भारत का राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ केवल स्वतंत्रता संग्राम का एक नारा नहीं, बल्कि भारतीय आत्मा का अमर स्वर है। इस गीत ने आधुनिक भारत के राष्ट्रवाद को सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और सांस्कृतिक आधार प्रदान किया। इसमें निहित मातृभावना भारतीय मानस के उस गहरे संस्कार को अभिव्यक्त करती है जो अथर्ववेद के ‘माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः’ से रामायण के ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ तक निरंतर बहता रहा है।

उप सचिव, संगीत नाटक अकादमी
भारतीय सभ्यता में मातृत्व की अवधारणा उतनी ही प्राचीन है, जितनी स्वयं वेदों की परंपरा। अथर्ववेद (12.1.12) का मंत्र-माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः (पृथ्वी मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूं) इस विचार का शाश्वत प्रतीक है कि मनुष्य और भूमि का संबंध स्वामित्व या अधिकार का नहीं, बल्कि स्नेह, श्रद्धा और कृतज्ञता का है। भारतीय दृष्टि में पृथ्वी केवल एक भू-भाग नहीं, बल्कि जीवन की आधारशिला, पालनकर्ता और पोषण करने वाली माता है। इसी मातृत्व की भावना में समाहित है वह कृतज्ञता, जिससे मानव अपनी सभ्यता का निर्माण करता है। यही कारण है कि भारतीय परंपरा में भूमि को स्पर्श करने से पूर्व प्रणाम किया जाता है, उसे माता के रूप में वंदना की जाती है और उसकी उपज, जल व वायु को पवित्र माना जाता है।
‘वंदे मातरम्’ विदेशी शासन के दमन, शोषण, अन्याय व भ्रष्टाचार के विरुद्ध भारत की आत्मा की सहज और स्वाभाविक पुकार के रूप में उदित हुआ। अंग्रेजी शासन के अत्याचारों से व्यथित जनमानस के लिए यह गीत आत्मबल, एकता और स्वाभिमान का प्रतीक बना। बंकिमचंद्र द्वारा रचित यह गीत भारतीय समाज की अंतरात्मा से निकली सहज आध्यात्मिक, भावनात्मक अभिव्यक्ति थी, जो मातृभूमि के प्रति भक्ति, देश के प्रति समर्पण और स्वतंत्रता के प्रति उत्कट आकांक्षा को जोड़ रही थी। यह तत्कालीन भारतीय जनचेतना की गूंज थी, जिसमें दासता की जंजीरों को तोड़ने का नैतिक साहस था। ‘वंदे मातरम्’ में एक ओर मां के प्रति श्रद्धा है, तो दूसरी ओर स्वाधीनता का संकल्प। यही कारण है कि यह गीत स्वतंत्रता आंदोलन का प्राण बन गया और भारतीय राष्ट्रवाद की आत्मिक अभिव्यक्ति का सहज जयघोष बना! जब बंकिमचंद्र लिखते हैं-“सुजलां सुफलां मलयजशीतलां, शस्यश्यामलां मातरम्” तो यह वही वैदिक चेतना है जो धरती को मां के रूप में देखती है-शीतल, फलदायिनी और करुणामयी।
भारतीय संस्कृति में मातृभूमि की महिमा का सर्वोच्च उदाहरण वाल्मीकि रामायण में मिलता है। रावण-वध के पश्चात् जब विभीषण श्रीराम से अनुरोध करते हैं कि वे स्वर्णमयी लंका में निवास करें, तब श्रीराम लक्ष्मण से कहते हैं-
अपि स्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी॥
(अयोध्याकाण्ड, सर्ग 33, श्लोक 14)
यह श्लोक भारतीय नैतिकता का सार है कि माता व मातृभूमि दोनों जीवन के सर्वोच्च मूल्य हैं। श्रीराम के इस आदर्श ने भारतीय मानस में यह स्थायी भाव स्थापित किया कि मातृभूमि की सेवा ही धर्म है। भारतीय लोक व शास्त्र दोनों में मातृत्व सर्वोच्च सत्ता के रूप में पूजित है। देवीमहात्म्य में कहा गया है-या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता। अर्थात् जो देवी सभी प्राणियों में मातृरूप से स्थित हैं, उन्हें नमस्कार।
भारतीय संस्कृति में मातृत्व की भावना केवल परिवार या समाज तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसे प्रकृति और सृष्टि के प्रत्येक तत्व में देखा गया। नदियां, पर्वत, भाषाएं और भूमि-सभी में मातृभाव की अनुभूति की गई। गंगा माता, भारती माता, धरणी माता जैसे प्रतीकों ने इस भाव को दृढ़ किया और मातृत्व को भारतीय धर्म का केंद्र बना दिया। इसी समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा से प्रेरणा लेकर बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने मातृभूमि को ‘शक्तिरूपा देवी’ के रूप में प्रतिष्ठित किया। उनकी ‘मां’ केवल दुर्गा नहीं, बल्कि धरती और भारत की आत्मा का भी प्रतीक है। उन्होंने राष्ट्र को देवी के रूप में देखकर उसमें भक्ति, श्रद्धा और सेवा का भाव जोड़ा।
‘वंदे मातरम्’ में यही भाव प्रकट होता है कि राष्ट्र और धर्म परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक ही तत्व के दो रूप हैं-एक भौतिक और दूसरा आध्यात्मिक। इस गीत ने मातृभूमि के प्रति भक्ति को देशभक्ति में रूपांतरित किया और भारतीय राष्ट्रवाद को करुणा, शक्ति और श्रद्धा की उस परंपरा से जोड़ दिया, जिसमें मां की सेवा ही सर्वोच्च धर्म मानी जाती है। 1905 के बंग-भंग आंदोलन में यह गीत स्वतंत्रता का उद्घोष बन गया तो ब्रिटिश शासन ने इसके गायन पर रोक लगा दी, परंतु जनता ने इसे आध्यात्मिक प्रतिरोध के रूप में अपनाया। श्री अरविंद ने लिखा-‘‘बंकिमचंद्र ने हमें हमारी माता का दर्शन कराया। जब मातृभूमि दैवी शक्ति के रूप में हमारे सामने आती है, तभी सच्चा राष्ट्रप्रेम जन्म लेता है।’’
भारत में राष्ट्र का विचार ‘राज्य’ से नहीं, ‘धर्म’ से उत्पन्न हुआ है। यहां ‘मदरलैंड’ का भाव ‘फादरलैंड’ से भिन्न है। यह शक्ति, सृजन और करुणा की प्रतीक है। ‘वंदे मातरम्’ में यह भावना स्पष्ट झलकती है-राष्ट्र कोई सत्ता नहीं, बल्कि मां का रूप है। उसकी रक्षा करना, उसकी सेवा करना और उसकी वंदना करना ही सच्चा, सनातन धर्म है।

















