वंदे मातरम्@150 : राष्ट्र वंदना का गीत
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वंदे मातरम्@150 : राष्ट्र वंदना का गीत

बंकिमचंद्र चटर्जी द्वारा लिखित ‘वंदे मातरम्’ केवल एक गीत नहीं, राष्ट्र की आत्मा का प्रतीक है। इसने भारत को मातृशक्ति के रूप में देखने की प्राचीन सोच को पुनर्जीवित किया और गुलाम भारत में भक्ति से जन्मे विद्रोह को स्वर दिया सोमेश्वर बराल

Written byसोमेश्वर बरालसोमेश्वर बराल
Nov 12, 2025, 08:32 am IST
inभारत, विश्लेषण
1907 में जर्मनी के स्टटगार्ड में मैडम भीकाजी कामा द्वारा कुछ इस तरह का ध्वज फहराया गया था

1907 में जर्मनी के स्टटगार्ड में मैडम भीकाजी कामा द्वारा कुछ इस तरह का ध्वज फहराया गया था

वंदे मातरम्, जिसका अर्थ है- मां मैं तुम्हें नमन करता हूं। साहित्य सम्राट बंकिमचंद्र चटर्जी ने इस गीत के माध्यम से भारत माता के दिव्य सार को अभिव्यक्त किया था। तब से इस गीत के पहले दो शब्द ‘वंदे मातरम्’ मंत्र की तरह गाए जाते हैं।

‘वंदे मातरम्’ गीत सर्वप्रथम 1876 में ‘बंग दर्शन’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ था। प्रकाशन के बाद से ‘वंदे मातरम्’ देशभक्त भारतीयों की आत्मा का मंत्र बन गया। स्वयं ऋ षि बंकिमचंद्र ने इसके बारे में कहा था, ‘‘अभी आपको इस गीत का अर्थ समझ में नहीं आएगा, लेकिन 25 या 30 वर्षों के बाद आप देखेंगे कि पूरा देश इससे भावविभोर हो गया है। ‘वंदे मातरम्’ पूरे देश में देशभक्ति की अग्नि प्रज्वलित करेगा।’’ 28 अक्तूबर, 1916 को रवींद्रनाथ ठाकुर ने अपने पुत्र रथींद्रनाथ को एक पत्र में लिखा था, ‘‘हमारा ‘वंदे मातरम्’ मंत्र बांग्लादेश की पूजा का मंत्र नहीं है, यह धरती माता की पूजा है। यदि हम आज उस पूजा गीत का जाप करें, तो आने वाले युग में यह मंत्र एक-एक करके सभी देशों में सुनाई देगा।’’ क्रांतिकारी हेमचंद्र गुहा के शब्दों में, ‘‘उस समय कोई भी ‘वंदे मातरम्’ गीत में निहित शक्ति और भावना को नहीं समझ सका।’’

1896 से 1922 तक, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सभी अधिवेशनों में ‘वंदे मातरम्’ गीत गाया जाता था। लेकिन 1922 में आंध्र प्रदेश के काकीनाडा कांग्रेस अधिवेशन में जब महान गायक पं. विष्णु दिगंबर पलुस्कर ने ‘वंदे मातरम्’ गाना शुरू किया, तो सत्र अध्यक्ष मुहम्मद अली ने आपत्ति जताई। उनकी आपत्ति का कारण यह था कि गीत में हिंदू धार्मिक भावना अधिक थी। इसलिए मुसलमानों के लिए यह गीत गाना संभव नहीं था। कांग्रेस ने मुहम्मद अली की राय को पूरे मुस्लिम समुदाय की राय मानना शुरू कर दिया। 1937 में कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में ‘वंदे मातरम्’ के ‘आपत्तिजनक हिस्से’ को हटा दिया गया। उस दिन रामानंद चट्टोपाध्याय ने चेतावनी दी, ‘यदि यह गीत विभाजित होता है, तो देश भी विभाजित हो जाएगा।’ लेकिन आजादी के बाद भी ‘वंदे मातरम्’ के महत्व को कम करने का प्रयास जारी रहा।

1907 में जर्मनी के स्टटगार्ड में मैडम भीकाजी कामा द्वारा कुछ इस तरह का ध्वज फहराया गया था

1946 में भारतीय संविधान सभा का उद्घाटन समारोह सुचेता कृपलानी के ‘वंदे मातरम्’ गायन के साथ हुआ। लेकिन 1947 में नए साल में संयुक्त राष्ट्र की आम सभा में भारत के राष्ट्रगान के रूप में संगीत वाद्ययंत्र पर ‘जन गण मन’ बजाया गया। इस बीच, उस समय संविधान सभा का सत्र चल रहा था। उसमें इस पर गरमागरम बहस हुई। 25 अगस्त, 1948 को प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा में एक बयान दिया, ‘‘यह उपाय करना पड़ा, क्योंकि संगीत वाद्ययंत्र पर कोई अन्य संगीत नहीं था। फिर 1949 में भारतीय संविधान सभा द्वारा गठित राष्ट्रगान चयन समिति ने राय व्यक्त की कि अब से ‘वंदे मातरम्’ और ‘जन गण मन’, दोनों को राष्ट्रगान माना जाएगा। लेकिन 24 जनवरी, 1950 को संविधान सभा के समापन सत्र में जब डॉ. राजेंद्र प्रसाद ‘वंदे मातरम’ के बारे में कहा कि ‘हम इससे संतुष्ट हैं’, तब पता चला कि यह गीत दूसरे स्थान पर आ गया है।

जब यह बंग दर्शन में प्रकाशित हुआ था, तब ‘वंदे मातरम्’ की धुन मल्ल द्वारा बनाई गई थी और लय कव्वाली द्वारा। बाद में इसे मेघ मल्ल द्वारा आनंदमठ में शामिल किया गया। ‘वंदे मातरम्’ के पहले संगीतकार प्रसिद्ध गायक जदुनाथ भट्टाचार्य थे। बाद में रवींद्रनाथ टैगोर, सरलादेवी चौधुरानी, श्रीमती सुभोलक्ष्मी, तिमिरवरन, दिलीप कुमार सहित कई लोगों ने इसमें धुनें जोड़ीं। हमें ‘वंदे मातरम्’ गाना नहीं भूलना चाहिए। हमें नई पीढ़ी के कलाकारों को खंडित नहीं, बल्कि संपूर्ण ‘वंदे मातरम्’ गाने के लिए प्रेरित करना चाहिए। बंकिमचंद्र ने ‘वंदे मातरम्’ रचकर इस देश में देश को माता के रूप में देखने के प्राचीन विचार को पुनर्जीवित किया।

भाषा और राग अलग, पर भाव एक

1976 में हुगली जिले के गोपालचंद्र थार सोनी ने राग देस-महार में गाया। 1885 में रवींद्रनाथ ठाकुर और प्रतिमा सुन्दरी देवी ने राग देस व कव्वाली ताल में स्वरबद्ध कर ‘बालक’ पत्रिका में इसका स्वर-संगीत प्रकाशित किया। बाद में बोस रिकॉर्ड्स व निकोल रिकॉर्ड कंपनी ने रवींद्रनाथ ठाकुर, सुरेंद्रनाथ बनर्जी, सत्यभूषण गुप्त व अन्य कलाकारों के गायन संस्करणों को संरक्षित किया। 1907 में हेमेंद्र मोहन बोस ने ‘एच. बोस स्वदेशी रिकॉर्ड्स’ पर रवींद्रनाथ के गायन वाला संस्करण जारी किया। बाद में नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने इसे राग दुर्गा में तिमिर बरन से संगीतबद्ध कर आजाद हिंद फौज की परेड के लिए तैयार करवाया। ‘वंदे मातरम्’ को महाकवि भरतियार सुब्रह्मण्य भारती ने तमिल, डॉ. नरेशचन्द्र सेनगुप्त ने अंग्रेजी तथा महर्षि अरविंद ने इसे अंग्रेजी गद्य व पद्य, दोनों रूपों में अनूदित किया। बाद में कई विद्वानों ने अपनी भाषा और महान संगीतकारों ने विभिन्न रागों में प्रस्तुत किया। इनमें सुरसागर जगमोहन, कमल दासगुप्ता के मातृसेवक दल, पंकज मलिक, अनादि दस्तीदार, राजन सरकार आदि प्रमुख थे। अन्य प्रसिद्ध गायकों ने भी अलग-अलग रागों में गाया, जैसे-पं. भीमसेन जोशी, आनंद बिहारी तेलंग (देश राग), ओंकारनाथ ठाकुर (बंगीय काफी), मोगुबाई कुरदीकर (खंबावती), एम.एस. निगानी (पैरावी), डॉ. लालमणि मिश्र (मालकोश ताल कहरवा), बलवंत राय भट्ट (सारंग, त्रिताल), केशवराव भोले (शुद्ध कल्याण), विष्णुपंत पागनीस (सारंग), मा. कृष्णराव (झिझोटी) इत्यादि। सुप्रसिद्ध गायिका एम.एस. सुब्बालक्ष्मी ने तमिल में गाकर इसे और लोकप्रिय बनाया। प्रस्तुति – डाॅ. अभिजित दीक्षित

Topics: गुलाम भारतविद्रोह को स्वर‘जन-गण-मन’बंग दर्शनवंदे मातरम्काकीनाडा कांग्रेस अधिवेशनVande Mataramराष्ट्रगान चयन समितिमातृशक्तिसोमेश्वर बरालपाञ्चजन्य विशेषआनंदमठभारतीय राष्ट्रीय कांग्रेसराष्ट्र वंदनाराष्ट्र की आत्मा
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