बिरसा मुंडा: भारत के जनक्रांतिकारी, धरती आबा की आज भी उतनी ही जरूरत
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होम जनजातीय नायक

बिरसा मुंडा: भारत के जनक्रांतिकारी, धरती आबा की आज भी उतनी ही जरूरत

15 नवंबर 1875 में जन्मे बिरसा मुंडा ने अंग्रेजी मिशनरी स्कूलों में शिक्षा पाई और अंग्रेजों के वास्तविक उद्देश्यों को समझ गए कि वे केवल आर्थिक शोषण ही नहीं कर रहे बल्कि मतांतरण और सांस्कृतिक विस्थापन के माध्यम से भारत की आत्मा को भी गुलाम बना रहे हैं।

Written byदीपक द्विवेदीदीपक द्विवेदी — edited by Sudhir Kumar Pandey
Nov 14, 2025, 07:35 pm IST
inजनजातीय नायक
Birsamunda

भगवान बिरसा मुंडा

भारत का स्वतंत्रता संघर्ष का प्रारम्भ किसी बड़े शहर मुंबई, कोलकाता, दिल्ली आदि में नहीं हुआ और न ही किसी किसी विशिष्ट नेता द्वारा किया गया बल्कि यह जंगलों, पहाड़ों और जनजातीय धरती की मिट्टी में प्रारम्भ किया गया। वह भी महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन और सत्याग्रह की गूंज से पहले। जनजातीय समाज अपनी धरती के लिए, अपने सम्मान के लिए, अपनी स्वतंत्रता के लिए आगे बढ़े, उसके लिए ध्वजवाहक बने धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा। उन्होंने सशस्त्र क्रांति, सामाजिक सुधार और धार्मिक पुनर्जागरण को साथ लेकर कार्य किया।

औपनिवेशिक शोषण के विरुद्ध क्रांति

अंग्रेजों ने 1857 के बाद औपनिवेशिक शोषण के तहत झारखंड, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश आदि जनजाति समुदायों पर अधिकार करना शुरू कर दिया। वहां की सामूहिक कृषि खुदकट्टी व्यवस्था को नष्ट कर दिया। शोषणकारी जमींदारी प्रणाली लागू की, भूमि के अधिकार महाजनों और अंग्रेजी ठेकेदारों को दे दिए। कर, मतांतरण, महिला अत्याचार, सांस्कृतिक अलगाव कर जनजाति समाज को अंधकार में डाल दिया। ऐसे समय बिरसा मुंडा ने प्रकाश की मशाल जलाई।

अंग्रेजों की साजिश को समझा

15 नवंबर 1875 में जन्मे बिरसा मुंडा ने अंग्रेजी मिशनरी स्कूलों में शिक्षा पाई और अंग्रेजों के वास्तविक उद्देश्यों को समझ गए कि वे केवल आर्थिक शोषण ही नहीं कर रहे बल्कि मतांतरण और सांस्कृतिक विस्थापन के माध्यम से भारत की आत्मा को भी गुलाम बना रहे हैं। ऐसे समय 1890 के दशक में उन्होंने स्वाभिमान, स्वतंत्रता, संस्कृति के लिए लड़ने का आह्वान किया। उलगुलान आंदोलन से बिरसा मुंडा ने घोषणा की कि यह धरती हमारी है, कोई दिकू अर्थात बाहरी व्यक्ति इसे छीन नहीं सकता, विदेशी सत्ता को स्वीकार करना पाप है, इसलिए सबलोग कर देना बंद कर दें। अंग्रेजों की आज्ञा न मानें, यह गांधीवादी असहयोग का प्रारंभिक रूप है, जिसमें पूर्ण स्वतंत्रता की मांग भी थी और सशस्त्र क्रांति का आह्वान भी।

ब्रिटिश सरकार को झुकना पड़ा

बिरसा मुंडा का लक्ष्य केवल आर्थिक शोषण से मुक्ति नहीं वरन मुंडा राज्य की स्थापना करना था। बिरसा मुंडा को जेल में डाल दिया गया और 1897 में जेल से रिहा होने के बाद उन्होंने आंदोलन की घोषणा की। जनजातियों के पास कम संसाधन थे। बिरसा मुंडा ने कहा कि मैं अंग्रेजों की गोली को पानी में बदल दूंगा, 1899 में क्रिसमस की पूर्व संध्या पर 60000 से अधिक मुंडाओं ने अंग्रेजों और जमींदारों पर हमला कर दिया। अंग्रेजी फैक्ट्री , जमींदारों के घर , पुलिस चौकी , ठेकेदारों के घर जला दिए। इस विद्रोह ने छोटा नागपुर में राजनैतिक स्वतंत्रता का उद्घोष किया। हालांकि संख्या और संसाधन में कम होने के कारण अंग्रेजों ने इस विद्रोह को निर्दयता से कुचल दिया। हजारों मुंडा मारे गए, बिरसा मुंडा को रांची जेल में डाल दिया, जहां 19 जून 1900 में उनकी रहस्मयी परिस्थितियों में मृत्यु हो गई और वह धरती आबा जनजाति चेतना के पिता बन गए। 1908 में अंग्रेजी सरकार को जनजाति प्रतिरोध में झुकना पड़ा और छोटा नागपुर काश्तकारी अधिनियम पारित किया जिसने जनजातियों को भूमि अधिकार दिए।

जनजातीय समाज को अपनी जड़ों से जोड़ना

बिरसा मुंडा ने वैष्णव पंथ से प्रेरणा लेकर जनजातियों को मदिरा-मांस का त्याग करने, शुद्ध जीवन जीने, अंधविश्वास छोड़ने, सत्य का पालन करने और सिंगबोबा की पूजा करने के लिए कहा। ईश्वर सब के भीतर है अत : मतांतरण की कोई आवश्यकता नहीं। उन्होंने जनजाति समाज में आत्मविश्वास और एकता का बीज बोया और उन्हें भारतीय संस्कृति से जोड़ने का कार्य किया, लेकिन औपनिवेशिक इतिहासकारों ने उनके आंदोलन को स्थानीय एवं सीमित कहकर उपेक्षित कर दिया। कई जनजातीय नायक जैसे तिलका मांझी , सिद्धू -कान्हू , रघुनाथ शाह, शंकरशाह , अल्लारी सीताराम राजू आदि को राष्ट्रीय आंदोलन से पृथक कर दिया गया। इन्होंने स्वतंत्रता, स्वाभिमान, समानता का पाठ सबसे पहले सीखा और ये आजादी के प्रथम ध्वजवाहक बने। गांधी आंदोलन से भी पहले स्वतंत्रता, सामाजिक, समानता, आर्थिक न्याय की आवाज भगवान बिरसा मुंडा ने उठाई और जनसंगठन, आध्यात्मिक अनुशासन और आत्मनिर्भरता की जो राह दिखाई बाद में उस पर गांधी जी, विनोबा भावे और जयप्रकाश नारायण चले।

आज भी चाहिए उनकी विरासत और संदेश

आज हम 2025 में बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती मना रहे हैं, तो यह केवल ऐतिहासिक स्मृति का दिवस नहीं, आज बिरसा मुंडा की विरासत और उनके संदेशों को लोगों तक पहुंचाना है। आज जब हम पर्यावरण संकट, सांस्कृतिक संकट और आध्यात्मिक शून्यता की बात करते हैं तो बिरसा का संदेश और प्रासंगिक हो जाता है। आज जनजातीय समाज अनेक प्रकार के संकटों से जूझ रहा है, जैसे मतांतरण, उनकी पहचान का संकट, सांस्कृतिक संघर्ष, भूमि जिहाद, हम हिन्दू नहीं है आदि ये सारे मुद्दे उनकी जड़ों को कमजोर कर रहे हैं। आज आवश्यकता है भगवन बिरसा मुंडा की, जिन्होंने वैष्णव आधारित आध्यात्मिकता दिखाई। बिरसा मुंडा को जल जंगल जमीन का पहरेदार कहा जाता है, उन्होंने भारतीय संस्कृति में विश्वास किया।

जनजाति समाज को केंद्र में रखना होगा

मात्र 25 वर्ष के जीवन काल में बिरसा मुंडा जी ने जो उलगुलान प्रारंभ किया, वह आज भी हर क्षण अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करने और अपनी जड़ों अर्थात भारतीयता की रक्षा करने की एक प्रेरणा देता है। आज हमें इस 150 जयंती पर प्रण लेना चाहिए कि हम जनजाति समाज को केवल परिधि पर नहीं, बल्कि भारत के केंद्र में रखेंगे और उनकी संस्कृति उनकी भाषा का संरक्षण और संवर्धन करेंगे। इतिहास का पुनर्लेखन कर हम जनजातीय नायकों की राष्ट्रीय अंदोलन में भागीदारी और भारतीय संस्कृति में आस्था और हिन्दू प्रतीकों में उनकी श्रद्धा को आम जान तक लेकर जायेंगे , यही हमारी उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

 

Topics: बिरसा मुंडाबिरसा मुंडा जयंतीपाञ्चजन्य विशेषबिरसा मुंडा का जीवन परिचयबिरसा मुंडा कौन थे
दीपक द्विवेदी
दीपक द्विवेदी
सिविल सेवा विशेषज्ञ , इतिहास संकलन समिति, जनजाति कल्याण केंद्र। इतिहास , भारतीय ज्ञान परम्परा एवं विभिन्न विमर्श पर वैचारिक लेखन और उद्बोधन। [Read more]
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