अखिल भारतीय साहित्य परिषद के 17वें अधिवेशन के प्रथम सत्र के दूसरे वक्ता आशीष कुमार गुप्ता ने ‘कुटुंब और नागरिक कर्तव्य’ विषय पर बात की। उन्होंने बड़ी बात की भारत में आज अगर थोड़ी बहुत भारतीयता बची हुई है तो उसके पीछे कुटुंब ही है। वह कहते हैं कि पिछले 200-250 सालों की औपनिवेशिक व्यवस्था के दौरान भी हमारी भारतीयता बची रही, इसके पीछे हमारी कुटुंब व्यवस्था ही है।
ऐसे में कुटुंब व्यवस्था का महत्व काफी बढ़ जाता है। वर्तमान दृष्टि से देखें तो हमारे जितने भी रीति-रिवाज, तीज त्योहार हैं, विभिन्न प्रकार की परंपराएं हैं, आंवला नवमी, वट सावित्री समेत जितनी भी परंपराएं हमारी बची हुई हैं, वो इसी कुटुंब व्यवस्था की देन हैं। लेकिन,आज के परिवेश में एक चिंता की बात यही है कि आजकल जिस प्रकार से एकल परिवार का प्रचलन बढ़ा है।
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प्रकृति का हर तत्व कुटुंब का हिस्सा
हालांकि, हमारे यहां, नदी, पर्वत पठार और जानवर भी कुटुंब का ही हिस्सा माने जाते हैं। अपनी बातों का अर्थ समझाते हुए आशीष गुप्ता कहते हैं कि विवाह की ही बात करें तो विवाह केवल तुलसी का ही नहीं होता वट वृक्ष का भी होता है। इसके अलावा जनेऊ केवल मनुष्य ही नहीं लगाते, बल्कि जनेऊ पीपल के वृक्ष को भी पहनाया जाता है। हम इन सब चीजों को अपने कुटुंब का ही हिस्सा मानते हैं और इसीलिए, इन सभी चीजों का विस्तार करते हैं। आज अगर देखा जाए आजकल एक बात कही जाती है कि छोटा परिवार, सुखी परिवार होता है। और बड़े परिवार में बंधन होते हैं।
लेकिन, आपको ये समझने की आवश्यकता है कि ये बंधन बहुत ही दूसरे तरह के बंधन होते हैं। इसे समझाते हुए वह पतंग का उदाहरण देते हैं कि पतंग आकाश में डोर के कारण उड़ती है, लेकिन, अगर उसी डोर को काट दिया जाए तो पतंग जमीन पर गिर जाएगी। इसी तरह से कुटुंब होता है। आज एकल परिवार की एक समस्या ये भी है कि मान लीजिए कहीं किसी को आना जाना हो तो बच्चों को साथ में लेकर जाना पड़ता है। अगर कोई कभी बीमार हो जाए तो परेशानी आ जाती है। शहरों की बात करें तो वहां लोग केवल कमाने के लिए ही जीते हैं। ऐसे लोगों का न तो कोई परिवार, न ही कोई समाज है।

















