अखिल भारतीय साहित्य परिषद का 17वां अधिवेशन: कुटुंब और नागरिक कर्तव्य पर आशीष गुप्ता का प्रेरक संदेश
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अखिल भारतीय साहित्य परिषद का 17वां अधिवेशन: कुटुंब और नागरिक कर्तव्य पर आशीष गुप्ता का प्रेरक संदेश

अखिल भारतीय साहित्य परिषद के अधिवेशन में कुटुंब को भारतीयता का आधार बताया गया। आशीष गुप्ता ने एकल परिवार की समस्याओं पर चर्चा की। छोटा परिवार सुखी नहीं, बल्कि कुटुंब बंधन जीवन को मजबूत बनाते हैं।

Written byकुलदीप सिंहकुलदीप सिंह
Nov 8, 2025, 10:00 pm IST
inमध्य प्रदेश
Akhil bhartiya sammelan-2025 kutumb

कुटुंब और नागरिक कर्तव्य विषय पर बोलते आशीष कुमार गुप्ता

अखिल भारतीय साहित्य परिषद के 17वें अधिवेशन के प्रथम सत्र के दूसरे वक्ता आशीष कुमार गुप्ता ने ‘कुटुंब और नागरिक कर्तव्य’ विषय पर बात की। उन्होंने बड़ी बात की भारत में आज अगर थोड़ी बहुत भारतीयता बची हुई है तो उसके पीछे कुटुंब ही है। वह कहते हैं कि पिछले 200-250 सालों की औपनिवेशिक व्यवस्था के दौरान भी हमारी भारतीयता बची रही, इसके पीछे हमारी कुटुंब व्यवस्था ही है।

ऐसे में कुटुंब व्यवस्था का महत्व काफी बढ़ जाता है। वर्तमान दृष्टि से देखें तो हमारे जितने भी रीति-रिवाज, तीज त्योहार हैं, विभिन्न प्रकार की परंपराएं हैं, आंवला नवमी, वट सावित्री समेत जितनी भी परंपराएं हमारी बची हुई हैं, वो इसी कुटुंब व्यवस्था की देन हैं। लेकिन,आज के परिवेश में एक चिंता की बात यही है कि आजकल जिस प्रकार से एकल परिवार का प्रचलन बढ़ा है।

इसे भी पढ़ें: अखिल भारतीय साहित्य परिषद का 17वां अधिवेशन: डॉ. कुमुद शर्मा का वेदों और भारतीय ज्ञान परंपरा पर व्याख्यान

प्रकृति का हर तत्व कुटुंब का हिस्सा

हालांकि, हमारे यहां, नदी, पर्वत पठार और जानवर भी कुटुंब का ही हिस्सा माने जाते हैं। अपनी बातों का अर्थ समझाते हुए आशीष गुप्ता कहते हैं कि विवाह की ही बात करें तो विवाह केवल तुलसी का ही नहीं होता वट वृक्ष का भी होता है। इसके अलावा जनेऊ केवल मनुष्य ही नहीं लगाते, बल्कि जनेऊ पीपल के वृक्ष को भी पहनाया जाता है। हम इन सब चीजों को अपने कुटुंब का ही हिस्सा मानते हैं और इसीलिए, इन सभी चीजों का विस्तार करते हैं। आज अगर देखा जाए आजकल एक बात कही जाती है कि छोटा परिवार, सुखी परिवार होता है। और बड़े परिवार में बंधन होते हैं।

लेकिन, आपको ये समझने की आवश्यकता है कि ये बंधन बहुत ही दूसरे तरह के बंधन होते हैं। इसे समझाते हुए वह पतंग का उदाहरण देते हैं कि पतंग आकाश में डोर के कारण उड़ती है, लेकिन, अगर उसी डोर को काट दिया जाए तो पतंग जमीन पर गिर जाएगी। इसी तरह से कुटुंब होता है। आज एकल परिवार की एक समस्या ये भी है कि मान लीजिए कहीं किसी को आना जाना हो तो बच्चों को साथ में लेकर जाना पड़ता है। अगर कोई कभी बीमार हो जाए तो परेशानी आ जाती है। शहरों की बात करें तो वहां लोग केवल कमाने के लिए ही जीते हैं। ऐसे लोगों का न तो कोई परिवार, न ही कोई समाज है।

Topics: भारतीय परंपराएंकुटुंब बंधनकुटुंब और नागरिक कर्तव्यआशीष कुमार गुप्ताभारतीय रीति रिवाजNuclear familyfamily tiesअखिल भारतीय साहित्य परिषदfamily and civic dutiesIndian TraditionsAshish Kumar GuptaAll India Sahitya ParishadIndian customsएकल परिवार
कुलदीप सिंह
कुलदीप सिंह
नागपुर स्थित राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज विद्यापीठ (नागपुर यूनिवर्सिटी) से मॉस कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएट। बीते एक दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हूं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर विशेष रुचि। पत्रकारिता की इस यात्रा की शुरुआत नागपुर नवभारत में इंटर्नशिप से शुरू होती है, तदोपरांत GTPL न्यूज चैनल, लोकमत समाचार, ग्रामसभा मेल, मोबाइल न्यूज 24 और Way2News हैदराबाद के बाद अब पाञ्चजन्य के साथ सफर जारी है। [Read more]
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