विश्व के सबसे बड़े और महत्वपूर्ण वर्षावन क्षेत्र अमेजन में 10 नवंबर, 2025 से विश्व जलवायु सम्मेलन ‘COP-30’ प्रारंभ हो गया है। अमेजन नदी के मुहाने पर स्थित ब्राजील के बेलम शहर में 21 नवंबर तक चलने वाला यह सम्मेलन संयुक्त राष्ट्र के फ्रेमवर्क फॉर क्लाइमेट चेंज (यूएनएफसीसी) के अंतर्गत होने वाला 30वां कांफ्रेंस ऑफ पार्टीज (Cop) है, जिसमें 198 देश सहभागी हैं।
अमेजन को पृथ्वी का ‘फेफड़ा’ कहा जाता है। एक अनुमान के अनुसार, ऑस्ट्रेलिया के लगभग बराबर क्षेत्रफल वाला यह भूभाग अपनी मिट्टी और वृक्षों में विशाल मात्रा में कार्बन संचित कर वैश्विक तापमान को संतुलित रखता है। किंतु अब तक इसके 20 से 30 प्रतिशत हिस्से में वन क्षरण हो चुका है। ऐसे में अमेजन की भूमि पर इस वर्ष का कोप सम्मेलन के आयोजन से यह प्रश्न उठता है कि क्या मानव सभ्यता का विकास मॉडल अब भी प्रकृति के शोषण, तकनीकी केंद्रीकरण और अत्यधिक उपभोग पर आधारित रहेगा या फिर कोई नया, संतुलित समाधान संभव है?
यह सम्मेलन विशेष रूप से ऐतिहासिक है, क्योंकि यह पेरिस समझौते (कोप‑21, 2015) की दशकीय वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित हो रहा है। वह समझौता 2016 में लागू हुआ था, जब 196 देशों ने यह संकल्प लिया था कि पृथ्वी के औसत तापमान में वृद्धि पूर्व‑औद्योगिक काल (1850–1900) की तुलना में 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक न हो और किसी भी स्थिति में 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे रहे। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सभी देशों ने मिलकर कार्य करने का वचन दिया था। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए तय किया गया कि प्रत्येक देश अपने ‘एनडीसी’ (नेशनली डेटरमिंड कॉन्ट्रिब्यूशन्स) निर्धारित करेगा, जिसमें यह स्पष्ट होगा कि वह अपने कार्बन तथा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कितनी सीमा तक घटाएगा और नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को कैसे प्रोत्साहित करेगा। यह सिद्धांत ‘साझा लेकिन विभेदित जिम्मेदारी’ के रूप में जाना जाता है। एनडीसी की समीक्षा और अद्यतन प्रत्येक पांच वर्ष में किया जाता है। इस सम्मेलन में सहभागी देश अपने एनडीसी का तीसरा संस्करण प्रस्तुत कर रहे हैं, जिससे यह मूल्यांकन किया जा सकेगा कि पिछले दस वर्ष में वास्तविक प्रगति कितनी हुई है और क्या मानवता तापमान वृद्धि की गति को थामने में सफल रही है?
इस संदर्भ में भारत ने अपने एनडीसी लक्ष्यों को निर्धारित समय से पहले ही पूरा कर लिया है। 2014 में जहां सौर ऊर्जा की स्थापित क्षमता मात्र 2.82 गीगावाट थी, वह जून 2025 तक बढ़कर 116.25 गीगावाट हो गई है। अर्थात् भारत ने सौर ऊर्जा उत्पादन में 41 गुना वृद्धि की है। 2005 से 2020 के बीच भारत ने उत्सर्जन तीव्रता में 36 प्रतिशत की कमी हासिल की है। साथ ही, अपनी कुल विद्युत क्षमता का 50 प्रतिशत गैर‑परंपरागत ऊर्जा स्रोतों से प्राप्त करने का लक्ष्य भी 2030 से पांच वर्ष पहले ही पूरा कर लिया गया है। भारत की ये उपलब्धियां केवल तकनीकी प्रगति का परिणाम नहीं, बल्कि देश के सामूहिक संकल्प और पर्यावरणीय प्रतिबद्धता की सशक्त अभिव्यक्ति हैं। उल्लेखनीय है कि भारत आज विश्व के उन देशों में शामिल है, जिनका प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन सबसे कम है।
पेरिस समझौते और एनडीसी जैसे वैश्विक प्रयासों के बावजूद जलवायु परिवर्तन की स्थिति और इसके परिणाम अत्यंत चिंताजनक हैं। विश्व मौसम विज्ञान संगठन के अनुसार, पिछले दस वर्ष में पृथ्वी के औसत तापमान में लगभग 1 से 1.2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि दर्ज की गई है। 2024 मानव इतिहास के पिछले 175 वर्षों का सबसे गर्म वर्ष रहा, जब औसत सतही तापमान पूर्व‑औद्योगिक स्तर से लगभग 1.55 डिग्री अधिक था। समुद्र तल मंत वृद्धि की गति भी चिंताजनक है। जहां पिछले तीन दशकों के दौरान इसका औसत स्तर 3.4 मिमी प्रति वर्ष बढ़ रहा था, वहीं 2024 में यह दर बढ़कर 5.9 मिमी प्रतिवर्ष हो गई। चरम मौसम घटनाओं जैसे-बाढ़, सूखा, तूफान, वनाग्नि और भूस्खलन की आवृत्ति और तीव्रता, दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। साथ ही, विश्व के ग्लेशियर भी तेजी से पिघलते जा रहे हैं।
पेरिस समझौते में यह प्रावधान भी किया गया था कि विकसित देश विकासशील देशों की जलवायु अनुकूलन परियोजनाओं के लिए 2020 तक प्रति वर्ष 100 अरब डॉलर की वित्तीय सहायता प्रदान करेंगे। किंतु अब तक यह लक्ष्य पूर्ण रूप से हासिल नहीं हो सका है। पिछले वर्ष बाकू में आयोजित कोप‑29 सम्मेलन में उम्मीद जताई गई थी कि इस सहायता राशि को बढ़ाकर 1.3 खरब डॉलर किया जाएगा। परंतु लंबी चर्चाओं और विवादों के बाद अंततः केवल 300 अरब डॉलर पर ही सहमति बन सकी। भारत सहित ग्लोबल साउथ के देशों ने इस स्थिति पर निराशा प्रकट करते हुए कोप के मंच पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई।
जलवायु विमर्श की पुनर्परिभाषा : समय की पुकार
यदि 1992 के रियो डी जेनेरियो पृथ्वी सम्मेलन से अब तक की यात्रा पर दृष्टि डाली जाए, तो यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि पिछले तीन दशकों और तीस सम्मेलनों के बावजूद वैश्विक जलवायु की स्थिति में अपेक्षित सुधार क्यों नहीं हो सका? यह विचार भी उतना ही प्रासंगिक है कि क्या कोप सम्मेलन अब केवल विचारों के आदर्शवाद और ग्रीन टेक्नोलॉजी के बाजार तक सीमित होकर रह गए हैं?
समय आ गया है कि कोप सम्मेलन केवल आदर्श प्रतिज्ञाओं के घोषणापत्र का मंच न रह जाए, बल्कि जलवायु शांति और सामूहिक समाधान का मार्ग प्रशस्त करे। यह तभी संभव होगा, जब व्यक्तिगत से लेकर वैश्विक स्तर तक विमर्श और व्यवहार, दोनों को प्रकृति‑केंद्रित दृष्टिकोण से जोड़ा जाए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोप‑26 (ग्लासगो, 2021) में ‘LiFE–Lifestyle for Environment’ अर्थात् पर्यावरण के लिए जीवनशैली का विचार प्रस्तुत किया था, जो तकनीकी समाधान से अधिक जीवनशैली आधारित पहल है। इसके बाद 2023 में जी‑20 सम्मेलन के अवसर पर उन्होंने ‘One Earth, One Family, One Future’ अर्थात् ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की अवधारणा रखकर वैश्विक चेतना को जलवायु सुधार से जोड़ने का सशक्त संदेश दिया था। इस पृष्ठभूमि में बेलम में चल रहे कोप-30 से लेकर भारत में होने वाले कोप-33 तक विश्व समुदाय को कुछ दिशासूचक सुझावों पर विचार करना चाहिए, जैसे-
जलवायु अनुकूलन नहीं, जलवायु शांति की आवश्यकता
जलवायु समाधान केवल तकनीकी नहीं, बल्कि सामाजिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक भी हैं। भारतीय चिंतन में पंचमहाभूत (पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु और आकाश) के परस्पर संतुलन और सौहार्दपूर्ण संबंध पर सदैव बल दिया गया है। यही संतुलन जलवायु संकट का वास्तविक समाधान प्रदान कर सकता है। इस परिप्रेक्ष्य में यजुर्वेद की शांति प्रार्थना ‘ॐ द्यौः शांतिरन्तरिक्षं शान्तिः, पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः, वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवा: शांन्तिर्ब्रह्म शान्तिः, सर्वं शान्तिः, शांतिरेव शान्तिः’ केवल एक आध्यात्मिक स्तोत्र नहीं, बल्कि जलवायु शांति का सिद्धांत है। यदि विकास और नीतियां पंचमहाभूतों के संतुलन और उनसे प्रेरित शांति को सुनिश्चित करने वाली हों, तो मानव अस्तित्व और पर्यावरण दोनों सुरक्षित रह सकते हैं। इसीलिए इसे ‘जलवायु शांति प्रार्थना’ की मान्यता दी जानी चाहिए।
ग्रीन नहीं, हरित सोच की आवश्यकता
कथित ‘ग्रीन’ की अवधारणा मुख्य रूप से तकनीक और उपभोग पर आधारित है, जबकि ‘हरित’ सोच जीवन‑केंद्रित और बचत‑परक दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। पर्यावरण संरक्षण गतिविधि ने ‘हरित’ को Holistic Actions for Revitalization of Indigenous Traditions (HARIT) के रूप में परिभाषित किया है, अर्थात् पर्यावरण और जलवायु की रक्षा हेतु देशज परंपराओं के पुनर्स्थापन और संवर्धन के समग्र प्रयास। ‘हरित’ को केवल ‘ग्रीन’ का हिंदी पर्याय नहीं माना जा सकता। ‘ग्रीन’ का सिद्धांत ऊर्जा और संसाधनों के विकल्पों की खोज पर केंद्रित है, जबकि ‘हरित’ यह सिखाता है कि ऊर्जा सहित सभी संसाधनों का कम प्रयोग किया जाए, उनका संरक्षण और सदुपयोग किया जाए। इस दृष्टि से ग्रीन सोच उपभोग‑केंद्रित है, जबकि हरित सोच सह‑अस्तित्व और योग‑केंद्रित है।
‘ग्रीन’ में जहां ‘greed’ (लालच) का भाव निहित है, वहीं ‘हरित’ में ‘हरि’ अर्थात् सृजन, संतुलन और ईश्वर का भाव समाहित है। ‘ग्रीन’ दृष्टिकोण भौतिक संपदा के निर्माण की ओर ले जाता है, जबकि ‘हरित’ विचार जीवन‑मूल्यों के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करता है। अंततः ‘ग्रीन’ जहां ‘सर्कुलर इकोनॉमी’ तक सीमित है, वहीं ‘हरित’ ‘सर्कुलर इकोलॉजी’ की ओर संकेत करता है, जिसमें केवल आर्थिक नहीं, बल्कि पारिस्थितिक संतुलन को भी विकास का मूल आधार माना गया है।
वित्त‑केंद्रित नहीं, चित्त‑केंद्रित कोप की आवश्यकता
अब समय आ गया है कि जलवायु विमर्श का केंद्र धन या वित्त नहीं, बल्कि चित्त यानी मन, बुद्धि और चेतना बने। जब प्रत्येक व्यक्ति की चेतना में प्रकृति के प्रति संवेदना और उत्तरदायित्व का भाव जाग्रत होगा, तभी नागरिक स्तर पर आरंभ होने वाले छोटे‑छोटे प्रयास सामूहिक रूप से एक बड़ा परिवर्तन ला सकेंगे। चेतना परिवर्तन के बिना वास्तविक जलवायु परिवर्तन संभव नहीं है।
एनडीसी का विस्तार : ऊर्जा से जीवनशैली तक
अब समय है कि एनडीसी को केवल ऊर्जा‑सुधारों तक सीमित न रखा जाए, बल्कि इसमें उत्पादन, उपभोग और जीवनशैली परिवर्तन को भी समग्र रूप से शामिल किया जाए। यदि वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री तक सीमित रखना है, तो इसे केवल औद्योगिक रणनीति का लक्ष्य न मानकर एक सामाजिक और नैतिक प्रतिज्ञा के रूप में स्वीकार करना होगा। इस दिशा में एनडीसी में चार नए लक्ष्यों को जोड़ा जाना चाहिए-
खाद्य अपशिष्ट में कमी : विभिन्न शोध रिपोर्टों के अनुसार, विश्व में हर वर्ष लगभग 1.05 अरब टन खाद्य पदार्थ नष्ट हो जाते हैं, जो वैश्विक खाद्य उत्पादन का लगभग 19 प्रतिशत और कुल उत्सर्जन का 8 से 10 प्रतिशत तक योगदान करते हैं। यदि 2030 तक इस अपशिष्ट को 50 प्रतिशत तक घटाने का लक्ष्य एनडीसी में शामिल किया जाए, तो अनुमानतः 200 गीगाटन कार्बन डाइऑक्साइड समकक्ष उत्सर्जन की बचत संभव हो सकती है।
वेटलैंड पुनर्स्थापन : पिछले 300 वर्षों में विश्व के लगभग 35 प्रतिशत वेटलैंड नष्ट हो चुके हैं। भारत में भी लगभग एक‑तिहाई वेटलैंड क्षेत्र अतिक्रमण, प्रदूषण और अव्यवस्थित शहरीकरण के कारण ख़तरे में हैं। वेटलैंड न केवल प्रभावी कार्बन सिंक हैं, बल्कि बाढ़ नियंत्रण, भू-जल पुनर्भरण और जैव-विविधता संरक्षण के आधार स्तंभ भी हैं। यदि आगामी पांच वर्ष में वैश्विक स्तर पर 50 प्रतिशत वेटलैंड पुनर्स्थापन का लक्ष्य निर्धारित किया जाए, तो यह जलवायु शमन की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम सिद्ध होगा।
श्री अन्न का संवर्धन : वैश्विक कुल उत्सर्जन का लगभग 31 प्रतिशत हिस्सा खाद्य प्रणाली से उत्पन्न होता है। धान और गेहूं की तुलना में मिलेट्स (श्री अन्न) उत्पादन 70 प्रतिशत कम पानी और ऊर्जा में होता है। इस संदर्भ में 2030 तक कुल अनाज उपभोग में मिलेट्स की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत तक बढ़ाने का लक्ष्य निर्धारित किया जा सकता है। यह पहल कृषि‑जनित उत्सर्जन में 25 से 30 प्रतिशत तक कमी लाने के साथ‑साथ पोषण सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था, दोनों को सशक्त बनाएगी।
पर्यावरण‑अनुकूल वस्त्र उद्योग : वस्त्र उद्योग वैश्विक स्तर पर कुल उत्सर्जन का लगभग 10 प्रतिशत और जल‑अपशिष्ट का 20 प्रतिशत उत्पन्न करता है। हर वर्ष करीब 92 मिलियन टन वस्त्र‑कचरा तैयार होता है। यदि 2030 तक इस क्षेत्र से उत्सर्जन में 50 प्रतिशत कमी का लक्ष्य निर्धारित किया जाए, तो यह जलवायु शमन की दिशा में एक बड़ा कदम होगा। यह लक्ष्य सस्टेनेबल और पुनर्चक्रित वस्त्रों को प्रोत्साहन देने, कम खरीदें, अधिक उपयोग करें जैसी जीवनशैली को बढ़ावा देने तथा खादी, रेशम, जूट और बांस जैसे प्राकृतिक तंतुओं के व्यापक उपयोग से प्राप्त किया जा सकता है। भारत जिस प्रकार ‘श्री अन्न’ के माध्यम से पौष्टिकता और स्थिरता का संदेश दे रहा है, उसी प्रकार ‘श्री वस्त्र’ की अवधारणा द्वारा पर्यावरण अनुकूल वस्त्र क्रांति का वैश्विक नेतृत्व कर सकता है।
सार रूप में कहा जा सकता है कि कोप‑30 से लेकर भारत में प्रस्तावित 33वें जलवायु सम्मेलन तक का समय वैश्विक जलवायु विमर्श के पुनर्जागरण का एक महत्वपूर्ण अवसर है। यदि ये सम्मेलन केवल तकनीकी और वित्तीय चर्चाओं तक सीमित न रहकर मानवीय चेतना, जीवनशैली, स्वदेशी संस्कृति, परंपराओं और नागरिक कर्तव्यों को जलवायु समाधान तथा जलवायु शांति का आधार बनाते हैं, तो निश्चय ही यह धरती माता की सुरक्षा और सम्मान के साथ मानव समाज के उज्ज्वल भविष्य की दिशा में निर्णायक कदम सिद्ध होगा। ‘पंच परिवर्तन’ के इन पांच सूत्रों को अपनाकर प्रत्येक नागरिक इस वैश्विक प्रयास में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
















