राष्ट्रीय जनता दल (राजद) बिहार की राजनीति का एक मजबूत स्तंभ रहा है, जो लालू प्रसाद यादव की करिश्माई नेतृत्व और यादव समाज की एकजुटता पर टिका था। लेकिन हाल के वर्षों में पार्टी को जो नुकसान हुआ है, उसकी गहराई से समीक्षा करने की जरूरत है। 2024 के लोकसभा चुनावों में राजद की सीटें घटकर महज चार रह गईं, जबकि 2019 में यह आंकड़ा नौ था।
लालू यादव के परिवार में कलह तो उजागर हुई ही है विधानसभा स्तर पर भी पार्टी के गठबंधन की कमजोरी उजागर हुई। यह नुकसान सिर्फ चुनावी हार नहीं, बल्कि आंतरिक संरचनात्मक कमजोरियों, सांस्कृतिक दूरी और नेतृत्व की गलतियों का परिणाम है। पार्टी के शुभचिंतक इन मुद्दों को समझते हैं, लेकिन संजय यादव के बढ़ते प्रभाव के डर से तेजस्वी यादव के सामने बोल नहीं पाते। इस तरह की चर्चा है कि संजय अब इतने ताकतवर हो चुके हैं कि वे तेजप्रताप यादव को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा सकते हैं, तेजस्वी की कुर्सी हथिया सकते हैं, और यहां तक कि तेजस्वी की बहनों की आपत्तियों को दबा सकते हैं। बिहार की जनता जानती है कि राजद अब लालू की निगरानी में नहीं, बल्कि उनकी क्रिश्चियन बहू के साथ दहेज में हरियाणा से आए संजय यादव की देखरेख में चल रही है। यह अनदेखी सच्चाई पार्टी के पतन की जड़ है।
तेजप्रताप की अनदेखी पड़ी भारी
यादव समाज, जो राजद का कोर वोटबैंक है, सबसे ज्यादा आहत है। बिहार के ग्रामीण यादव परिवारों में परंपरा है कि बड़े भाई की जगह छोटे भाई को उत्तराधिकारी नहीं बनाया जाता। लालू प्रसाद के बड़े बेटे तेजप्रताप को दरकिनार कर तेजस्वी को नेता बनाने का फैसला समाज को अस्वीकार्य लगा। क्या यादवों का नेता क्लेम करने वाला परिवार इतनी बुनियादी परंपरा भी नहीं जानता? गांव-देहात में यादव परिवार आज भी गोत्र, कुल और वंश की मर्यादा निभाते हैं। तेजप्रताप को पार्टी से बाहर करने को यादव समाज ने तेजस्वी का षडयंत्र माना। यह न सिर्फ परिवारिक कलह का प्रतीक बना, बल्कि समाज में संदेश गया कि राजद नेतृत्व यादव परंपराओं से कट चुका है। नतीजा? 2024 चुनावों में मधुबनी, दरभंगा जैसे यादव बहुल इलाकों में वोटों का बिखराव हुआ, जहां जदयू और भाजपा ने सेंध लगाई।
लालू यादव ने राजनीति और समाज दोनों को साधा
एक और अनदेखी पीड़ा है परिवार में क्रिश्चियन बहू का आगमन। कथित प्रगतिशील इसे आधुनिकता कह सकते हैं, लेकिन ग्राउंड जीरो की हकीकत अलग है। लालू प्रसाद ने जब तक कमान संभाली, परिवार में एक भी शादी यादव समाज से बाहर नहीं होने दी। घर में बगावत हुई, लेकिन लालू अपनी राजनीति और समाज दोनों को समझते थे। उन्होंने सनातन परंपराओं का अपमान नहीं किया। मुख्यमंत्री रहते हवन कराया, माताजी की मृत्यु पर भोज करवाया, और छठ पूजा को राष्ट्रीय मीडिया का आकर्षण बनाया। यह सब यादव समाज की आस्था को मजबूत करता था।
लालू यादव के परिवार में अब तस्वीर बदल चुकी है
लेकिन अब तस्वीर बदल गई। तेजस्वी के परिवार में छठ नहीं मनता, जबकि लालू बच्चों के साथ हेलोवीन मनाते दिखते हैं। यह सांस्कृतिक विचलन यादव समाज को चुभता है। पार्टी की सेकुलर छवि के नाम पर सनातन को नजरअंदाज करना घातक साबित हुआ। चन्द्रशेखर यादव जैसे नेता मधेपुरा से सीट बचाने में सफल रहे, लेकिन उनके बयानों ने राजद को भारी नुकसान पहुंचाया। लालू की राजनीति कभी हिंदू परंपराओं के खिलाफ नहीं थी, बल्कि सामाजिक न्याय के साथ संतुलित थी। चन्द्रशेखर के विवादास्पद बयान सनातन विरोधी लगे, जिससे यादव वोटरों में असंतोष बढ़ा।
वरना राजद का भविष्य अंधकारमय
संक्षेप में, राजद का नुकसान संजय यादव के अंदरूनी वर्चस्व, परिवारिक परंपराओं की अनदेखी, सांस्कृतिक दूरी और नेतृत्व की अंधता से हुआ। यदि तेजस्वी इन अनदेखे मुद्दों पर ध्यान नहीं देंगे, तो पार्टी यादव समाज से और कट जाएगी। शुभचिंतकों को डर त्यागकर सच्चाई बोलनी होगी, वरना राजद का भविष्य अंधकारमय है।
परिवार में साफ दिख रही कलह
परिवार में भी कलह साफ दिख रही है। राजद नेता और लालू यादव की बेटी रोहिणी आचार्य ने यहां तक कह दिया कि मेरा कोई परिवार नहीं है। उन्होंने ही मुझे परिवार से निकाला है। उन्हें जिम्मेदारी नहीं लेनी है। सारी दुनिया सवाल कर रही है कि पार्टी का ऐसा हाल क्यों हुआ है?
















