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बिहार चुनाव 2025 विश्लेषण: जनादेश, भरोसे की जीत और भ्रम की हार

सियासत की सबसे बड़ी परीक्षा में एनडीए अव्वल, महागठबंधन पस्त

Written byयोगेश कुमार गोयलयोगेश कुमार गोयल — edited by Sudhir Kumar Pandey
Nov 14, 2025, 04:22 pm IST
inभारत, बिहार
बिहार चुनाव, जंगलराज से सुशासन तक

बिहार चुनाव, जंगलराज से सुशासन तक

बिहार की राजनीति एक बार फिर उस मुकाम पर पहुंच गई है, जहां जनता ने अपनी पसंद स्पष्ट, निर्णायक और अभूतपूर्व तरीके से दर्ज करा दी है। 2025 के विधानसभा चुनाव परिणाम किसी सामान्य जनादेश की तरह नहीं बल्कि एक गहरा राजनीतिक संदेश हैं, जिसमें सुशासन बनाम अविश्वास, स्थिरता बनाम प्रयोग और सामाजिक सुरक्षा बनाम जातीय ध्रुवीकरण जैसी धारणाएं आमने-सामने थी। इस चुनाव ने साबित कर दिया कि बिहार का मतदाता भावनाओं की राजनीति से कहीं आगे निकल चुका है और उसके सामने केवल वही रास्ता स्वीकार्य है, जिसमें उसे विकास का भरोसा, सुरक्षा का विश्वास और जीवन स्तर में ठोस सुधार का आश्वासन मिले। इसी कसौटी पर परखा जाए तो यह जनादेश समझना कठिन नहीं कि एनडीए को ऐतिहासिक जीत क्यों मिली और महागठबंधन क्यों ध्वस्त हो गया।

बिहार की 243 सीटों वाली विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 122 है लेकिन एनडीए इस सीमा से बहुत ऊपर निकल गया जबकि महागठबंधन तमाम पूर्वानुमानों को भी नहीं छू सका। तेजस्वी यादव, जो खुद को दो वर्षों से भावी मुख्यमंत्री के रूप में पेश करते रहे, उन्हें जनता ने नकार दिया। यह केवल एक राजनीतिक हार नहीं बल्कि उस समूची रणनीति की पराजय है, जो जातीय समीकरणों और बिना आधार वाले चुनावी वादों पर आधारित थी। बिहार की जनता ने पूरी स्पष्टता से यह संदेश दिया है कि वह केवल घोषणाओं के आधार पर सत्ता नहीं सौंपती, उसे परिणाम चाहिए, भरोसा चाहिए और एक ऐसा नेतृत्व चाहिए, जो वर्षों से परखा हुआ है। 2020 के चुनाव परिणामों से महज कुछ हजार वोटों से पीछे रहने वाली आरजेडी को इस बार उम्मीद थी कि वह फिनिश लाइन पार कर लेगी लेकिन आरजेडी के लिए यह सपना ही रह गया।

महागठबंधन की आत्मघाती गलतियां

2025 के परिणामों में इतिहास दोहराने का कारण केवल एनडीए की नीतियां नहीं, महागठबंधन की आत्मघाती गलतियां भी रही। सबसे बड़ी चूक टिकट वितरण के स्तर पर दिखी। आरजेडी ने 144 सीटों में से 52 यादव प्रत्याशी उतारे, जो कुल टिकटों का करीब 36 प्रतिशत थे। यह संख्या 2020 में 40 थी, जो इस बार तेजस्वी यादव द्वारा अपने कोर वोट बैंक को और मजबूत करने की रणनीति के तहत बढ़ाई गई थी लेकिन यही रणनीति पार्टी को भारी नुकसान देकर गई। बिहार की राजनीति जहां जातिगत ढ़ांचे पर टिकी है, वहीं यादवों की आबादी केवल 14 प्रतिशत है। बाकी वोट (ईबीसी, महादलित, सवर्ण, युवा, महिलाएं, शहरी मतदाता और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग) इन्हीं से जीत-हार तय होती है। इतने अधिक यादव प्रत्याशी उतारने से जनता में संदेश गया कि आरजेडी सत्ता को फिर से एक जाति विशेष के हाथों में केंद्रित करना चाहती है। एनडीए ने इसे एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया और ‘यादव राज-भाग 2’ का नैरेटिव इतनी तीव्रता से चलाया कि यह शहर से गांव तक गूंज उठा।

तेजस्वी यादव की बड़ी चूक

इसके ठीक उलट समाजवादी राजनीति का एक अलग मॉडल उसी अवधि में उत्तर प्रदेश में दिखाई दिया था, जब अखिलेश यादव ने जातीय समीकरणों को संतुलित रखते हुए केवल 5 यादव प्रत्याशियों को टिकट दिया था और बड़े पैमाने पर ओबीसी, अति पिछड़े और सवर्ण मतदाताओं को आकर्षित किया था। तेजस्वी यादव इस रणनीति से सीख नहीं ले सके और आरजेडी की छवि को अनजाने में और अधिक यादव-केंद्रित बना बैठे, जिसका सीधा प्रभाव 10 से 15 प्रतिशत वोटों के नुकसान के रूप में दिखाई दिया। महागठबंधन की दूसरी घातक कमजोरी इसका बिखरा हुआ चरित्र था। कांग्रेस, वाम दलों और क्षेत्रीय सहयोगियों के बीच समन्वय पहले दिन से ही सवालों में रहा। तेजस्वी ने गठबंधन को साझेदारी की जगह अपना व्यक्तिगत मंच बना दिया, जहां सहयोगियों को बराबर महत्व नहीं दिया गया। सीट शेयरिंग में कांग्रेस के साथ कई विवाद हुए, वाम दलों को अपेक्षाकृत कमजोर सीटें दी गई और प्रचार अभियान में मुख्य चेहरा तेजस्वी ही रहे। रैलियों में सहयोगी दलों के नेताओं को पीछे धकेल दिया गया और महागठबंधन का घोषणापत्र भी ‘तेजस्वी प्रण’ के नाम से जारी किया गया, जो विपक्षी एकता की भावना को चोट पहुंचाता था।

कांग्रेस का मॉडल फेल

कांग्रेस गारंटी मॉडल पर काम कर रही थी, वाम दल मजदूर-कक्षा और कृषि संकट पर मुद्दे उठा रहे थे लेकिन तेजस्वी की राजनीति केवल नौकरियों के वादे तक सीमित रही। यह संकीर्ण दृष्टि महागठबंधन को एक समग्र विकल्प नहीं बनने दे पाई। एनडीए अपने प्रचार में एकजुट था जबकि महागठबंधन दिखावटी एकता का एक बिखरा हुआ मंच बनकर रह गया। तेजस्वी यादव की तीसरी बड़ी कमजोरी उनके वादों का अविश्वसनीय स्वरूप था। उन्होंने हर घर में सरकारी नौकरी, पेंशन, महिलाओं के लिए बड़े पैमाने पर आर्थिक सहायता, शराबबंदी की समीक्षा और सरकारी ढ़ांचे में व्यापक सुधार जैसे भारी-भरकम वादे किए लेकिन जब भी उनसे पूछा गया कि इन सबके लिए पैसे कहां से आएंगे, किस नियम के तहत भर्ती होगी, वित्तीय भार कितना होगा और इस योजना की समय सीमा क्या होगी तो उनके पास कोई जवाब नहीं था। हर रैली में वे कहते रहे कि दो दिन में ब्लूप्रिंट आ जाएगा लेकिन चुनाव परिणाम आने तक भी वह ब्लूप्रिंट नहीं आया। इसने उनकी विश्वसनीयता को गहरा आघात पहुंचाया, विशेष रूप से युवाओं और शहरी मध्यम वर्ग में, जो आज की तारीख में वादों से अधिक योजनाओं की व्यवहारिकता पर विश्वास करते हैं।

मुस्लिमपरस्त छवि ने महागठबंधन को किया ध्वस्त

महागठबंधन की मुस्लिमपरस्त छवि भी इस चुनाव में उसके लिए एक बड़ा संकट बन गई। मुस्लिम बहुल सीटों पर आरजेडी को लाभ मिलना स्वाभाविक था लेकिन यह छवि पूरे राज्य में विपरीत प्रभाव छोड़ती रही। तेजस्वी द्वारा वक्फ बिल को लागू न करने का वादा और कई सीटों पर मुस्लिम समुदाय को लुभाने के स्पष्ट प्रयासों ने यादवों के भीतर भी एक असहजता पैदा की। एनडीए ने इस छवि को और तीखा करते हुए लालू यादव के संसद में वक्फ बिल पर दिए भाषणों को वायरल किया। परिणाम यह हुआ कि गैर-मुस्लिम और गैर-यादव वोटों की भारी संख्या महागठबंधन से कटकर एनडीए की ओर चली गई। तेजस्वी यादव की सबसे उलझी हुई रणनीति उनके पिता लालू प्रसाद यादव को लेकर रही। लालू सामाजिक न्याय की राजनीति के सबसे बड़े चेहरे हैं लेकिन उनके शासनकाल की ‘जंगलराज’ की छवि आज भी बिहार के बड़े तबके में गहरी है। तेजस्वी ने लालू की विरासत को अपनाया भी और छिपाया भी, दोनों रास्तों पर कदम रखा और दोनों में असफल हुए। उन्होंने लालू की तस्वीरें अपने पोस्टरों में छोटी कर दी लेकिन रैलियों में उनके नाम पर राजनीति भी की। यह दोहरी नीति मतदाताओं को भ्रमित करती रही। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गोपालगंज की रैली में सीधे कहा कि तेजस्वी अपने पिता के पाप छिपा रहे हैं और यह बयान लोगों के बीच गूंज उठा क्योंकि दृश्य राजनीति में संदेश का महत्व सबसे अधिक होता है।

एनडीए का मजबूत रिकॉर्ड

इधर एनडीए ने अपने मजबूत शासन रिकॉर्ड और सामाजिक सुरक्षा की योजनाओं की बदौलत एक व्यापक गठबंधन खड़ा किया। नीतीश कुमार ने 2006 में लड़कियों के लिए साइकिल योजना शुरू की थी, जिसने बिहार में महिला शिक्षा का परिदृश्य बदल दिया। आज भी गांवों में स्कूल जाती लड़कियों की साइकिलों की कतारें उसी बदलाव की जीवंत तस्वीर पेश करती हैं। इसके बाद किताब-धन, पोशाक-धन, छात्रवृत्ति, स्कूली भोजन और महिला स्वयं सहायता समूहों को आर्थिक सहायता, इन सबने महिला मतदाताओं को एनडीए के प्रति एक स्थायी विश्वास दिया। 2025 के चुनाव में महिलाओं ने पुरुषों से 9 प्रतिशत अधिक मतदान किया। यह आंकड़ा बताता है कि महिला मतदाता सिर्फ निष्क्रिय दर्शक नहीं बल्कि बिहार की राजनीति की निर्णायक शक्ति बन चुकी हैं।

जीविका दीदियों का विश्वास

जीविका दीदियों का नेटवर्क, जिसमें एक करोड़ से अधिक महिलाएं जुड़ी हैं, ग्रामीण अर्थव्यवस्था में एक क्रांति की तरह उभरा है। 10,000 रुपए की सहायता राशि और उद्यम बढ़ाने पर 2 लाख तक की मदद ने महिलाओं को आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनाया और सरकार के प्रति गहरा विश्वास पैदा किया। दलित और अति पिछड़ी महिलाओं ने भी इस चुनाव में बड़े पैमाने पर एनडीए का समर्थन किया। यह समर्थन महागठबंधन के लिए किसी भी समीकरण को ध्वस्त करने के लिए पर्याप्त था।

नीतीश ने जंगलराज से दिलाई मुक्ति

सबसे निर्णायक बात कानून-व्यवस्था रही। बिहार वह राज्य है, जहां 2005 से पहले सुरक्षा व्यवस्था का हाल किसी से छिपा नहीं था। नीतीश कुमार के शासन में अपराध में आई भारी कमी, शहरों का सुधरा पर्यावरण, ग्रामीण इलाकों में बेहतर सुरक्षा और सड़कों का व्यापक विकास, इन सबने बिहार की जनता के मन में सुशासन का जो भाव पैदा किया, वह आज भी उतना ही मजबूत है। एनडीए ने हर मंच पर इसे प्रभावी ढ़ंग से प्रस्तुत किया और जनता ने इसे स्वीकार भी किया। यह चुनाव इस बात का आखिरी सबक भी है कि लोकतंत्र में केवल मुद्दे नहीं बल्कि नेतृत्व की विश्वसनीयता मायने रखती है। तेजस्वी यादव उत्साही हैं, युवा हैं, जोशीला भाषण देते हैं लेकिन जनता उन्हें अभी भी लंबे, कठिन और जटिल शासन की जिम्मेदारी देने को तैयार नहीं दिखती। उनके वादों में दम नहीं, उनकी रणनीति में परिपक्वता नहीं और उनके गठबंधन में सामंजस्य नहीं, यह तीनों बातें मिलकर महागठबंधन की नाव को डुबो गई।

भरोसेमंद नेता को चुनती है जनता

कुल मिलाकर, बिहार के चुनाव परिणाम बताते हैं कि राजनीति अब न स्लोगन से चलती है, न केवल जाति के समीकरण से। जनता अब उन नेताओं को चुनती है, जिन पर भरोसा हो, जिनकी नीतियां उनकी जिंदगी पर वास्तविक प्रभाव डालती हों और जो समय की कसौटी पर खरे उतरे हों। एनडीए ने यह भरोसा कमाया, महागठबंधन इसे खो बैठा। यह जनादेश केवल एनडीए की जीत नहीं बल्कि बिहार की राजनीतिक परिपक्वता का प्रमाण है, जहां जनता ने स्थिरता को प्रयोग पर, सुशासन को वादों पर और विश्वास को प्रचार पर प्राथमिकता दी।

 

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