हाल ही में राजस्थान के जयपुर के नीरजा मोदी स्कूल में नौ साल की छात्रा ने चौथी मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में चौथी कक्षा में पढ़ने वाली छात्रा को रेलिंग पर चढ़ते और गिरते हुए देखा गया। बच्ची के माता-पिता इंसाफ की लड़ाई लड़ रहे हैं। वहीं स्कूल प्रशासन की चुप्पी और सुरक्षा व्यवस्था पर कई सवाल खड़े हो रहे हैं। इसमें से एक सवाल यह भी है कि आखिर स्कूल प्रबंधन ऐसे मुद्दों को गंभीरता से क्यों नहीं ले रहे हैं? क्यों समय रहते बच्चों की समस्याओं को नहीं समझा जा रहा है, जिसकी वजह से वे गलत कदम उठाने को मजबूर हो रहे हैं।
समय रहते समझें बच्चों की मानसिक स्थिति
दरअसल, बच्ची ने रो-रोकर अपनी मां को बताया था कि वह स्कूल नहीं जाना चाहती, सब उसकी शिकायत कर देते हैं। उसे चिढ़ाते हैं। प्लीज मम्मी मेरा कहीं और एडमिशन करा दो। इस संबंध में बच्ची के माता-पिता ने उसकी टीचर को अवगत कराया था। उन्होंने बताया था कि कुछ बच्चे उनकी बेटी को चिढ़ाते हैं, उसका मजाक उड़ाते हैं। वह काफी समय से बच्चों द्वारा बोले गए गंदे शब्दों और बुलिंग से परेशान थी, लेकिन शिक्षकों ने इस मामले को गंभीरता से नहीं लिया। वह भी कई बार शिक्षकों के पास शिकायत लेकर जा चुकी थी, लेकिन हर बार नजरअंदाज किया गया। इस तरह के लापरवाह स्कूल की मान्यता रद्द होनी चाहिए, जो शिक्षा के मंदिर के अंदर एक बच्ची का रोना और उसकी उदासी को नहीं देख पाया। ऐसे स्कूलों को इतनी मोटी फीस भरने का कोई फायदा नहीं है।
महंगे स्कूल के बजाय बच्चों को सही मार्गदर्शन की जरूरत
वहीं, माता-पिता को इस बात पर विशेष ध्यान देना चाहिए कि बच्चों को अच्छे या महंगे स्कूल से ज्यादा उनकी सकारात्मक सोच, प्यार और सही मार्गदर्शन की जरूरत है। बच्चों का पहला सबसे बड़ा स्कूल उनका घर और उनके माता-पिता हैं। समय रहते बच्चों की मानसिक स्थिति को समझना बेहद जरूरी है। छोटी-छोटी उपलब्धियों पर उनकी तारीफ करें। उनकी कही गई हर बात को गंभीरता से लें। उनके सामने आने वाली कठिनाइयों के कारण जानने का प्रयास करें और उनका समाधान निकालें। इससे बच्चों का आत्मविश्वास बढ़ता है। बच्चों के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताएं। नौकरी, पैसा, स्टेट्स से पहले बच्चों को प्राथमिकता दें।
क्या कहता है कानून
वर्तमान कानून शिक्षकों को बच्चों के साथ शारीरिक दंड या दुर्व्यवहार की अनुमति नहीं देता। शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की धारा 17 के अनुसार किसी भी छात्र को शारीरिक दंड या मानसिक प्रताड़ना देना दंडनीय अपराध है। ऐसा करने वाले व्यक्ति के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई का प्रावधान है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार, बच्चों को सजा देने का कोई लाभ नहीं है, बल्कि यह उनके मानसिक और शारीरिक विकास पर गंभीर असर डालती है। शारीरिक दंड देने से बच्चों के व्यवहार, विकास और उनके स्वास्थ्य पर कोई सकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता। इसका फायदा न बच्चों को होता है न अभिभावकों को और न ही समाज को। ऐसे में स्कूलों के साथ-साथ अभिभावकों व समाज को मिलकर इस पर काम करना होगा, ताकि बच्चों को बिना शारीरिक दंड दिए जिम्मेदार और अनुशासित बनाया जा सके।

















