अखिल भारतीय साहित्य परिषद अधिवेशन: अमेरिकी दादागीरी और वैश्विक संकट पर मनोज कुमार की चेतावनी
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अखिल भारतीय साहित्य परिषद अधिवेशन: अमेरिकी दादागीरी और वैश्विक संकट पर मनोज कुमार की चेतावनी

अखिल भारतीय साहित्य परिषद के 17वें अधिवेशन में मनोज कुमार ने जियो-पॉलिटिक्स के बदलाव पर बोला। अमेरिकी वर्चस्व, संसाधन संकट और भारत के पोखरण परीक्षण की कहानी जानें।

Written byकुलदीप सिंहकुलदीप सिंह
Nov 9, 2025, 09:35 pm IST
in मध्य प्रदेश
Akhil Bhartiya sahitya Parishad Manoj Kumar on geo Politics

मंच पर अपने विचार रखते मनोज कुमार

अखिल भारतीय साहित्य परिषद के 17वें अधिवेशन के तृतीय दिवस पंचम सत्र में दूसरे वक्ता के तौर पर एबीएसपी के ही पदाधिकारी मनोज कुमार ने आत्मबोध से विश्वबोध के मुद्दे पर अपने विचार रखे। इस दौरान उन्होंने मौजूदा वक्त में जिस तेजी से जियो पॉलिटिक्स बदल रही है उस पर प्रकाश डाला और कहा कि जिस प्रकार से एक व्यक्ति अकेला नहीं रह सकता है, उसी तरह से दुनिया का कोई भी देश अलग-थलग होकर नहीं रह सकता है। केवल संचार या व्यवहार ही नहीं, सभी को एक दूसरे का सहयोग करना होगा।

लेकिन, जिस तरह की मनुष्य की प्रवृति होती है, ठीक उसी प्रकार की प्रवृति देशों की भी होती है। उन्होंने अमेरिका का नाम लिए बिना कहा कि कुछ राष्ट्र ऐसी प्रवृति के भी हैं, जो कि हर जगह केवल अपना ही वर्चस्व चाहते हैं, एकाधिकार स्थापित करना चाहते हैं। ऐसे देश स्वयं की भूमिका का अतिक्रमण करते-करते तालमेल की जगह ये देश घालमेल करने लगते हैं। इसके चलते दुनिया में कई तरह के संकट खड़े हो जाते हैं। आज भी यही स्थिति है कि कुछ देश दक्षिणी गोलार्ध में अपना एकाधिकार स्थापित करने की जुगत में लगे हुए हैं।

हालात ये है कि इन देशों में केवल सुख ही नहीं, बल्कि ययाति की तरह भोग की आकांक्षा भी बढती जा रही है। इसके कारण संसाधन कम पड़ जाएंगे और वैश्विक मानवता कष्ट में आ जाएगी। हालांकि, प्रकृति और नियति इसे कभी सहन नहीं करने वाली। क्योंकि परिवर्तन ही शाश्वत है और यही कारण है कि उन देशों को भी चुनौती मिलती है।

अमेरिकी विस्तारवाद पर बात

मनोज कुमार कहते हैं कि सोवियत रूस को खंडित करने के बाद अमेरिका की ताकत लगातार बढ़ती चली गई। कोई भी देश उसके वर्चस्व को चुनौती नहीं दे रहा है। यही वजह है कि उसने दुनियाभर के 80 देशों में अपने मिलिट्री बेस बनाए हुए हैं और जो कुछ अज्ञात थे उन पर से भारत ने पर्दा उठा दिया। इस षड्यंत्र को इस तरह से समझ सकते हैं कि वह (अमेरिका) स्वयं की भूमि पर युद्ध नहीं होने देना चाहता है, लेकिन बाकी दुनियाके ज्यादातर देशों में अस्थिरता फैलाकर युद्ध को भड़का रहा है। ताकि उसका हथियारों का व्यापार चलता रहे।

इसके साथ ही विश्व की बड़ी संस्थाएं चाहे वो संयुक्त राष्ट्र हो, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष या फिर यूनेस्को हो, इन सभी को भारी फंडिंग करके उसने खरीद रखे हैं और अपने मन मर्जी के मुताबिक वो रिपोर्ट तैयार करवाता है।

इसे भी पढ़ें: अखिल भारतीय साहित्य परिषद के 17वें अधिवेशन में डॉ. विद्या विन्दु सिंह का व्याख्यान: लोकसाहित्य में आत्मबोध से विश्वबोध

भारत के परमाणु परीक्षण का भी जिक्र

साथ ही अमेरिकी दादागीरी और भारत के परमाणु परीक्षण का जिक्र करते हुए मनोज कुमार कहते हैं कि इनकी दादागीरी की हद तो देखिए कि ये दुनियाभर में सेटेलाइट के जरिए जासूसी करते हैं और दादागीरी करते हैं कि आप परमाणु परीक्षण नहीं कर सकते। भारत के साथ भी अमेरिका ने ऐसा ही करने की कोशिश की थी। लेकिन, धन्य हैं वे हमारे वैज्ञानिक, जिन्होंने सेना की वर्दी में जाकर पोखरण में न केवल परमाणु का सफल परीक्षण किया। बल्कि, भारत ने सीना तानकर अमेरिका को जवाब दिया कि हम सीटीबीटी पर हस्ताक्षर नहीं करेंगे। ऐसा करके भारत ने वर्चस्व और एकाधिकार की भावना को नकार दिया।

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कुलदीप सिंह
कुलदीप सिंह
नागपुर स्थित राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज विद्यापीठ (नागपुर यूनिवर्सिटी) से मॉस कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएट। बीते एक दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हूं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर विशेष रुचि। पत्रकारिता की इस यात्रा की शुरुआत नागपुर नवभारत में इंटर्नशिप से शुरू होती है, तदोपरांत GTPL न्यूज चैनल, लोकमत समाचार, ग्रामसभा मेल, मोबाइल न्यूज 24 और Way2News हैदराबाद के बाद अब पाञ्चजन्य के साथ सफर जारी है। [Read more]
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