एक हिन्दू राजकुमारी जिसे क्वीन विक्टोरिया की गॉडडॉटर कहा जाता है, उन्हें लेकर जितना गर्व का भाव अंग्रेजों में है, उतना ही एशिया के बड़े ईसाई वर्ग में भी दिखता है। पहले उस पोस्ट पर दृष्टि डालते हैं, जिसके कारण आज एक बार फिर से इतिहास के बहुत ही क्रूर पन्नों ने दस्तक दी है, जिसने एक बार फिर से उन षड्यंत्रों को उजागर किया है, जो भारत की आत्मा के साथ निरंतर किये गए हैं।
साउथ एशियन क्रिश्चियन्स नामक यूजर ने कुर्ग के अंतिम राजा वीरराजेन्द्र की पुत्री राजकुमारी गौरम्मा के ईसाई बनने का उल्लेख करते हुए लिखा कि
“फ्रांज़ ज़ेवर विंटरहेल्टर द्वारा बाइबिल पकड़े हुए राजकुमारी विक्टोरिया गौरम्मा का चित्रण।
कूर्ग के अंतिम राजा चिक्का वीरराजेंद्र की बेटी राजकुमारी गौरम्मा का बपतिस्मा 1852 में हुआ था।“
Portrait of Princess Victoria Gouramma holding a Bible, by Franz Xaver Winterhalter.
Princess Gouramma, the daughter of Chikka Virarajendra, the last King of Coorg, was baptised in 1852. pic.twitter.com/k1c4uB4o6p
— South Asian Christians (@S_AsianXtians) November 3, 2025
यह चित्र जितना सुंदर है, उतना ही दर्द से भरा हुआ है और साथ ही एक भयावह इतिहास की गवाही देता है। गौरम्मा को वर्ष 1852 में तब ईसाई बना दिया गया था, जब वे मात्र 13 वर्ष की थीं। और उन्हें क्वीन विक्टोरिया ने गॉडचिल्ड्रन बनाया था।
क्या होते थे गॉडचिल्ड्रन.?
जब हम गॉडचिल्ड्रन शब्द सुनते हैं, तो सबसे पहले यही भाव मन में आता है कि यह प्रभु से जुड़े हुए या ऐसे बच्चे होंगे, जिनके दिन बुरे चल रहे होंगे और जिनके पास धन आदि कम होगा तो उन पर प्रभु कृपा आदि के लिए बच्चे होंगे। मगर नहीं! गॉड चिल्ड्रन की परिभाषा कुछ अलग है।
विक्टोरिया के गॉड चिल्ड्रन का अर्थ उन बच्चों से है, जिनके लिए रानी ने गॉड मदर की भूमिका निभाई। और यह ऐसे बच्चे होते थे, जिनका मतांतरण रानी के द्वारा करवाया जाता है।
merican Webster डिक्शनेरी के पृष्ठ पर गॉड चाइल्ड शब्द का अर्थ इस प्रकार दिया गया है “a person for whom another person becomes sponsor at baptism” अर्थात एक व्यक्ति जिसके एक दूसरा व्यक्ति बाप्तिज़्म कराने के लिए स्पॉन्सर बन जाता है।
क्या बच्चे खुद मतांतरण कर सकते हैं.?
अब इसके बाद एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है कि क्या बच्चे खुद ही अपना मतांतरण कर सकते हैं? या फिर वह किसी से यह कह सकते हैं कि वे मतांतरित होना चाहते हैं, तो वे उसके गॉड चाइल्ड बनना चाहते हैं? एक गॉडचाइल्ड आम तौर पर एक बच्चा होता है, जिसे बाप्तिज़्म के लिए गॉडपेरेंट द्वारा स्पॉन्सर किया जाता है।
अब यह प्रश्न उठता है कि गॉडपेरेंट की भूमिका क्या है? जब गॉड चाइल्ड की बात करते है, तो गॉड मदर की भूमिका यह होती थी कि वह बच्चे के रिलीजियस पालनपोषण के लिए जिम्मेदार थी।
राजकुमारी गौरम्मा, क्वीन विक्टोरिया की गॉडडॉटर
अब जब कुर्ग की राजकुमारी क्वीन विक्टोरिया की गॉड डॉटर थीं, तो यह समझा जा सकता है कि वे आखिर क्या थीं और क्वीन ने उन्हें अपनी पनाह में क्यों लिया था। मगर यहाँ पर बात और प्रश्न मुख्यतया इन बच्चों की उम्र पर है।
क्या है कुर्ग के राजा वीरराजेन्द्र की कहानी! राजकुमारी गौरम्मा का जन्म बनारस में कुर्ग के अपदस्थ राजा चिक्का वीरराजेन्द्र वोडेयार के घर हुआ था। राजा को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथों कुर्ग के युद्ध में हार मिली थी और उन्हें इसके बाद उन्हें अपना राज्य छोड़कर जाना पड़ा था। जेम्स स्टुअर्ट के आदेशों के अंतर्गत कुर्ग के राज्य को ब्रिटिश भारत में जोड लिया गया और उन्हें बनारस में राजनीतिक कैदी बनाकर रखा गया था। वहाँ पर उन्होनें 14 वर्ष बिताए थे। और इसी दौरान राजकुमारी का जन्म हुआ था।
वर्ष 1852 में वे अपनी 11 वर्षीय बेटी के साथ लंदन गए थे। वे रानी से अपना राज्य वापस मांगने गए थे। मगर उसकी एक शर्त थी। उन्हें अपनी बेटी को वहीं छोड़कर आना था। उन्होनें अपने मित्र Dr. William Jeaffreson की सलाह से ईस्ट इंडिया कंपनी पर मुकदमा करने का विचार किया था, कि उसके पास उनकी पैतृक संपत्ति है। चूंकि वह मुकदमा केवल इंग्लैंड में ही दर्ज हो सकता था, इसलिए वे अपनी बेटी के साथ गए और राजकुमारी को रानी के पास एक धार्मिक मतांतरित के रूप में प्रस्तुत किया, क्योंकि इसी कारण उनकी इंग्लैंड की यात्रा संभव हो सकती थी।
ईस्ट इंडिया कंपनी और खुद रानी इस बात को लेकर बहुत रोमांचित थे कि भारत के राजघराने का कोई व्यक्ति ईसाई मत में मतांतरित हो रहा है, क्योंकि इसके कारण शायद अन्य राजघराने भी ऐसा करने के लिए प्रेरित हों।
राजकुमारी गौरम्मा को क्वीन विक्टोरिया ने अपनी पनाह में लिया और अपना नाम भी दिया था।
गौरम्मा का सारा नाता उनके पिता से तोड़ दिया गया और उन्हें ऐसा माहौल मिला रहने के लिए, जहां पर न ही उनकी भाषा थी और न ही उनके अपने देश का कोई व्यक्ति।
इसके साथ ही वर्ष 1853 में सिख साम्राज्य के अंतिम शासक महाराजा दलीप सिंह ने भी ईसाई मत अपना लिया था (हालांकि उन्होनें 1886 में पुन: सिख धर्म में वापसी कर ली थी)। रानी के अधिकारियों और रानी ने इन दोनों के बीच विवाह का प्रयास किया, कि जिससे भारत के ये दो मतांतरित राज घरानों के वारिसों के आपसी विवाह से शेष राज घराने भी ईसाई मत में आने के लिए प्रेरित हों। परंतु दलीप सिंह, के मन में राजकुमारी गौरम्मा के प्रति बहन का भाव जागृत हो गया था, इसलिए ब्रिटिश की यह योजना सफल नहीं हो पाई।
राजकुमारी खुद को महल में बाहरी महसूस करती थी और इस कारण वह भागने का प्रयास करती थी। और इसके बाद उनकी शादी उनसे 30 वर्ष बड़े आर्मी कर्नल जॉन कैंपबेल से कर दी गई। जिसने कहा जाता है कि केवल पैसे के लालच के कारण राजकुमारी से शादी की थी।
राजकुमारी ने वर्ष 1861 में अपनी बेटी को जन्म दिया, मगर उन्हें अपनी बेटी की अकेली ही देखभाल करनी पड़ी, क्योंकि उनके हसबैन्ड को केवल उनके पैसों से मतलब था और इसी कारण उन्हें तपेदिक हुआ और मात्र दो ही वर्ष में 23 वर्ष की उम्र में उनकी मृत्यु हो गई।
इस असमय मृत्यु के बाद भी औपनिवेशिक सोच के चलते राजकुमारी के मतांतरण का महिमामंडन क्यों?
राजकुमारी की मृत्यु बहुत दुखद थी, और संभवतया यह उनकी स्वाभाविक मृत्यु थी भी नहीं। यदि उनके पिता को ईस्ट इंडिया कंपनी के क्रूर पंजों के हाथों अपना राज्य न गंवाना पड़ता और इस सीमा तक अमानवीय और औपनिवेशिक शर्त न माननी पड़ती तो उन्हें अपनी भूमि, अपना भोजन, अपने वस्त्र, अपनी भाषा, अपनी जलवायु कुछ भी न छोड़ना पड़ता और राजकुमारी को असमय मृत्यु को सामना न करना पड़ता।
यदि इतना होने के बाद भी उनकी शादी उचित व्यक्ति से की जाती, तो भी शायद राजकुमारी जीवित रहती। मगर एक दुर्भाग्यपूर्ण जीवन का इस प्रकार मतांतरण को लेकर महिमामंडन भारतीयों की आत्मा के प्रति किया गया क्रूर उपहास है।
सोशल मीडिया पर लोगों ने दिखाया आईना
इस पोस्ट पर सोशल मीडिया पर लोगों ने इस हैन्डल को सत्यता के साथ आईना दिखाया है। शार्क आइसबर्ग नामक यूजर ने लिखा कि “मुझे कहानी पूरी करने दो। उसे जबरन अंग्रेजों द्वारा ले जाया गया था। उसे जबरन मतांतरित किया गया था। उसे जबरन 50 वर्ष के श्वेत व्यक्ति से शादी करने को बाध्य किया गया था और मात्र 20 वर्ष की आयु मे वह गर्भवती हुई और 21 वर्ष की आयु में उसकी मृत्यु हो गई। और एक भारतीय कुर्ग राजकुमारी के साथ उन्होनें ऐसा व्यवहार किया। तुम्हारा तो खून खौलना चाहिए!”
मगर औपनिवेशिक मानसिकता वाले लोगों का खून नहीं खौलेगा।
संजीव नेवर ने भी यही लिखा कि “यह जबरन मतांतरण का शर्मनाक मामला था। जब वह मुश्किल से वर्ष की थीं, तब उनका अपहरण कर लिया गया और उनका धर्म परिवर्तन कर दिया गया, फिर उनकी शादी 30 साल बड़े एक व्यक्ति से कर दी गई – ये सब महारानी विक्टोरिया के आदेश पर हुआ। 22 साल की उम्र में उनकी मृत्यु हो गई।
केवल एक विकृत मानसिकता ही बाल शोषण को ऐसे महिमामंडित कर सकती है मानो यह कोई त्रासदी न होकर विजय हो।“
यह और बड़ा दुर्भाग्य है कि भारत के इतिहास के इतने क्रूर पन्नों को भी औपनिवेशिक मानसिकता द्वारा उत्सव का विषय माना जाता है और महिमामंडन किया जाता है।















