दिल्ली में हाल ही के ब्लास्ट ने सबको हिला दिया है। जांच चल रही है, और सरकार ने भी इसे आतंकवादी हमला मान लिया है। लेकिन कांग्रेस और समाजवादी पार्टी का तुष्टिकरण वाला प्रेम छूट ही नहीं रहा है। इसी क्रम में महाराष्ट्र के समाजवादी पार्टी के विधायक अबू आजमी और पूर्व गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने आतंकवाद की वजह पर सवाल उठाए। दोनों ने ही इन्हें पीड़ित और भटका हुआ करार देते हुए परिस्थितियों का शिकार करार दे दिया है। चिदंबरम ने तो सोशल मीडिया पर लंबा पोस्ट लिखा। लेकिन जम्मू-कश्मीर के एक पुलिस अफसर ने दो टूक जवाब दिया कि आतंकवाद अन्याय से नहीं, बल्कि धार्मिक कट्टरता और ब्रेनवॉशिंग से पैदा होता है। ये मानसिक समस्या है, और इसे पीड़ित मान लेना हमारी बड़ी गलती है। सोशल मीडिया पर ये बहस तेज हो गई, और अफसर का जवाब लोगों को सही लग रहा है।
अबू आजमी और चिदंबरम का बयान
अबू आजमी ने लखनऊ में प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि चुनाव के समय ऐसी घटनाएं होती हैं, जांच होनी चाहिए। जो लोग इसमें शामिल हैं, उन्हें जल्दी पकड़कर सजा देनी चाहिए, जैसे मुंबई ट्रेन ब्लास्ट में निर्दोष पकड़े गए थे, वैसा न हो। उनका मानना है कि जुल्म और नाइंसाफी से ही आतंकवाद जन्म लेता है। दिल्ली ब्लास्ट सरकार की नाकामी दिखाता है।
वही चिदंबरम ने इसे आगे बढ़ाया। उन्होंने लिखा कि आतंकवादी दो तरह के होते हैं – बाहर से घुसपैठिए और घर में ही पैदा हुए। यूपीए के समय संसद में उन्होंने ‘होम-ग्राउन टेररिस्ट’ का जिक्र किया था, तो लोग हंसते थे। लेकिन सरकार जानती है कि ये सच है। उन्होंने पूछा कि ऐसी कौन सी परिस्थितियां हैं जो पढ़े-लिखे भारतीयों को आतंक की राह पर धकेल देती हैं। ये सवाल कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के गठबंधन को सूट करता है, भले इत्तफाक हो।
जम्मू कश्मीर के एसपी ने चिदंबरम को दिया जवाब
चिदंबरम को एक एसपी प्रणव महाजन ने बहुत ही सधे तरीके से जवाब दिया। उन्होंने कहा, “सर, जब भी कोई भारतीय अपराध या आतंक की राह चुनता है, हम रक्षात्मक हो जाते हैं। मानो देश ने उसके साथ गलत किया हो। ये अपराध-बोध हमारी कमजोरी है।ये समस्या सिर्फ भारत की नहीं। मिडिल ईस्ट, यूरोप, अमेरिका में भी अमीर-गरीब, पढ़े-लिखे लोग आतंक की ओर मुड़ जाते हैं। ओसामा बिन लादेन हो या लंदन-ब्रसेल्स के हमलावर, ये गरीबी या उपेक्षा के शिकार नहीं थे। ये जहरीली विचारधाराओं और धार्मिक ब्रेनवॉशिंग के शिकार थे। शिक्षा या पैसा कट्टरता से बचाव की गारंटी नहीं। कई बार तो ये उन्हें और खतरनाक बना देते हैं।”
Sir,
With due respect, every time such a debate comes up, we seem to slip into a defensive tone; as if whenever a Bharatiya citizen turns to crime or terror, the fault must somehow lie with our great nation or its system. As if the nation failed them. This guilt-ridden narrative…
— Pranav Mahajan (@pranavmahajan) November 12, 2025
असल सवाल ये है कि कौन सी ब्रेनवॉशिंग इंसानों को निर्दोषों की हत्या का यकीन दिला देती है? कौन सी सोच नफरत को राष्ट्रभक्ति से ऊपर रख देती है? जब तक हम धार्मिक आतंकवाद, उसके फंडिंग नेटवर्क और वैचारिक जड़ों का सामना नहीं करेंगे, हम खुद को दोष देते रहेंगे। ये नेटवर्क संगठित है, अंतरराष्ट्रीय है।
हर बार समाज पर सवाल उठाने के बजाय सोचना चाहिए कि कट्टरपंथ एक ही वैचारिक गड्ढे से क्यों बार-बार निकलता है। आतंकवाद गरीबी या भेदभाव से नहीं, नफरत, ब्रेनवॉशिंग और धार्मिक विकृति से जन्म लेता है। ये अन्याय का नतीजा नहीं, मानसिक रोग है। और ये तब फैलता है जब हम उन्माद को पीड़ित भाव से देखते हैं।

















