटिश सरकार रही उस दौरान एक कमिटी बनाई गई थी, जो भारत 1946 में आई थी ‘भोर कमिटी’ उसका हमें पालन करने की आवश्यकता है। हमें प्राइमरी स्वास्थ केंद्रों पर फोकस करने की आवश्यकता है, ताकि हम शुरुआत में ही बीमारियों का निदान कर पाएं। कोविड के दौरान जरूर सरकार ने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर सुविधाएं बढ़ाने की कोशिश की थी। इसके अलावा रिसर्च पर अधिक निवेश करने की भी जरूरत है।
क्या आपको लगता है कि आयुर्वेद में भी ऐसी रिसर्च की आवश्यकता है कि उसमें भी एलोपैथी की तरह ही प्रमाणिकता आ सके?
एलोपैथी में साइंस एडवांस है, उसका कारण ये है कि फार्मा लॉबी भी रिसर्च पर फोकस करती है। आयुर्वेद की प्रमाणिकता के लिए विगत 10-20 साल में अच्छी प्रगति हुई है। उदाहरण के तौर पर दिल्ली में ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट दिल्ली में 2017 में एक विभाग की स्थापना हुई है ‘सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड मेडिसिन रिसर्च’ में 2017 से अब तक 40,000 से अधिक मरीजों का रजिस्ट्रेशन हुआ है और इसके 35-40 शोध पत्र भी प्रकाशित किए गए। ये वो रिसर्च है, जिसे हमनें 400-500 साल पहले भुला दिया था। सरकार इस तरफ कदम बढ़ा रही है कि आयुर्वेद मुख्यधारा में रहे। साथ ही एलोपैथी की भी हम मदद लें।

















